पत्रकारों के खेमे में बीजेपी या कांग्रेस या आप समर्थक होना आम बात है. बस कोई पत्रकार बीजेपी की तरफ से बोल दे तो पूरा लूट्यन्स उसके विरोध में लग जाता है. फिर भले ही आशुतोष गुप्ता जी जैसे पत्रकार आम आदमी पार्टी के टिकट पर लड़ें. IBN7 में रहते हुए आशुतोष ने आम आदमी पार्टी के लिए न्यूज़रूम से प्रोपेगैंडा नहीं किया होगा?
ET Now की एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर सुप्रिया श्रीनते ने राहुल गांधी की न्याय स्कीम की तारीफ की. अशुतोष गुप्ता जैसे ही सुप्रिया जी को कांग्रेस ने इस तरफदारी के लिए लोकसभा चुनाव का टिकट दे कर नवाजा है. सुप्रिया ने रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के साक्षात्कार के दौरान NYAY की तारीफ की.
सबसे ज़्यादा हैरानी की बात यह है कि सुप्रिया को इस काम का मेहनताना एक टिकट के रूप में दिया गया, और यह टिकट पहले ही किसी और को दिया जा चुका था. सुप्रिया को महराजगंज उत्तर प्रदेश से टिकट दिया गया है. सुप्रिया के पहले ये टिकट तनुश्री त्रिपाठी को दिया गया था.
सोचने की बात यह है कि सुप्रिया द्वारा अब तक दिखाई गई खबरों पर संदेह होगा ही कि उन्होंने कांग्रेस का टिकट पाने के लिए आखिरकार कौनसी खबर छुपाई दिखाई या बनाई होगी? इससे ज़्यादा सोचने की बात यह है कि सुप्रिया जिस चैनल के लिए काम कर रही हैं क्या उन्हें इस बात की ज़रा भी भनक नहीं था? और अगर थी तो जानते हुए भी इस तरह से कांग्रेस खबरों के ज़रिए समर्थन देना किस हद तक सही था?
इस बात पे गौर करना भी ज़रूरी है कि सुप्रिया को सीधे नहीं बल्कि किसी और का टिकट काट कर मौका दिया गया. नेता अपनी पूरी ज़िंदगी इस एक टिकट के लिए लगा देते हैं तो ऐसा तो बिल्कुल नहीं हो सकता की सुप्रिया को बिना किसी लॉबिंग के टिकट दे दिया गया हो? और मान भी लेते हैं कि सुप्रिया योग्य थी तो कांग्रेस ने उनके नाम पर पहले विचार क्यों नहीं किया? आखिर रघुराम राजन के साथ साक्षात्कार के तुरंत बाद ही क्यों उनके टिकट की घोषणा की गई?
UPA काल मे पत्रकारों का पालन पोषण उन्हें तरह तरह के अवार्ड्स और अंतरर्राष्ट्रीय ट्रिप में मुफ्त में साथ ले जाकर किया जाता था. परन्तु NDA के आने के बाद यह सब बंद हो गया. यह एक बहुत बड़ा कारण है कि लुट्यंस का एक बड़ा तबका NDA से खासा नाराज़ रहता है.
किसी एक पार्टी के लिए मन में प्रेम होना कोई बुरी बात नहीं है पर यह प्रेम जब आपकी पत्रकारिता में दिखाई देने लगे तो यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर धब्बा है. एक तरह से हम यह भी सोच सकते हैं कि चलो देर से ही सही पर सुप्रिया जी किस पार्टी को सपोर्ट करती हैं यह बात सामने आई पर ऐसे न जाने कितने पत्रकार होंगे जो शायद ऐसे ही टिकट की उम्मीद में या फिर किसी चीज़ की एवज के लिए या फिर निजी कारणों से एक पार्टी को समर्थन दे रहे होंगे.
न्यूज़रूम में बैठकर हर किसी पर चिल्लाने वाले पत्रकारों की अपनी क्या अस्मिता है? चौथा स्तंभ तो आए दिन हर किसी पर इल्ज़ाम लगाता है, फेक न्यूज़ फैलाते हुए पकड़े जाने पर अभिव्यक्ति की आज़ादी का रोना रोता है वह अपने स्तम्भ में पड़ रही दरारों को कब देखेगा? सोशल मीडिया पर होने के चलते हमें तो यह पता है कि सुप्रिया जी की पत्रकारिता कितनी निष्पक्ष थी पर क्या आम जनता इस बात को कभी जान पाएगी? क्या कोई न्यूज़ चैनल आज इस बात पर डिबेट करेगा?
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