इसरो के पूर्व चीफ को धमकी पर असहिष्णुता ब्रिगेड की चुप्पी

देश के एक प्रबुद्ध व्यक्ति को जैश-ए-मोहम्मद से धमकी मिली है. देश के वैज्ञानिक और इसरो में 2003 से 2009 तक महत्वपूर्ण योगदान देने वाले वैज्ञानिक जी माधवन नैय्यर को जैश ए मोहम्मद द्वारा धमकी दी गयी है कि यदि उन्होंने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समर्थन देना नहीं छोड़ा तो अंजाम अच्छा नहीं होगा. 

यह धमकी दो बातों को साफ करती है. पहली, भारत ने एक बहुत ही बड़ी उपलब्धि हासिल की है. इतनी बड़ी कि इसके बोझ तले पड़ोसी मुल्क के अराजक तत्व दबे जा रहे हैं. दूसरी, देश के प्रधानमंत्री से बहुत से लोगों को चिढ़ है. वैसे राजनैतिक बिरादरी के मध्य चिढ़ तो आम बात है, लेकिन जब यह मुल्क के बाहर होने लगे तो जनता को समझ में आ जाना चाहिए कि देश का चुना हुआ प्रतिनिधि एकदम सटीक जगह वार कर रहा है. यह एक अच्छी बात है क्योंकि देश में राजनैतिक पार्टियाँ तो देश के भले के लिए ही कार्य करती हैं. तभी तो नेता जी के मुखारविंद से यह बात यदा-कदा निकलती रहती है कि हम देश बचाना चाहते हैं.

माधवन को मिली यह धमकी एक गम्भीर संदेश भी देती है. देश के लोगों को सोचने पर मजबूर करती है. देश में शांति के कबूतर उड़ाने की पैरवी करने वाले लोगों में इस समय चुप्पी है. मीडिया का एक वर्ग भी शांत है. सबसे ज़्यादा शांति हमारे बुद्धिजीवी वर्ग में है जिसके लिए देश का संविधान खतरे में है. सवाल तो उस राजनीतिक पार्टी से भी बनता है जिसके लिए हाफिज सईद और मसूद अजहर ‘आदरणीय’ और देश का प्रधानमंत्री ‘चोर’ है. भाषा में झलकती कटुता सत्ता लोलुपता का प्रतीक है.

देश के ही चुने हुए प्रधानमंत्री का समर्थन करने के लिए एक वैज्ञानिक को धमकी दी जा रही है. उन्होंने दो दिन पहले एक निजी टीवी चैनल की डिबेट में अंतरिक्ष के क्षेत्र में पिछली सरकार की ढिलाई के बारे में बताया था. बस यही गलती उनसे हो गयी.

एक राजनीतिक पार्टी द्वारा देश की सुरक्षा में ढ़िलाई बरतने के लिए देश के एक वैज्ञानिक द्वारा जो फटकार लगाई गई, उसका बुरा मुल्क से बाहर बैठे एक आतंकी संगठन को क्यों लग गया, यह समझ से परे है. वैसे आप आतंकवादी संगठन से साधुवाद की उम्मीद नहीं करते हैं, लेकिन एक खास दिन जब देश ने अंतरिक्ष में कीर्तिमान स्थापित किया है, उसी दिन यह धमकी भरा पत्र आना बहुत से संदेह पैदा करता है. 

सनद रहे कि यूपीए शासनकाल के समय 4 वर्षों के भीतर 11 बड़े वैज्ञानिक संदेहास्पद परिस्थितियों में मृत पाए गए थे. यह तत्कालीन सरकार के लिए एक बड़ी नाकामयाबी है. आज की राजनीति में उनके द्वारा परिभाषित ‘सरकार के कर्तव्यों’ की लिस्ट यह कह रही है. आज जहां देश की सरकार से नगर निगम स्तर पर हुई किसी परेशानी के बारे भी सवाल पूछे जाते हैं, वहां इतने बड़े वैज्ञानिक गायब हो गए और सरकार ने कुछ नहीं किया? यह सुरक्षा में भारी चूक का उदाहरण है. 

माधवन को मिली यह धमकी एक प्रकार से उन लोगों के लिए अंतरिक्ष में हमारे बाहुबल का प्रमाण है जो दबी जुबान में ही सही लेकिन इस एक कीर्तिमान का प्रमाण मांग रहे थे. यह प्रमाण मांगने वाली राजनीति हमारे देश के लिए बहुत ही घातक है. देश की संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर उठाए जा रहे प्रश्नचिन्ह, प्रश्न पूछने वालों की नीयत पर संदेह उत्पन्न करते हैं.

सच्चाई जो भी हो, लेकिन देश के नेतृत्व ने उनकी सुरक्षा बढ़ा दी है. यह अच्छी बात है. देश के बौद्धिक ख़ज़ाने को बचाकर रखना देश का कर्तव्य है. इंतज़ार बस उस चुप्पी के टूटने का है जो क्रांतिकारी विचारों वाले ‘एक्टिविस्ट’ साधे हुए हैं. स्पष्ट है कि इस समय अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार और असहिष्णुता गम्भीर निद्रा में है.

दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.

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