UP में चुनावों की सरगर्मी

मौसम में धीरे धीरे गर्मी बढ़ रही है लेकिन उससे कहीं अधिक देश में चुनावी सरगर्मी देखने को मिल रही है. सभी राजनीतिक दलों का सियासी पारा सातवें आसमान पर है. लोकसभा चुनावों की वोटिंग की तारीख़ जैसे जैसे नज़दीक आ रही है, राजनीतिक उठापटक में तेज़ी देखने को मिल रही है.

राजनीतिक समीकरण के अतिरिक्त देश के प्रमुख राजनीतिक दल सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश को मुख्य रूप से साधने की कोशिश कर रहे हैं. उत्तरप्रदेश में लोकसभा की अस्सी सीटें हैं, इस लिहाज से राजनीतिक दलों की यूपी में घेराबंदी स्वाभाविक है. लोकसभा चुनावों के परिपेक्ष्य में यह भी कहा जाता है कि ‘दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर ही गुज़रता है’. यूपी में एक ओर जहां सपा-बसपा ने जातिगत वोटों के ध्रुवीकरण के लिए गठबंधन का सहारा लिया तो दूसरी ओर कांग्रेस ने 44 को 272 में बदलने के लिए 72000 का सहारा लिया है. साथ ही भाजपा विकास व राष्ट्रवाद का शंख फूंककर वोटर्स को साधने में लगी है.

जब बात यूपी की हो तो धर्म नगरी वाराणसी की बात करना ज़रूरी हो जाता है. भले ही यहां अंतिम चरणों में वोटिंग होनी हो, लेकिन भाजपा द्वारा उम्मीदवारों की पहली सूची में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाराणसी से चुनाव लड़ने की घोषणा करके उन तमाम अटकलों पर विराम लगा दिया, जिसमें कहा जा रहा था कि श्री मोदी वाराणसी के अतिरिक्त कहीं और से चुनाव लड़ सकते हैं.
वाराणसी से नरेंद्र मोदी जी के प्रत्याशी घोषित होने के साथ ही धीरे धीरे यह भी तय होता जा रहा है कि उनके खिलाफ वाराणसी से चुनाव लड़ने की हिम्मत बड़ा नेता नहीं जुटा पा रहा है.

हालांकि शुरुआत मे हार्दिक पटेल का नाम वाराणसी से चुनाव लड़ने को लेकर चर्चा में आ चुका है. भीम सेना के चन्द्रशेखर आजाद भी मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने की इच्छा जता चुके हैं, लेकिन तस्वीर अब भी धुंधली ही नजर आ रही है. पिछली बार वाराणसी में मोदी जी के हाथों मिली हार के चलते केजरीवाल ने भी इस संबंध में अब तक कुछ नहीं कहा है.

उत्तरप्रदेश की 80 में से 48 सीटों पर यादव, मुस्लिम व दलित फ़ैक्टर काम करता है. यह फ़ैक्टर धुरंधर प्रत्याशियों के समीकरण को भी बिगाड़ने की क्षमता रखता है. 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में इन सीटों में से अधिकांश पर भाजपा प्रत्याशी विजयी हुए थे जिसके चलते ही भाजपा केंद्र की कुर्सी में काबिज़ हुई थी. पिछले लोकसभा चुनाव की सबसे खास बात यह थी कि अधिकांश सीटों पर लड़ाई त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय हुई थी. इसी का परिणाम था कि कई सीटों पर भाजपा को अपेक्षाकृत कम वोटों से ही जीत मिल पायी थी. इस बार उत्तरप्रदेश का माहौल पहले की तुलना में बहुत अलग है.

सूबे में सपा- बसपा एक होकर भाजपा और कांग्रेस को चुनौती दे  रहे है. वहीं कांग्रेस प्रियंका के सहारे अपना जनाधार वापस लाने की  कोशिश कर रही है. राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो भाजपा 2014 के आंकड़े से थोड़ा दूर रह सकती है, लेकिन उसके पास कई सकारात्मक मुद्दे हैं. भाजपा के पास कुशल संगठनकर्ता है. साथ ही भाजपा द्वारा केंद्र में मोदी सरकार के पांच साल व योगी सरकार के दो साल में किए गए कार्यों को गिनाकर भी मतदाताओं को आकर्षित किया जा सकता है. जबकि विपक्ष केवल अंधेरे में लाठी चलाने का काम कर रहा है.

यदि बात पिछले लोकसभा चुनाव की जाए तो भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में यूपी में 42 फ़ीसदी वोट के साथ 71 सीटें हासिल की थीं. 2014 में सपा को 22 फीसदी वोट के साथ 7 सीटें मिलीं थीं. कांग्रेस को सभी सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद भी सिर्फ 7 फीसदी वोट के साथ मात्र दो सीटों में ही जीत हासिल हुई थी. जबकि बसपा को 19 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन सीटों का खाता भी नहीं खुल पाया था. राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि 2014 में मोदी लहर में उत्तर प्रदेश के चुनाव जाति-धर्म समीकरणों से ऊपर विकास के मुद्दे पर लड़े गए थे. इस कारण मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर भी भाजपा को भारी-भरकम मतों से जीत हासिल हुई थी.

बहरहाल, देखना यह है कि आगमी लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दलों की स्थिति कैसी रहती है. क्या भाजपा 2014 के प्रदर्शन को दोहरा पाएगी या फिर गठबंधन में आयी सपा−बसपा या फिर कांग्रेस कुछ कर पाएंगे.

देखते हैं कि आख़िर उत्तर प्रदेश का चुनावी ऊंट किस करवट बैठता है. इस लोकसभा चुनाव में यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि बीते कई दिनों से किसी भी राजनीतिक दल ने ईवीएम पर सवाल नहीं उठाए हैं.

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2 Comments

  1. amit sen
    March 27, 2019 - 11:53 am

    good job..

  2. Deependra Yadav
    March 29, 2019 - 7:44 am

    राहुल गांधी की घोषणा : देश को फ़ायदा या नुकसान
    क्या मुफ़्त में हर महीने 6000 देने का वादा करना सही??
    राहुल गांधी से पूछा गया कि इतने बड़े देश में ऐसा कैसे सम्भव है जवाब था हमने विशेषज्ञों से बात कर ली है हम मैनेज कर लेंगे.अन्दाजा लगाना कठिन नहीं हैं कि मैनेज कैसे होगा . इसके लिए अन्य मदो में कटोती करनी पडेगी इसमे शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि भी शामिल हो सकते हैं, विशेषज्ञों के अनुसार इस योजना मे आया खर्च बजट का 13% और कुल जीडीपी का 2% होगा यह राशि कितनी बड़ी होगी इसका अन्दाजा इससे लगा सकते हैं कि हमारा भारी भरकम रक्षा बजट भी जीडीपी के सिर्फ 1.5% होता है . इससे तो इनकार नही किया जा सकता कि ये फ़ैसला पूरी तरह से चुनावी मोड में किया गया इसमे कुछ अच्छी बात भी हो सकती है और लोगों पर इसका क्या प्रभाव पाडेगा जब उन्हे इतना मुफ़्त में ही मिल जाएगा ये भी एक अलग से चर्चा का विषय है. लेकिन इससे हमारी समग्र अर्थव्यवस्था पर क्या पडेगा ये देखना बहुत जरुरी है .बेहतर होता कि राहुल गांधी गरीबी के खात्मे के लिए इस सस्ती किस्म महँगी योजना के बजाए अधिक रोजगार सृजन, शिक्षा और अनुसंधान पर अपना विजन लोगों के सामने रखते इससे देश की अर्थव्यवस्था को भी गति मिलती है पैसे बाँटने से गरीबी दूर नहीं होती है आज के युग में जब रोजगार के लिए शिक्षा और अनुसंधान में निवेश करने की सख्त जरुरत है तब नेताओ के इस तरह की मुर्खतापुर्ण योजना की घोषणाए करना उनके अविवेक और वास्तविकता के प्रति अञानता को प्रदर्शित करता है. हमारे देश में लोगों के लिए अच्छी शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है कालेज और युनिवर्सीटीज संसाधनों की कमीं से दो चार हैं किसानों को अच्छे किस्म के उन्नतशील बीज और खाद नही मिल पाते,और भी बहुत सी चीजे हैं जिन पर योजना बनाकर काम करने की जरूरत है पर दुर्भाग्य से इन सब चीजो पे बात नहीं हो रही जो गरीबी के मूल कारण हैं .देश के नेता सिर्फ़ वही तक सोच रहे हैं जहाँ तक उन्हे चुनावी फ़ायदा नजर आता आ रहा है, लेकिन उन्हे समझना होगा की देश की जनता उन्हें इस आशा से सत्ता सौपती है कि वे देश की बेहतरी के लिए सबसे अच्छे और प्रासंगिक निर्णय लेंगे.

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