आधुनिक काल का सबसे बड़ी सुविधाओं में एक यह है कि यहां तकनीक और प्रौद्योगिकी के माध्यम से उन जगहों तक भी पहुंचा जा सकता है जो आज तक हमारी पहुंच से दूर थे. इसके बाद भी हमारी सोच इस आधुनिक काल से बहुत आगे की है. एक भारतीय होने के नाते हम यह समझ सकते हैं कि कल्पना की उड़ान सांतवे आसमान से भी ऊंची होती है. हमारे यहां कवियों और साहित्यिक रचनाकारों की कोई कमी तो है नहीं, लेकिन इनके बीच कुछ ऐसे भी लोग घुस आए हैं जो मातृभाषा हिंदी को ही लज्जित नहीं करते, बल्कि भारतीय संस्कृति को भी शर्मसार करते हैं.
अभी सोशल मीडिया के मकड़जाल के बीच हमारी नज़र एक आर्टिकल पर पड़ी. सच कहें तो इस आर्टिकल की हैडिंग ने हमें ज़्यादा इसकी ओर आकर्षित किया. हैडिंग थी ‘वीर्य का त्योहार खत्म, अब भीगी हुई लड़कियों की तस्वीरें देखें’.
सहसा हमें ध्यान आया कि कहीं हम इस मकड़जाल में उलझकर मनोहर कहानियों के दफ्तर में तो नहीं पहुंच गए. नज़र घुमाई तो पता चला कि ये ‘लल्लन’ मियाँ की रचना है. कहो तो वो आम को भी अंगूर सिद्ध कर दें, लेकिन होली जैसे त्योहार को इस छवि में प्रस्तुत करने की उनकी कला हमारे गले नहीं उतरी.
चलिए मान लेते हैं कि होली हंसी ठिठोली का त्योहार है. लेकिन इसके बीच भी एक ‘लाज का बंधन’ होता है. उसको तोड़ने की कोई आवश्यकता यहाँ हमें तो नहीं दिखाई देती है. संभव है कि लल्लन मियाँ इस आर्टिकल द्वारा होली को बदतमीजी’ का सांस्कृतिक लाइसेंस समझकर सड़कों पर मर्यादा तोड़ने वालों की बात कर रहे हो, लेकिन जिस लबादे में लपेट कर इन्होंने यह बात रखी है, वह अत्यंत निंदनीय है. ताज़ा खबर यह है कि इस आर्टिकल को चुपके से ‘रिसायकल बिन’ में डाल दिया गया है.
सनद रहे कि पिछले दिनों इन्ही के गोत्र के एक और क्रांतिकारी लेखक ने प्रधानमंत्री द्वारा नार्थ ईस्ट के एक राज्य के सांस्कृतिक पहनावे को भी अपने घटिया ‘सरकाज्म’ वाले रडार में ले लिया था. इसको देखने के बाद कई लोगों ने इनको अपने रिमांड पर लिया था. बाद में माफ़ी मांगकर मामला रफा दफा किया गया. लेकिन एक बार फिर से स्वच्छ लेखन की उस मर्यादा को तोड़ा गया है जिसके लिए भारत की मातृभाषा हिंदी प्रसिद्ध है.
‘लल्लन’ मियाँ से यह गलतियां विगत कुछ दिनों में ज़्यादा ही हुई हैं. अभी पिछले दिनों इनके आधिकारिक फेसबुक एकाउंट से एक लेख शेयर किया गया. उस लेख की हैडिंग थी ‘बिकिनी, पैंटी, थॉन्ग : कितने तरह की होती हैं औरतों की चड्डियाँ?’ मतलब दुग्गल साहब साबित क्या करना चाहते हो?
ऐसी गलतियां तब होती हैं जब लोकप्रियता की रेस में आप कहीं न कहीं पिछड़ने लगते हैं. जब आपको यह आभास होता है कि जो पहले आपके प्रशंसक हुआ करते थे, वो अब आपकी रचनाओं को उतना भाव नहीं देते हैं. इस चक्कर में आप ‘इनोवेशन’ वाली लिबर्टी लेते हैं, लेकिन जब वो एक सीमा से बाहर हो जाती है, तब ऐसी जानबूझकर की गयी गलतियां दिखाई देती हैं. लिबर्टी का अर्थ यह नहीं होता है कि आप अपनी सीमाओं को तोड़ दें. हाँ, यदि आपकी शुरुआत ही मनोहर कहानियों वाली थीम पर हुई हो तो फिर एकदम सही रास्ता पकड़े हो गुरु!
लेकिन यदि आप गंभीर समाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक छवि प्रस्तुत करने के उद्देश्य से अस्तित्व में आये हैं तो आपके लेखकों से हो रही यह गलतियां आपकी भी पेशानी पर बल डालता होगा. यदि रचनाओं में पहले वाली बात नहीं रही, तो यहाँ ‘क्लिक बेट’ वाले खेल की नहीं अपितु सही विषयों को चुनने की आवश्यकता है. मेहनत करने की आवश्यकता है.
कहने का मतलब बस यह है कि कल्पना की उड़ान को मर्यादा की सीमा में रखना सीखें. जब यह अपनी सीमाओं से ऊपर उड़ने लगती है तो ऐसे ब्लंडर होते हैं. इससे आपके ‘व्यंग’ की ही बदनामी नहीं होती अपितु हिंदी भाषा का भी गौरवशाली शीश झुकता है. आशा है कि आने वाले समय में व्यंग्य और फूहड़ता के बीच भेद समझा जाएगा, क्लिक के लिए फूहड़ता नहीं परोसी जाएगी और हमें बेहतर लेखन के उदाहरण देखने को मिलेंगे.
दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.


5 Comments
Excellent sir thanks for to showing mirror to lallantop
ये बहुत अच्छा लिखा है और लल्लनटाप के मुह पर सादर जोरदार तमाचा है जिन्होने भी लिखा उनसे आग्रह रहेगा आगे भी ऐसे सस्ते लेखको को आइना दिखाते रहें, गुड वर्क 👍👍
कल से ही आपकी ये पोस्ट रन हो रही है कई बार की कोशिश के बाद अभी पेज ओपेन हुवा।
लल्लन टॉप की फॉलोवर थी पहले इसी तरह की कोई वाहयात पोस्ट आते ही अनफॉलो कर दिया।
वैसे सोच सोच की बात है। कुछ प्रसिद्ध होने के लिये लिखते हैं तो सच दिखाने के लिये, किसी को लाईक कमेन्ट की भूख होती है तो कोई सिर्फ अपने व्यूवर और फॉलोवर्स को देख कर ही संतुष्ट हो लेता है।
Gud bro…sir ji