केसरी! शहीदी का रंग है. बलिदान का रंग है. इसी रंग को बड़े पर्दे पर ले कर आये हैं अक्षय कुमार. यह देख कर अच्छा लगा कि टिपिकल कमर्शियल फिल्मों की भीड़ में एक कलाकार ऐसा भी है जो क्वालिटी पर ध्यान दे रहा है. ऐसा विषय चुनने के लिए अक्षय कुमार बधाई के पात्र हैं. हमने अक्षय कुमार का वो दौर भी देखा है जहां फ्लॉप फिल्मों की एक लंबी लिस्ट उनके पीछे चलती थी, लेकिन इस व्यक्ति ने एक्सपेरिमेंट कभी नहीं छोड़ा. आज उसी का परिणाम है कि सक्सेस का दूसरा नाम अक्षय कुमार हैं. यही चीज़ अक्षय की फिल्मों में भी नज़र आती है.
अब बात करते हैं केसरी फ़िल्म की. इस फ़िल्म में वो सब कुछ है जो एक राष्ट्रभक्त को चाहिए होता है. जैसा कि हमने बताया कि यह कोई टिपिकल कमर्शियल बॉलीवुड की फ़िल्म नहीं है जहां नायक असीमित शक्ति लिए दुश्मनों को छठी का दूध याद दिला देता है. यह सत्य के धरातल पर बनी एक प्रेरक कहानी है. इसमें एक इंसान की शारीरिक सीमाओं का ध्यान रखते हुए यह बताया गया है कि व्यक्ति संख्या से नहीं, सोच से छोटा होता है. खासकर वो भाग आपको आभास कराएगा जब 21 सिख 10,000 अफ़ग़ानों के समक्ष ढोल बजाते हुए ललकार रहे थे. फ़िल्म के अंत में आपको पता चलेगा कि किसी भी जंग में जीत और हार से ऊपर होता है आपका पुरुषार्थ. 1897 में 10,000 अफ़ग़ानियों के सामने जिस बहादुरी के साथ सारागढ़ी के किले को बचाने के लिए 36 सिख रेजिमेंट के 21 सिख लड़ें, वो अद्वितीय है. अविश्वसनीय है. जंग लड़ना दूसरी बात है, लेकिन हार सुनिश्चित है यह जानते हुए भी सीना चौड़ा कर दुश्मन से भिड़ने वाला व्यक्ति ही भारत में ‘मर्द’ कहा जाता है. सारागढ़ी में उस समय की 36 सिख रेजिमेंट के सभी सिख उसी मर्दानगी का चेहरा है.
यह फ़िल्म आपको याद दिलाएगी की इस पावन मिट्टी की रक्षा करने के लिए हमने कितने बेटों के बलिदान दिये है. कितने पिताओं ने अपने बेटे और कितनी माओ से अपने कलेजे के टुकड़े को कुर्बान किया है. फ़िल्म का क्लाइमेक्स देख कर आप यह समझ जाएंगे कि यह फ़िल्म आपके अंदर के हिंदुस्तानी खून को पुकारती एक कहानी है. एक इंटरव्यू में नायक अक्षय कुमार ने कहा था कि उनको गुस्सा आता है जब वो यह सुनते हैं कि यह कहानी इतिहास के पन्नो में दर्ज नहीं है. उनकी बात सही है. कम से कम विदेशी आक्रमणकारियों के महिमामंडन से तो बेहतर ही थी यह कहानी. खुशी इस बात की है कि अब सिनेमा के माध्यम से हमारे बच्चे यह जान पाएंगे कि केसरी का असल मतलब क्या होता है.
इतिहास में जिन 21 सिखों ने यह लड़ाई लड़ी, उसने इस बिरादरी के हमारे देश के लिए दिया हुआ अतुलनीय योगदान एक बार फिर से याद दिला दिया. एक तरफ जहां हमारे यहां सरदारों को चुटकुलों की कौम बनाने के प्रयत्न हुए, वहां इस बिरादरी ने हमेशा से अपने पुरुषार्थ से इस देश की मिट्टी को सींचा है. गुरु गोबिंद सिंह और उनके वंशजो का आभारी यह देश सदैव रहेगा. यह फ़िल्म किसी लड़ाई में लोगों की शहादत का संदेश नहीं देती, बल्कि आपके आत्मसम्मान को पुकारती है. यह बताती है कि लड़ो तो ऐसे लड़ो की दुश्मनों की फौज में भी तुम्हारे नाम का हल्ला हो जाये. अंत में यही होता भी है.
इस बीच हाइपर नेशनलिज़्म वाले लेखक गण भी इस फ़िल्म को रिव्यू देने में लग चुके हैं. समझ में यह नहीं आता है कि हर देशभक्ति वाली फिल्म उनको हाइपर नेशनलिज़्म क्यों लगती है. कुछ लेखों में यह लिखा गया कि यह फ़िल्म ‘इस्लामोफोबिया’ ‘हाइपर नेशनलिज़्म’ और ‘एन्टी मुस्लिम एजेंडे’ को प्रोमोट करती है. समझ से परे है कि एक फ़िल्म पर इतनी गालियां क्यों निकाली जा रही हैं. इतिहास के झरोखे से क्या यह बात गलत है कि 10,000 अफ़ग़ानों ने 21 सिखों से लड़ाई की थी? इसी सच को तो फ़िल्म निर्माता ने बस बड़े पर्दे पर उतारा है. किसी तथ्य को ‘क्रिएटिव लिबर्टी’ के साथ बड़े पर्दे पर उकेर देना एक ‘स्किल’ होता है. यदि आप उसकी प्रशंसा नहीं कर सकते हैं तो कृपया उसको बुरा तो मत कहिए.
इस देश की नींव उसी राष्ट्रवाद पर रखी गयी है जिसको आज AC कमरों में बैठे लोगों ने ‘हाइपर नेशनलिज़्म’ का नाम दे दिया है. अपनी नींव पर ही आघात करने वाला व्यक्ति परिवार का हितैषी तो नहीं हो सकता है. भारत नामक परिवार को भी अपनी नींव की रक्षा करनी पड़ेगी. उन 21 सिखों के सर्वोच्च बलिदान को यदि कोई ‘हाइपर नेशनलिज़्म’ कहे तो यह उसकी अपनी सोच हो सकती है. और किसी की व्यक्तिगत सोच पूरे राष्ट्र की सोच नहीं हो सकती है. आज भी देश की सीमा पर खड़ा जवान अपने सीने पर गोली खाता है तो यह नहीं सोचता कि मेरे इस कृत्य को देश के कुछ लोग ‘हाइपर नेशनलिज़्म’ कहेंगे. वो अपने प्राणों की आहुति इस राष्ट्र की अखंडता के लिए देते हैं. बॉलीवुड में आज कल यदि उन वीर हुतात्माओं के संघर्ष और बलिदान को सम्मानित किया जा रहा है तो यह एक अच्छी बात है. यदि कुछ लोग इसको ‘बीमारी’ की संज्ञा देते हैं तो ईश्वर करे कि इसका कोई ‘एंटीडोट’ न बने. क्योंकि ऐसे ही एंटीडोट्स देने वालों के कारण बंटवारे के बाद यह ज़मीन हमारे देश से अलग हो गयी, जिसके लिए 36 सिख रेजिमेंट के वो 21 सिख बलिदान हुए थे. यह फ़िल्म हमें उस क्षति के बारे में भी याद दिलाती है कि कैसे वीरता के ऊपर राजनैतिक महत्वाकांक्षाओ ने हमें आघात पहुंचाया है. आज उन्हीं महत्वकांक्षाओं के कारण जन्मा राजनैतिक ‘इकोसिस्टम’ हमारी सोच पर प्रहार कर रहा है. इसको रोकना है.
यदि आप एक फिल्म प्रेमी हो, तो आपको यह फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिए. नहीं भी हो, तब भी अपने बच्चों को ले कर यह फ़िल्म देखने जाएं. उनको बताएं कि अपनी मिट्टी की रक्षा करना कितना आवश्यक है. 36 सिख रेजिमेंट को भी मालूम था कि वो अंग्रेज़ो की तरफ से लड़ रहे हैं, लेकिन उनको ज्ञात था कि जिस मिट्टी को बचाने के लिए वह लड़ रहे हैं, वो उनके ही देश की मिट्टी है. किसी व्यक्ति विशेष के अभिमान से ऊपर देश का अभिमान होता है. यदि आपकी आंखों में आंसू आ जाये तो समझियेगा की आप भी लेफ्ट बिरादरी द्वारा नामित ‘हाइपर नेशनलिज़्म’ के शिकार हो गए हैं. यकीन मानिए कि इस बीमारी से ज़्यादा आनंद किसी चीज में नहीं है.
अंत में, जो बोले सो निहाल…सतश्री अकाल!
