अविभाजित भारत के करांची नगर में एक उच्चवर्गीय परिवार का 14 वर्षीय किशोर अपने मित्र के साथ टेनिस खेल रहा था. शाम का समय था. अचानक मित्र टेनिस का खेल छोड़कर जाने लगा. उसने कहा कि शाखा का समय हो गया। 14 वर्षीय किशोर भी कौतूहलवश अपने मित्र के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शाखा चला गया. मित्र का तो पता नही लेकिन 14 वर्षीय किशोर पिछले 77 वर्षों से उसी शाखा में रमा हुआ है.
मिशनरी विद्यालय में पढ़ने वाला और सिर्फ अंग्रेजी बोलने वाला किशोर शाखा और संघ में ऐसा रमा कि धोती पहनने लगा, हिंदी सीख गया और मांसाहार का त्याग कर दिया. यह किशोर ही दुनिया में लालकृष्ण आडवाणी और अपने वैचारिक परिवार में लालजी के नाम से जाना जाता है.
आडवाणी जी का चरित्र ऐसा है कि उनके धुर आलोचक और जाने माने साहित्यकार खुशवंत सिंह ने उनकी आलोचना में कहा था कि आप शराब नही पीते, मांसाहार नही करते, जुआ नहींं खेलते, परस्त्रियों में रुचि नही रखते, आप जैसे लोग बेहद खतरनाक होते हैं.
सार्वजनिक जीवन मे शुचिता का आग्रह ऐसा था कि जैन हवाला कांड की डायरी में जांच अधिकारियों ने नाम लिख दिया तो संसद से त्यागपत्र दे दिया और तब तक चुनाव नहीं लड़े जब तक निर्दोष प्रमाणित नही हुए. राजनीतिक कौशल ऐसा कि दो सीटों वाली पार्टी को मात्र 2 वर्षों में राजनीति के केंद्र में ला खड़ा कर दिया.
भाजपा के लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी इस बार चुनाव नही लड़ेंगे. भारतीय जनता पार्टी ने इस बार गाँधीनगर सीट से अमित शाह को टिकट दिया है. ऐसा लगता है कि लालकृष्ण आडवाणी के 7 दशक लंबे अर्थपूर्ण राजनीतिक जीवन का पटाक्षेप हो गया है. अब वे 91 वर्ष के हैं. स्वस्थ हैं लेकिन उम्र का तकाजा तो होता ही है.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे लालकृष्ण आडवाणी का राजनीतिक जीवन सुंदर सिंह भंडारी के सचिव के रूप में आरम्भ हुआ. जल्दी ही दिल्ली भेज दिए गए और अटल बिहारी वाजपेयी के सहयोगी बन गए. आगे चलकर भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष भी रहे लेकिन उनका राजनीतिक कौशल उस समय देखने मे आता है जब वे भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बने.1985 में इंदिरा लहर के सामने हर राजनीतिक पार्टी पस्त थी. भाजपा मत प्रतिशत में नम्बर 2 पार्टी रही लेकिन सीटें दो ही आईं. आलोचकों ने तो भाजपा का मर्सिया तक पढ़ दिया था. कहा गया कि हिंदुत्व की राजनीति के लिये देश मे स्थान ही नही है. यहाँ तक कि वाजपेयी भी निराश थे. उधर विपक्ष की जमीन पर कब्जा करने के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह ‘राजा नही फ़क़ीर है….’ का नारा लगवा रहे थे. इस कठिन दौर में लालकृष्ण आडवाणी ने हिंदुत्व को राजनीति का एजेंडा बनाया. समान नागरिक संहिता पर बात की, कश्मीर के स्पेशल स्टेटस को मुद्दा बनाया और राम मन्दिर पर विश्व हिंदू परिषद को समर्थन देने की घोषणा की. आडवाणी ने पढ़े-लिखे मध्यवर्ग को खूब आकर्षित किया.
90 के दशक में जवान हुए लाखों ऐसे लोग मिलेंगे जो लालकृष्ण आडवाणी के भाषणों को सुनकर भाजपाई बन गए और तीन दशक से भाजपाई बने हुए हैं. हिंदुत्व की राजनीति को फ्रिंज से मुख्यधारा में लाने का श्रेय आडवाणी को ही जाता है.
1988-1995 के भाजपाई राजनीति के दौर में वाजपेयी नेपथ्य में थे और आडवाणी ही रथ पर आरूढ़ थे लेकिन उस दौर में जब सत्ता के लिये राजनेता एक दूसरे का गला काटने को तत्पर हैं, इस देश ने वह समय भी देखा जब 1995 के मुंबई अधिवेशन में लालकृष्ण आडवाणी ने बिना किसी से चर्चा किये अपने राजनीतिक अग्रज अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय जनता पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया.
अपने सर पर रखा ताज उठाकर किसी और के सर पर रखना त्रेता युग में भी छोटी बात न थी, कलियुग की छोड़िए.
इंदिरा गाँधी के बाद का जो राजनीतिक दौर है, उसे दो राजनेताओं ने बहुत प्रभावित किया है. एक विश्वनाथ प्रताप सिंह जो गिरते पड़ते प्रधानमंत्री बन गए और दूसरे लालकृष्ण आडवाणी जो प्रधानमंत्री न बन सके. वीपी सिंह की मंडल राजनीति ने कम से कम ‘गाय पट्टी’ की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया. वहीं लालकृष्ण आडवाणी की हिंदुत्व की राजनीति ने भाजपा का वटवृक्ष खड़ा कर, राजनीतिक विमर्श को ही बदल दिया.
आडवाणी जी का जीवन सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए अनुकरणीय है. उनके लिए भी जो उनसे वैचारिक सहमति रखते हैं और उनके लिए भी जो असहमति रखते हैं. 91 वर्ष की उम्र में भी वे सक्रिय हैं, स्वस्थ हैं. कभी विचारधारा से समझौता नही किया. चालू राजनीति के हिसाब से खुद को ढालने की जगह राजनीति को ही अपनी विचारधारा के हिसाब से बदल दिया. व्यक्तिगत जीवन मे भी उच्च आदर्शों का पालन किया. कभी भ्रष्टाचार से समझौता नही किया. लाखों कार्यकर्ता और सैकड़ों नेताओं को राजनीति के लिए तैयार किया. परिवारवाद से दूर रहे.
लालकृष्ण आडवाणी भारतीय राजनीति में हमेशा मील के पत्थर रहेंगे.

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Bahut badiya👍