होली आ रही है, लिबरल भी आते होंगे..

पिछले कुछ वर्षों से कुछ चलन ऐसे बन गए हैं जो एक नज़र में शायद सही लगे पर अंततः केवल दोहरे पैमाने वाली औपचारिकता मात्र रह जाते हैं. जैसे एक महीने पहले ही होली की बधाई देना और होली आते ही पानी की चिंता करना, पालतू और सड़क पर घूम रहे जानवरों की चिंता करना. आर्टिकल लिखते लिखते हुए एक वीडियो पर नज़र पड़ी जिसमें एक बच्ची तब तक रंग लगवा रही है, जब तक सभी बच्चों के रंग नही खत्म हो जाते. सारा कार्यक्रम होने के बाद वह अपने पालतू कुत्ते को बाहर बुलाती है और सभी बच्चों को एहसास होता है कि उन्हें रंग नहीं फेंकना चाहिए था.

एक नज़र में देखे तो बात सही है. उन मासूम जानवरों को आखिर क्यों परेशान करना, उन्हें होली के जहरीले रंगों में क्यों रंगना लेकिन ज़रा ठहरिए और दो पल सोचिये कि क्या यही दया भावना बाकी जानवरों को नहीं मिलनी चाहिए? बकरीद के दिन कटता हुआ बकरा और अन्य दिनों में कटती हुई गाय भी शायद इस वीडियो बनाने वाले से यह सवाल करना चाहेगी; “आखिर उसमे ऐसा क्या है जो मुझमे नहीं?” शायद बकरी और गाय या कोई भी जानवर केवल इसलिये दया के पात्र नहीं हैं क्योंकि उन्हें होली या दीवाली के दिन परेशान नहीं होना पड़ता. हां, जलीकट्टू आ जाए तो अलग बात है. फिर हफ्ते में पांच बार गाय का मांस खाने वाले भी आपको पशु प्रेम पर ज्ञान देने आ जाएंगे.

पशु प्रेम ही नहीं, लिबरलों का पर्यावरण प्रेमी भी समय समय पर जाग जाता है. समय समय से हमारा मतलब है हिन्दू त्योहारों के वक्त. पटाखे मत जलाइए और होली है तो पानी से मत खेलिए. केवल इसी एक दिन ही तो हमें अपनी धरती माँ की चिंता करनी है. भले ही साल के बचे हुए 364 दिनों में हम 24 घन्टा AC चलाएं और ब्रश और शावर लेते वक्त नल फुल पर ऑन करके घंटों नहाएं, किसको पड़ी है? होली के एक हफ्ते पहले हम प्लेकार्ड लेकर खड़े हो जाएंगे. फिर भले ही होली के बाद कार धोने के लिए सुबह सुबह म्युनिसिपालिटी के नल से बेहिसाब पानी बहाएं. 

हो सकता है इन चंद आवाज़ों में कुछ सच्चे पर्यावरण प्रेमी भी हों. लेकिन ईद पर बकरी की चिंता, मांस काटने और बनाने तक के समय तक पर्यावरण को होता नुकसान, क्रिसमस में कटते पेड़, दिन भर जलती लाइटें, फूटते पटाख़ों की आवाज़ में इन पर्यावरण प्रेमियों की आवाज़ कहाँ गुम हो जाती है? 

चाहे सूरज हो या पानी या आग या एक पौधा, हम हिन्दू सदैव उनमें देवता देखते आए हैं. धर्म की सीख ही कुछ ऐसी है जो हमें इनका ऋणी बनाती है और यह सिखाती है कि प्रकृति का सम्मान सर्वोपरि है. माना कि हममें से ज्यादातर लोग इन संस्कारों को भूल चुके हैं पर इन मौसमी एक्टिविस्टों का यह समझना जरूरी है कि इनके आने से कहीं पहले से हमारा धर्म और संस्कृति इनसे बेहतर पाठ पढ़ाते आई है.


दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.

Writer by fluke, started with faking news continuing the journey with Lopak.