देश के पूर्व रक्षा मंत्री और गोवा के मुख्यमंत्री श्री मनोहर पर्रिकर का निधन राजनीति की उस धारा के लिए अपूरणीय क्षति है जिसमें न व्यक्तिगत महत्वकांक्षा के लिए स्थान है, न दिखावा है, न नाटकीयता है और जो धारा स्वतन्त्रता के पश्चात लगातार पतली होती गई है. भाजपा अपने कार्यकर्ताओं को सिखाती है कि व्यक्ति से पहले दल है और दल से पहले है राष्ट्र. मनोहर पर्रिकर ने इस मंत्र को मानो आत्मसात कर लिया था.
राजनीति में तो सादगी का अभिनय तो कितने ही करते हैं लेकिन जिन थोड़े लोगों ने सादगी और सहजता से अपना जीवन बिताया है, उनमें से एक थे मनोहर पर्रिकर.
पर्रिकर छोटी उम्र में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे. 1978 में आईआईटी बॉम्बे से स्नातक करने के बाद किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में शानदार सैलरी पर नौकरी करने का विकल्प उनके पास था. लेकिन उन्होंने संघ कार्य को प्राथमिकता दी और गोवा लौट आये. संघ और गोवा से पर्रिकर का जो भावनात्मक लगाव था, वह कई बार सामने आता है. उस समय गोवा में संघ का कोई खास संगठन नही था. मनोहर पर्रिकर ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया. अगले 10 वर्षों में आरएसएस का संगठन गोवा के हर कोने में पहुँच गया. विशेषकर उत्तर गोवा में आरएसएस का संगठन खड़ा करने में मनोहर पर्रिकर का योगदान बहुत बड़ा था. स्कूटर से घूम घूम कर पर्रिकर ने पूरे गोवा में संघ कार्य को फैलाया. स्कूटर की घुमक्कड़ी तब भी नही छूटी जब वे मुख्यमंत्री बन गए.
उन दिनों गोआ की राजनीति में भाजपा का कोई स्थान नही था. 1989 के चुनाव में भी भाजपा गोवा में एक भी सीट जीत नही सकी थी. यहाँ मुकाबला कांग्रेस और महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के बीच हुआ करता था. महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी हिंदुत्ववादी रुझान वाली पार्टी मानी जाती थी. इस कारण भी भाजपा की राह कठिन मानी जाती थी. इन परिस्थितियों में पर्रिकर को संघ से भाजपा में काम करने भेजा गया. पर्रिकर राजनीति में जाने को लेकर उत्साहित नही थे लेकिन संगठन के आदेश को शिरोधार्य कर भाजपा के काम मे लग गए. उन्होने स्कूटर पर घूम घूम कर पार्टी का संगठन बनाना शुरू किया. अपने अथक प्रयासों से वे गोवा में भाजपा के लिए जगह बनाने में सफल रहे. 1994 के विधानसभा चुनावों में 4 सीटों के साथ भाजपा ने गोवा में अपनी धमाकेदार एंट्री दर्ज कराई. जीतने वाले चार विधायकों में से एक मनोहर पर्रिकर भी थे. वे गोआ की राजधानी पणजी से जीते थे.
अपनी मनोहर शैली और सरलता के बल पर कब में मापुसा के पर्रा गांव में जन्म लेने ववाले मनोहर पर्रिकर हर गोआ वासी के प्रिय मनोहर भाई बन गए, यह भी एक अद्भुत कथा है।
फिर सन 2000 में वह समय भी आया जब पर्रिकर गोवा के मुख्यमंत्री बने. पर्रिकर आईआईटी से निकले पहले स्नातक थे जो पहले विधायक और फिर मुख्यमंत्री बने थे. मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल यादगार रहा. उन्होंने रिकार्ड समय में गोवा के इंफ्रास्ट्रक्चर को बदल कर रख दिया. अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह को गोवा लाने का श्रेय भी पर्रिकर को ही जाता है. उन्होने भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगाई.
मुख्यमंत्री होते हुए भी पर्रिकर ने कभी सरकारी घर नही लिया. अक्सर स्कूटर से पणजी घूमते देखे जा सकते थे. सुरक्षा के तामझाम और बड़ी गाड़ियों से हमेशा दूर रहे. उनकी छवि जनता के अपने मुख्यमंत्री की रही.
2007 में गोआ का चुनाव भाजपा हार गई लेकिन 2012 में मनोहर पर्रिकर ने पुनः मुख्यमंत्री के रूप में वापसी की. 2013 के भाजपा के गोवा राष्ट्रीय अधिवेशन में मनोहर पर्रिकर ने ही नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया था. 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और रक्षामंत्री के पद के लिए उन्हें एक योग्य और प्रामाणिक राजनेता की आवश्यकता महसूस हुई तो उन्होंने पर्रिकर को ही याद किया.
पर्रिकर दिल्ली की राजनीति के लिए नही बने थे लेकिन देश की जरूरतों को देखते हुए वे रक्षामंत्री बने. वह महज ढाई वर्ष तक वे देश के रक्षा मंत्री रहे लेकिन इस संक्षिप्त कार्यकाल में उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी.
उड़ी हमले के जवाब में सर्जिकल स्ट्राइक उनके ही कार्यकाल में हुआ था. रक्षा दलालों के दबाव को दरकिनार कर तेजस को भारतीय वायुसेना का हिस्सा बनाने का निर्णय पार्रिकर का ही था. सैनिकों की तीन दशक से लंबित ‘वन रैंक, वन पेंशन’ को पर्रिकर के कार्यकाल में ही लागू किया गया. रक्षा सौदों में उनके कार्यकाल में तेजी दिखी. राफेल की मांग भारतीय वायुसेना लंबे समय से कर रही थी, मनोहर पर्रिकर के कार्यकाल में ही यह सौदा भी हुआ.
लेकिन अचानक पर्रिकर ने गोवा की राजनीति में लौटने का निर्णय किया. पहले यह माना गया कि गोवा में गठबंधन की सरकार चलाने के लिए मनोहर पर्रिकर की वहाँ मौजूदगी जरूरी है, इसलिए उन्होंने रक्षा मंत्री का पद छोड़ दिया. लेकिन जल्द ही देश को पता चला कि वे अग्नाशय के कैंसर से पीड़ित हैं. 18 वर्ष पूर्व उनकी पत्नी मेधा का देहांत भी कैंसर की वजह से ही हुआ था.
शायद पर्रिकर अपने जीवन के आखिरी दिन अपने जन्मभूमि गोवा में ही बिताना चाहते थे. जानलेवा कैंसर से लड़ते हुए भी पर्रिकर ने हार नही मानी और आखिरी दिन तक गोवा की सेवा करते हुए अपनी जीवटता का परिचय दिया.
देश मनोहर पर्रिकर जैसे जाबांज रक्षामंत्री, शानदार मुख्यमंत्री और अद्भुत व्यक्तित्व को विस्मृत नहीं कर सकेगा. जीर्णता, रुग्णता या व्याधि से अविचलित अपने कर्तव्य पर अंतिम सांस तक जुटे रहने वाले मनोहर पर्रिकर वीआइपी कल्चर से दूर अपने पारदर्शी सार्वजनिक जीवन के लिए सदैव याद किए जाएंगे. छोटे गोवा के इस बड़े नेता को भगवान अपने श्रीचरणों में स्थान दें. ॐ शांति!
दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.

1 Comment
Thanks aap ka lekh bahut hi sandar hi .