उधर भी ‘लगभग’ सब मिले हुए हैं जी

प्रभु श्रीराम का दरबार सजा था. अंगद, सुग्रीव व हनुमान इत्यादि का बेसब्री से इंतजार हो रहा था. सीता मैया के खोज में गए सारी टुकड़ियां वापस आ गयी थी. बस इसी टुकड़ी की कोई खोज खबर नही था. वहीं हनुमान इस सबसे बेखबर लंका दहन करने में जुटे थे.

खैर, लंका दहन पश्चात हनुमान सीता मैया के पास जाकर उनसे आशीर्वाद लेते हैं और निशानी के तौर पर उनकी चूड़ामणि एवं अंगूठी मांग लेते हैं और तीव्र गति से वापस प्रभु श्रीराम के पास पहुँच जाते हैं. 

हनुमान कहते हैं; “मैं सीता मैया से मिल आया प्रभु”.

प्रभु श्रीराम उन्हें तुरंत अपने गले से लगा लेते हैं और कहते हैं; “कैसी है मेरी जानकी?”

हनुमानजी हैरानी से उन्हें देखने लगते हैं.

तब श्रीराम पूछते हैं; “हैरान क्यों हो तात?”

प्रभु, आपने मान लिया कि मैं सीता मैया से मिलकर आया हूँ?

हां, वत्स क्यों नही, तुम मेरे दूत हो मेरे सबसे विश्वासी सेवक हो, मेरी शक्ति हो, भला मैं तुम पर क्यों शंका करने लगा?

परन्तु प्रभु मैं सच में सीता मैया से मिलकर आया है, इसकी जांच तो कर लेते.

तुमने कह दिया न हनुमान तो वही बहुत है, पड़ताल किस बात की? ये कैसी बहकी बहकी बात कर रहे हो?

तभी नेपथ्य से मिसरी सी आवाज उभरती है और कानों में मिर्ची घुलकर पड़ती है; “इनकी बातों में न आएं प्रभु, सबूत सबसे जरूरी है. हम राजाओं को अपने सैनिकों पर भरोसा नही करना चाहिए.”

चकित श्रीराम बोले; “अब ये कौन घुस आया हमारे सभा मे? कौन हो तुम?”

तभी वह व्यक्ति प्रकट हुआ और उसने अपना दुखड़ा सुनाया; “प्रभु, मैं दिल्ली देश का मालिक हूँ. मैं बहुत दुखी हूँ क्योंकि मैं स्वयं को मालिक तो दिल्ली देश का मानता हूँ पर मोदी के लोग मुझे ‘लगभग’ चपरासी समझते हैं. मोदी ने तो मुझे ‘लगभग’ इग्नोर कर दिया है. मेरी पार्टी ‘लगभग’ ईमानदार भी नहीं रही. लिहाजा, प्रवृत्ति और प्रकृति मिलने के कारण कांग्रेस से उम्मीदें थीं कि वह गठबंधन कर लेगी और हमारी पार्टी चार पैसे चंदास्वरुप लेते हुए टिकट देकर ईमानदारी का छिड़काव करेगी. लेकिन कांग्रेस ने गठबंधन के लिए ‘लगभग’ ना कर दिया है. एक बार मुझे फिर मुझे अपना इरीटेटिंग पंचलाइन बोलने बाध्य कर दिया गया है – सब मिले हुए हैं जी. इस नाउम्मीदी में भी मैं आपका भला चाहता हूँ. आप पहले हनुमान से सबूत ले लीजिए और फिर मेरे गठबंधन का इन्तजाम कराकर मेरे दुखों का निवारण करिए वरना लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा. 1-2 सीट भी मुझे ‘लगभग’ मंजूर है.”

दयानिधान प्रभु ने क्रुद्ध हनुमान को इस व्यक्ति को दुखों से निवृत्त करने की आज्ञा दी. हनुमान ने आज्ञा का पालन किया. हनुमान की कृपा से दुखों का ‘लगभग’ निवारण करा चुका और साथ में उसका सबूत भी पा चुका वह व्यक्ति बड़बड़ाते हुए घूमते देखा गया हैं;

“उधर भी ‘लगभग’ सब मिले हुए हैं जी.”




फोटो क्रेडिट

घटिया शायर, फालतू लेखक

2 Comments

  1. BITTA
    March 10, 2019 - 11:04 am

    इस वाले मे मजा नही आया, दूत को दूर लिखा है!

  2. TUNTUN KUMAR SAH
    March 17, 2019 - 5:16 am

    Bahut khoob

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