पाकिस्तान में सर्वे तक अजीबोगरीब ही होते हैं. उनके इकोनॉमिक सर्वे 2017-2018 में दी गई जानकारी के मुताबिक वहाँ गधों की संख्या 53 लाख पहुंच गई है. गधों की संख्या के हिसाब से पाकिस्तान दुनिया का तीसरा देश है. हालाँकि वैशाखनन्दन कुनबे पर गहन शोध करने वाले गदहाविद यह मानते है कि यह सर्वे गलत है, वहाँ गधो की सही संख्या 17 के करोड़ के आस-पास होनी चाहिए.
गधों का व्यापार पाकिस्तान में फल फूल रहा है. गधों की सेहत के लिए यहाँ अस्पताल बनाया गया है, रोगों से बचाने के लिए उनका टीकाकरण किया जा रहा हैं. इनका टीकाकरण सफल होगा तभी तो पाकिस्तान पोलियो मुक्त होगा. मतलब अगर टीकाकरण के बाद गधे स्वस्थ रहेंगे और प्रजनन योग्य बने रहेंगे तो लोग भी बच्चों के टीकाकरण का बुरा नहीं मानेंगे.
मारखोर को विस्थापित करके गधों को हमारे पडोसी राष्ट्रीय पशु घोषित कर सकता हैं. पाकिस्तान में गधों के दूध का बना साबुन, फेस -वाश और क्रीम प्रचलित किया जा रहा है. हालाँकि परिस्थितियां घृत कुमारी की तरह नहीं हैं. काश, गधे के दूध का कोई फ्रेंच नाम होता, आलो वेरा की तरह होता तो हमारे पडोसी देश का अर्थशास्त्र कुछ अलग होता. मनुष्य के प्रतिरक्षा तंत्र में अत्यधिक लाभकारी हैं गधे का दूध, इस बात का प्रमाण पाकिस्तान की आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था है. कोई आ जाए सत्ता में, कोई मित्र या अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष अपने शर्तों के हिसाब से नाच नचवाये, पाकिस्तान की आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था उन सबसे अप्रभावी रहती हैं.
गधो का निर्यात मुख्यतः चीन को होगा. चलो कुछ तो पाकिस्तान से चीन ने आयात किया. चीनी दवाईयों में गधे के चमड़े का विशेष महत्व हैं. चीनियों के बारे में यह भी प्रसिद्ध है कि वो उत्पाद का कुछ भी व्यर्थ नहीं छोड़ते. चीनियों के खान -पान के बारे में लिखने की क्षमता इस लेखक में नहीं हैं. कौन किसका चमड़ा छुड़ा रहा हैं, यह भी इस लेख के विषय -वस्तु से ऊपर की कथा है. लेकिन एक सत्य यह है कि पाकिस्तान में अति -सुरक्षित क्षेत्रों में या तो चीनी जा सकते हैं या गधे. क्या भागते -भूत की लँगोट वाला मुहावरा का भाववार्थ चीनी समझते हैं? कुछ भरोसा नहीँ उनका, कन्फूसियस के कथनों की तरह.
भारत के नेता गण इस ख़बर से काफी खुश हैं. एक को यह समझ में आया कि भारत कितना पीछे रह गया हैं, निर्यात के मामले में. दुसरे को इस बात से प्रसन्नता हैं कि कुछ पाकिस्तानी युवक आतंकवाद का रास्ता छोड़ धंधे में लगेंगे.
लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि कप्तान के जवानी का राज गधे के दूध में छिपा हैं वरना 65 वर्ष की आयु में शादी की हिम्मत कौन कर सकता हैं. गधों के दूध के इंदौर से संबंध पर भारत में भी शोध जारी है. इंदौर में पले -बढ़े जिस व्यक्ति को 66 की उम्र में टंच -माल दिखता हैं और 68 की उम्र में शादी सुझती हैं, वह निश्चित ही गधे का कोई न कोई उत्पाद सेवन करता होगा. अपने यहाँ पाई जाने वाली गधों की प्रजातियों की जानकारी के लिए एक लेख-श्रृंखला भी निकट -भविष्य में आ सकती है, यदि कोई जाँबाज लेखक अभी भी भारत में बचा हो तो.
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