क्या हैं मुलायम के भाषण के मायने

कल सदन में सांसदों का विदाई भाषण चल रहा था. सभी सांसद अपनी बात सदन के समक्ष रख रहे थे. इसी बीच मुलायम सिंह यादव ने ऐसी बात कह दी कि उनके सामने बैठी सोनिया गाँधी भौचक्की रह गयी. मुलायम ने कहा कि वह चाहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही दोबारा प्रधानमंत्री बने. जिस महागठबंधन की इमारत को मज़बूत करने का प्रयास किया जा रहा है, उसकी नींव पर मुलायम का यह बयान किसी आघात से कम नहीं था. टीवी चैनलों पर बैठे दर्शको ने सोनिया गांधी के चेहरे की भाव भंगिमाएं देख कर ही पता लगा लिया था कि UP के नेता जी के मुंह से बयान नहीं बवाल निकला है.

पारंपरिक राजनीति की गहराई पर अच्छी पकड़ रखने वाले मुलायम सिंह यादव के बारे में कहा जाता है कि वह उत्तर प्रदेश की राजनीति को अच्छे से समझते हैं. सूबे के पूर्व मुखिया रहे मुलायम सिंह यादव के भाजपा के साथ उतने तल्ख रिश्ते कभी नहीं रहे जितने बसपा और सपा के बीच रहे हैं. अब राजनैतिक छींटाकशी का अभयदान तो भारतीय राजनीति सबको देती ही है. कम से कम मायावती और उनके हाथी के साथ साईकल की तल्खी को देखते हुए भाजपा-सपा के रिश्ते ‘फिर भी बेहतर’ कहे जाएंगे. सपा-बसपा के मध्य इन तीन दशकों की लड़ाई में तीन सौ करम इन पार्टियों ने एक दूसरे के साथ किये ही हुएहैं. राजनैतिक हत्याओं के दौर को भी कोई कैसे भूल सकता है. समय का खेल यह रहा कि तीन दशक के बाद भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का पदार्पण असंभव को संभव बनाता चला गया. परम शत्रु परम मित्र बन गए. एक दूसरे को फूटी आंख न सुहाने वाले लोगों के मध्य अब ‘सबकुछ ठीक’ हो गया है. इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के बाद पहली बार पूरा विपक्ष एकजुट हुआ है. लेकिन इंदिरा और मोदी के समय के बीच एक मूलभूत अंतर है.

इंदिरा के खिलाफ खड़ा विपक्ष एक प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक खतरे के विरुद्ध खड़ा था. मोदी के समय एक काल्पनिक लोकतांत्रिक खतरे को दिखाने का प्रयास किया जा रहा है. राहुल गांधी तो उसको येन केन प्रकारेण एक लोकतांत्रिक संकट सिद्ध करने के प्रयास में एड़ी चोटी का ज़ोर लगाए ही हुए हैं. जनता यह समझ रही है कि निहित स्वार्थ के समक्ष जो विपक्ष दण्डवत है, उनके भीतर भी विरोधाभासी स्वर हैं. उसी स्वर की एक ध्वनि मुलायम सिंह भी कल बन गए. पुत्र के साथ उनके बिगड़े रिश्ते ऐसे हैं कि खुद सियासी गलियारों में यह बात चल उठी है कि मुलायम खानदान में सब कुछ ठीक नहीं है. कारसेवकों की छाती पर चली गोलियों के घाव की पीड़ा शायद मुलायम सिंह यादव को अब हो रही होगी. हज़ारों मृत आत्माओं का श्राप कभी तो फलित होना ही था.

दूसरी तरफ पिता के मना करने के पश्चात भी धुर विरोधी बसपा से गठबंधन का जो दांव अखिलेश यादव ने खेला है उसे राजनैतिक पण्डित भले ही ‘मास्टर-स्ट्रोक’ की संज्ञा दे रहे हो, लेकिन मुलायम सिंह यादव इस खेल के अनुभवी खिलाड़ी हैं. उनको पता है कि राजनीति में जो दिखता है, आवश्यक नहीं कि वह सच्चाई हो. कम से कम पिछले विधानसभा चुनावों के नतीजों को देख कर तो वह यह समझ ही गए हैं. ऊपर से कार्यकर्ताओं के बीच पुत्र के तीखे शब्दों का रिकार्डेड वीडियो सोशल मीडिया पर पहले ही फैल चुका है. इन सब परिस्थितियों के बीच मुलायम सिंह यादव के यह बोल बता रहे हैं कि साईकल के पैडल पर भले ही अखिलेश यादव हो, लेकिन उसका हैंडल आज भी मुलायम सिंह के हाथ मे है. यह मायावती के लिए अच्छी खबर नहीं है. दूसरी तरफ चाचा शिवपाल पहले से ही लठ को तेल पिलाये बैठे हैं कि भतीजे को राजनीति का ककहरा सिखा कर रहेंगे.

इन्हीं सब बातों के बीच मोदी का राजनैतिक प्रवाह एक सच्चाई है. इसका प्रमाण खुद कलकत्ता और बैंगलोर के मंच की वो तस्वीरें दे रही थी, जिसको मोदी रोको अभियान की शुरुआत कहा जा रहा है. दयनीय स्थिति यह है कि उपचुनावों के नतीजों पर मिठाईयां बांटी जा रही हैं. किसी ज़माने में अपने धुर विरोधी की जीत पर भी उसको बधाई दी जा रही क्योंकि उसने मोदी को हराया है. भले ही उस चुनावी नतीजे में पार्टी की दुर्दशा हुई हो. मोदी को इतना श्रेय तो जाता ही है कि शास्त्री और अटल के ज़माने की राजनैतिक शुचिता को कम से विपक्ष के बीच स्थापित करने में उन्होंने सफलता प्राप्त की है. सोनिया गांधी की अपनी राजनैतिक मजबूरियां हैं. डेढ़ दशक से पुत्र की सफल लॉन्चिंग पैड की प्रतीक्षा के बीच उन्हें राजनीति में प्रियंका गांधी को उतारना पड़ा.

विश्वसनीयता का प्रश्न आज सभी राजनैतिक दलों के सामने मुंह बाए खड़ा है. मोदी के आत्मविश्वास के समक्ष कमज़ोर विपक्ष का संदेहास्पद रवैय्या लोकसभा चुनावों का ट्रेलर दे रहा है. मुलायम सिंह यादव का यह बयान सदन से निकल कर पूरे भारत में गूंजेगा. इसकी गूंज इतनी तीव्र होगी जिसकी कल्पना विपक्ष ने नहीं की होगी. कुल मिलाकर लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व में लड़ाई ऐतिहासिक होने जा रही है.