हमारे टाइम वाला वेलेंटाइन

हमारे टाइम में वैलेंटाइन डे वाली बीमारी और फ्रेंडशिप बैंड वाला कल्चर भारत मे नया नया शुरू हुआ ही था. ‘ओनली बॉयज’ स्कूल में पढ़े होने के नाते अपना फीमेल इंटरेक्शन एकदम ही ज़ीरो था. थोड़ा बहुत मौका ट्यूशन में रहता था पर वहां भी अपने बैच से पहले वाले बैच में ही ‘डाइवर्सिटी’ थी.

अपना बैच अंगारचंद का ही घर था. अपन उस बैकग्राउंड वाले थे जिसको सामने वाला ‘हाय’ या ‘एक्सक्यूज मी’ भी कह दे तो हम नर्वसनेस में कंफ्यूज हो जाएं कि इसके जवाब में क्या कहा जाए. ऐसे में किसी को प्रोपोज करना या बात शुरू करना एक जटिल प्रोजेक्ट से कम न था. उपर से तुर्रा ये कि वो कन्या हमारे बैच के सारे दोस्तों का क्रश थी, सो कम्पटीशन गजब का था.

ऐसा नहीं है कि इस कहानी में हीरो अलग से हीरोइन तक अपने दिल की बात पहुँचा देगा या हैप्पी एंडिंग टाइप होगी. कहानी सिर्फ माहौल बताने के लिए है कि इम्प्रेस करने के दौर में ब्रिल क्रीम, बैल बॉटम, BSA SLR साईकल सब फेल हो चुके थे. तब पिताजी से उस स्पेशल दिन उनका स्कूटर मांगा जाता था, ट्यूशन जाने के लिए.

अब बाप तो बाप होता है. उनका सवाल ही ‘इंटेरोगेशन’ होता था; “क्या करेगा स्कूटर ले जाकर.” अपना स्टैण्डर्ड जवाब यह होता कि टाइम बचेगा तो एक्स्ट्रा पढ़ाई कर लेंगे, कल के सेशनल के लिए. “पर तुम्हारा तो सेशनल है नहीं, परसों ही तो फ़िल्म की परमिशन मांग रहे थे.”; पिताजी ने चार्ज किया. अपन फिर बहाने बनाते कि विपिन के पिताजी ने उसको हीरो पुक दी है और उसकी तैयारी भी अच्छी चल रही है, एंट्रेंस की. पिताजी को वात्सल्यमय अपराध बोध तो होता लेकिन वो ठहरे बाप. उन्होने अगला सवाल दाग दिया; “ट्यूशन जाने के लिए नई शर्ट क्यों पहनी है.” अपन झल्लाते हुए जवाब देते कि नई कहाँ है. पिछले साल फलाने चाचा की शादी में ली थी. हमे लगता कि हमने कन्विंस कर लिया है और आज कन्या ट्यूशन से छूटने पर हमको स्कूटर स्टैंड पर लगाए बैठे देखेगी तो कतई इम्प्रेशन पड़ेगा. इतने में सपना टूटता और पिताजी की आवाज़ कानों में पड़ती; “ये लाल शर्ट पहनने की कोई खास वजह है आज.” बस फिर क्या, अपन तरुणाई वाले गुस्से में शर्ट के बटन खोलकर उतारते और खूंटी में टांग देते,  स्कूटर की चाबी मेज पर पटक देते. अपनी वही हफ्ते में 3 दिन पहने जाने वाली पुरानी चेक की शर्ट पहनते और गैलरी में अपनी BSA साइकिल ढ़ूँढ़ने लगते. तभी पीछे से पिताजी की हंसी वाला सर्काज्म सुनाई देता; “तेरी साईकल छोटा ले गया है, तू उसकी एटलस ले जा.”

गुस्से में 15 मिनट ताबड़तोड़ पैडल मारकर हम ट्यूशन पहुँचते. चेहरा रास्ते की धूल और धुएं के साथ और बाल में लगी ब्रिल क्रीम के मिट्टी पकड़ लेने से अपना सेमी मेकेनिक लुक में आ जाता था. ट्यूशन वाली गली के घुसते ही साइकिल की रफ्तार धीमी हो जाती. विपिन अपनी हीरो पुक पर होता और विपुल पिताजी के स्कूटर से. फहीम ब्रूट का परफ्यूम लगा कर और हम एटलस गोल्डलाइन सुपर की पैडल पर अपने चप्पल घिसते हुए.

2 साल के ट्यूशन में यही क्रम चलता रहा और इश्क में हम ‘जस की तस धर दीन्हि चदरिया’ ही बने रहे. हममें से किसी की भी बात हेलो-हाय तक नहीं पहुँची. ये अलग बात है कि हम आपस में खूब चर्चाएं करते. मजे की बात यह भी है कि आज भी जब हम दोस्त मिलते हैं तो चर्चा वही होती है और हम अपनी इश्किया ‘बैड लक’ पर खूब हँसते हैं. संस्मरण पढ़कर लोग प्रेम में हमारी अकर्मण्यता पर हँसने लगें तो भी हम उन्हे रोक नहीं पाएंगे.

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1 Comment

  1. Shubham kumar
    February 14, 2019 - 5:59 am

    एक साला हम थे,इम्प्रेशन डालने के लिए साधारण से बाल एक साइड की मांग वो भी उस time जब बाल खडे करने का चलन जोरो पर था,पुराने कपडे क्योन्कि अपना मानना था कि अगर impression भी ना पडा तो शायद दया खाकर किसी कोने में जगह मिल जाये😁😁😁😁

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