कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय विद्यालय में सुबह की सभा में संस्कृत और हिंदी में प्रार्थना करने के खिलाफ दायर पुरानी जनहित याचिका को सुनवाई के लिए पाँच जजों की संवैधानिक पीठ के पास भेज दिया है. संवैधानिक बेंच देखेगी कि देशभर के केंद्रीय विद्यालयों में बच्चों की सुबह की सभा में गाई जाने वाली प्रार्थना किसी धर्म का प्रचार तो नहीं है.
यह बहुत विचित्र स्थिति हैं. कम से कम बच्चों से तो ‘सांप्रदायिकता’ और ‘धर्म के प्रचार’ जैसे शब्द दूर रखने चाहिए. सुनवाई में केंद्र सरकार की तरफ से एएसजी तुषार मेहता ने कहा कि ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ जैसे संस्कृत मंत्रों का पाठ करना साम्प्रदायिक नहीं है. इसी मामले में जमीयत-उलेमा-ए-हिंद ने भी याचिका दायर कर दी है जिसमें प्रार्थना का विरोध करते हुए कहा है कि मुस्लिम बच्चों को हाथ जोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है.
प्रार्थनाओं के खिलाफ याचिका दायर करने वाले विनायक शाह स्वयं को नास्तिक कहते हैं. उन्होंने देश भर में केंद्र सरकार के प्रशासन वाले स्कूलों में इसे प्रार्थना के तौर पर शुरू करने की सरकारी नीति को चुनौती दी थी. उनका तर्क है कि स्कूलों में सुबह की प्रार्थना के दौरान धार्मिक स्तुतियाँ और प्रार्थना गाना संविधान के अनुच्छेद 28 के तहत निषेध है. यह आर्टिकल सरकारी स्कूलों और सरकार से अनुदान प्राप्त करने वाले स्कूलों में किसी धार्मिक निर्देश पर विशेष रोक लगाता है.
10 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने एक पीआईएल के संदर्भ में केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था. इसमें केंद्रीय विद्यालयों की प्रार्थना सभा में की जाने वाली प्रार्थना पर सवाल उठाया गया है. ज़रा उस प्रार्थना को देखते हैं जो विनायक शाह के अनुसार ‘धर्म के प्रचार’ के अंतर्गत आता है. प्रार्थना है – ‘असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतम गमय’. इसका अर्थ होता है कि हे ईश्वर! हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलो. अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो. शरीर की मृत्यु से ज्ञान की अमरता की ओर ले चलो.
हमारे देश की राजनीतिक बिरादरी यह कहती है कि सभी धर्म एक समान होते हैं. ईश्वर एक है. कुछ नेता तो ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ की दुहाई भी देते हैं. इन सैद्धांतिक बातों के बीच में जब ऐसी पीआईएल के बारे में सुनते हैं तो आश्चर्य होता है. ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय…’ कोई धार्मिक श्लोक नहीं, बल्कि एक सार्वभौमिक सत्य है. यह तो सभी धर्म और मान्यताओं में माना जाता है. ईसाई विद्यालयों में ईमानदारी को सर्वोपरि नीति बताया जाता है, तो क्या यह कोई धार्मिक मसला हो जाता है? यही बात केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कही. बदले में जस्टिस नरीमन साहब ने पूछा कि यह तो उपनिषद से लिया गया है. इसके जवाब में तुषार मेहता ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट का आधिकारिक चिन्ह भी तो श्रीमद्भागवत गीता से लिया गया है. जहां न्यायधीशों की बेंच बैठती है, उसके पीछे भी ‘यतो धर्मस्य ततो जय’ लिखा हुआ है. यानी जहां धर्म है, वहां विजय है. इसमें कुछ भी साम्प्रदायिक नहीं है. इसके बाद जस्टिस नरीमन ने इसको संवैधानिक बेंच को भेज दिया. श्री कृष्ण और मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के देश में ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ पर बहस होने वाली है.
देश के लोकतंत्र में हर उस नीति पर सवाल उठाना जिनकी नींव पर ही यह लोकतंत्र स्थापित हुआ है, कितना तर्कसंगत है. देश के संविधान में ही महाभारत के अनेकों श्लोको का वर्णन है. इससे हमारे देश का संविधान साम्प्रदायिक तो नहीं हो जाता है. हाँ, यदि भाषा में किसी को दिक्कत है तो वह सवाल उठाए. वैसे ईसाई स्कूलों में बाइबिल की प्रार्थना करवाई जाती है. वहां सिर्फ ईसाई धर्म के ही बच्चे नहीं पढ़ते हैं. परंतु शायद अब तक किसी का ध्यान इस तरफ नहीं गया है. देखना होगा कि अब देश के संविधान में कितने संस्कृत श्लोकों को ‘साम्प्रदायिक’ या ‘धर्म का प्रचार’ बताया जाता है.

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यह दोबारा से भारत मे उदय होता इस्लामिक शासन कि आहट है जिसे सचेत रूप से देखा जाना चाहिए,जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द जैसी संस्थाये ही इस्लाम को पुर्ण रुपेण अपने जीवन में डालने के लिए प्रेरित करती हैं जिससे मुस्लिमो मे गैर मुसलमानों के प्रति द्वेष घर करने लगता है,फ़िर वही दंगे ौऔर सामुहिक हत्याओ का दोर चलता है और अलग देश की माँग होती हैं
कम्युनिस्टो का एक खास हथियार यह है कि कमजोर विरोधी हमेशा इनके सहयोगी के रूप मे रहेगा