राजनैतिक कोलाहल के बीच देश में पद्म पुरस्कारों की घोषणा कर दी गयी है. 112 लोगों की लिस्ट में जानने और समझने को बहुत कुछ है. यह ऐसी संस्कृति की शुरुआत है जहाँ साधारण जनमानस के असाधारण कार्यों के लिए उनको सम्मानित किया गया है. यह अपने आप में अद्भुत है. दुःख बस इतना है कि हमारे ही देश के लोग इन नामों को नहीं जानते हैं.
सरस्वती शोध संस्थान के दर्शनलाल जैन जी ने जब सरस्वती नदी को पुनर्जन्म दिलाने के भगीरथ कार्य को हाथ मे लिया था, तब उन्हें भी नहीं पता था कि उनका यह कार्य एकदिन उनको राष्ट्रपति भवन में सम्मान दिलवा देगा. जब सब सरस्वती नदी को पौराणिक कल्पना मानते थे, वो अपने विश्वास पर अडिग थे. आज उसका पुरस्कार उनको मिला है. 90 वर्षीय गोदावरी दत्त जी की भी यही कहानी है. उनकी मिथिला पेंटिंग की छाप आज पद्म श्री के ऊपर भी छप चुकी है. मधुबनी के रांटी गाँव से शुरू हुई उनकी पेंटिंग ने उनको पद्म पुरस्कारों तक पहुंचा दिया है. कला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उनको यह सम्मान मिला.
दिनायर कॉन्ट्रेक्टर एक थियेटर आर्टिस्ट हैं. 90 के दशक में अक्षय कुमार की फिल्मों में आपने उनको कॉलेज प्रिंसिपल के रूप में कई बार देखा होगा. जब उनके घर पद्मश्री की ख़बर पहुंची तो उनका दर्द छलक आया. उन्होंने बताया कि अपने 55 साल के लंबे कैरियर में उन्होंने ऐसे किसी पुरस्कार की आस ही छोड़ दी थी. परंतु वो खुश हैं कि सरकार ने उनके योगदान को पहचाना है. यह बहुत पहले उनको मिल जाना चाहिए था.
गरीबी से लगातार युद्ध कर रही चेन्नई की चिन्ना पिल्लई ने जब ‘कलांजीयम’ नामक एक लघु ऋण व्यवस्था की शुरुआत की थी, तब उन्होंने किसी पुरस्कार के बारे में नहीं सोचा था. दिन में वो मजदूरी करती थी और रात में इस पावन कार्य के लिए समय देती थी. पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने इनके इस कार्य के लिए इनके पैर भी छुए थे. अब इसे दुर्भाग्य कहें या राजनैतिक उदासीनता, मगर चिन्ना पिल्लई को यह पुरस्कार मिलने में 10 साल लग गए. बनारस संगीत घराने के डॉ राजेश्वर आचार्य को भी पद्मश्री एवार्ड से सम्मानित किया जा रहा है. उन्होंने इसको भोले बाबा का आशीर्वाद बताया है.
जर्मनी से मथुरा आ बसी 59 वर्षीय फ्रेड्रिक इरिना ब्रुनिंग को ‘गौ माता की आश्रयदात्री’ भी बोला जाता है. पिछले 23 सालों से वो 1,200 गौ माताओं की सेवा करती आई हैं. 75 वर्षीय उड़ीसा के किसान दैतारी नाइक, जिन्होंने गाँव में पानी की कमी दूर करने के लिए अकेले नहर खोद डाली. उनको भी उनके अभूतपूर्व साहस के लिए पद्म सम्मान मिला है. बिहार की 65 वर्षीय राजकुमारी देवी ने स्वयं सहायता समूह की शुरुआत कर ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का कार्य किया है. आनंदपुर ज्योति सेंटर की शुरुआत कर वह हज़ारों ग्रामीण महिलाओं के जीवन में उजाला लायी हैं.
ऐसे सैंकड़ो नाम हैं जिन्होंने समाज के लिए अपने कार्यों से पद्म पुरस्कारों को कृतार्थ किया है. उन सबके नाम और उनके अभूतपूर्व कार्यों को एक ही लेख में समाहित करना उनके संघर्ष और चट्टान जैसी मज़बूत इच्छाशक्ति से न्याय नहीं होगा.
यह देख कर अच्छा लगा कि देश में पद्म पुरस्कार जिस लक्ष्य को लेकर बनाये गए, आज वह उसको पूरा करते हुए नज़र आ रहे हैं. सवा सौ करोड़ देशवासियों की प्रेरणा भी उन्हीं जनमानस के बीच से निकलनी चाहिए. AC कमरों से निकल यह पुरस्कार गरीब के घरों तक पहुंच रहे हैं, इससे ज़्यादा सुखद स्थिति और क्या हो सकती है? ये बताते हैं कि यदि मन में देश के लिए कुछ करने का जज़्बा हो, तो कोई भी कार्य असंभव नहीं होता है. यह दर्शनलाल जैन और दैतारी नाईक के विश्वास, गोदावरी दत्त और दिनायर कॉन्ट्रेक्टर के धैर्य, फ्रेड्रिक इरिना ब्रुनिंग और डॉ राजेश्वर आचार्य की आस्था तथा चिन्ना पिल्लई के संघर्ष की जीत है. यह भारत के जन-मानस की जीत है. आशा है कि इस संस्कृति को आगे बढ़ाया जाएगा.

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बढ़िया। सूची भी रखी जाती तो अच्छा था। किसी अखबार ने भी यह सूची प्रकाशित करने की जहमत नहीं उठाई।