भारतरत्न नानाजी देशमुख

सन 1974 की जून में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रायबरेली की सीट से इंदिरा गाँधी के चुनाव को निरस्त कर दिया. इसके बाद राष्ट्रव्यापी आंदोलन होने लगे. पटना में जेपी एक मार्च का नेतृत्व कर रहे थे जिस पर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया. कहने वाले कहते हैं कि निशाने पर छात्र नही बल्कि जेपी थे और इरादा उनकी जान लेने का था. 72 साल के दुबले पतले जेपी पर बरस रही लाठियों को एक कार्यकर्ता ने अपने दायें हाथ पर झेला. उस कार्यकर्ता का हाथ टूट गया लेकिन उसने पुलिस की लाठियों को जेपी के शरीर तक पहुँचने नही दिया. वह कार्यकर्ता थे जनसंघ के कोषाध्यक्ष और महामंत्री चण्डिकादास अमृतराव ‘नानाजी’ देशमुख. नानाजी देशमुख, जिन्हें विरोधी भी नाना फड़नवीस कहकर सम्मान देते थे. 70वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार ने जिन तीन हस्तियों को भारत रत्न पुरस्कार देने की घोषणा की है, उनमें से एक हैं मनीषि नानाजी देशमुख. 

नानाजी का जन्म सन 1916 में महाराष्ट्र के कड़ोली नाम के छोटे से कस्बे में हुआ था. परिवार अत्यंत निर्धन था. यहाँ तक कि आरम्भिक शिक्षा के लिए नानाजी को सब्जी तक बेचनी पड़ी थी. संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार का नानाजी देशमुख के घर आना-जाना था. उनके कहने पर ही नानाजी शाखा जाने लगे थे. कुछ वर्षों बाद डॉ हेडगेवार ने तय किया कि महाराष्ट्र के स्वयंसेवकों को शिक्षा के लिए देश के विभिन्न भागों में भेजा जाए जिससे वे संघ के संगठन और विचारों का देश भर में प्रचार प्रसार कर सकें. इसी योजना के तहत नानाजी देशमुख को सीकर, राजस्थान भेजा गया. सीकर तब जयपुर रियासत का हिस्सा था. सीकर के ठिकानेदार राव राजा कल्याण सिंह बहादुर ने नानाजी की प्रतिभा को देखते हुए उन्हें छात्रवृति दी जिससे उनकी शिक्षा पूरी हुई. अपनी शिक्षा के दौरान ही नानाजी ने राजस्थान में संघ कार्य की नींव रखी. 

सन 1940 में संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार की मृत्यु हो गई. माधव सदाशिव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ दूसरे सरसंघचालक बने. श्रीगुरुजी के आह्वान पर सैकड़ों स्वयंसेवकों ने आजीवन अविवाहित रहकर और संघ प्रचारक बनकर अपना जीवन संघकार्य और राष्ट्रसेवा में खपा देने का निश्चय किया. नानाजी भी उनमें से एक थे. उन्हें उत्तरप्रदेश का प्रभार मिला. आगरा, लखनऊ होते हुए नानाजी गोरखपुर पहुँचे. शुरुआती दशकों में संघ के पास संसाधन के रूप में डॉ हेडगेवार द्वारा तैयार किये हुए स्वयंसेवक ही थे. दो वक्त का भोजन और छत भी प्रचारकों को खुद ही जुटाना था. कुछ समय धर्मशालाओं और रेलवे स्टेशन में बिताने के बाद नानाजी को एक आश्रम में इस शर्त पर रहने की जगह मिली कि वे सुबह शाम का खाना पकाएंगे. नानाजी को शर्त मंजूर थी. अगले तीन सालों में गोरखपुर और उसके आस पास संघ की 250 से अधिक शाखाएं लगने लगीं. नानाजी ने अपनी संगठनात्मक शक्ति का परिचय दे दिया था. 1950 में नानाजी देशमुख ने ही देश के पहले सरस्वती शिशु मंदिर की आधारशिला रखी थी. आज देश भर में लगभग 13 हजार विद्यालयों में डेढ़ लाख शिक्षक और 35 लाख से अधिक विद्यार्थी पठन-पठान का कार्य कर रहे हैं.

1951 में जब जनसंघ का गठन हुआ तो नानाजी देशमुख को उत्तरप्रदेश का संगठन मंत्री बनाया गया. मात्र 5 वर्षों में प्रदेश के सभी जिलों में जनसंघ का संगठन तैयार हो गया. 1957 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में जनसंघ की सीटें दो से बढ़कर सत्रह हो गई. इसके बाद नानाजी को जनसंघ का कोषाध्यक्ष बना दिया गया. उन दिनों गैर कांग्रेस पार्टियों के लिए बड़े उद्योगपतियों से चंदा लेना बेहद कठिन था. कोई भी उद्योगपति कांग्रेस को नाराज नही करना चाहता था. ऐसे में नानाजी ने छोटे व्यापारियों और दुकानदारों को पार्टी से जोड़ना शुरू किया. हर जिले में संगठन का खर्च चलाने की व्यवस्था स्थानीय स्तर पर होने लगी. इससे व्यापारी वर्ग का भाजपा से सीधा जुड़ाव हुआ जिसका फायदा मत प्रतिशत में भी दिखा. विरोधी इसी प्रयोग के बाद जनसंघ को ‘बनिया पार्टी’ कहने लगे. लेकिन इसी प्रयोग के कारण जनसंघ हमेशा ही उद्योपतियों के दबाव से मुक्त रही. 1967 में जनसंघ और समाजवादी दलों का गठजोड़ बनाने में भी नानाजी ने बड़ी भूमिका निभाई जिसके बाद पहली बार बिहार और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में ग़ैरकांग्रेस सरकारें सत्ता में आई. 

आपातकाल के बाद 1977 में जब जनता सरकार आई तो जेपी और मोरारजी देसाई, दोनो ने ही नानाजी से मंत्रिपद स्वीकार करने को कहा. लेकिन नानाजी ने जनता पार्टी के संगठन में काम करने को प्राथमिकता दी. जनता सरकार पहले दिन से ही विरोधाभाषों, आपसी सिर फुटव्वल और दिशाहीनता की शिकार थी. मोरारजी प्रधानमंत्री बन गए थे लेकिन जगजीवन राम और चरण सिंह की एक नजर हमेशा उसी कुर्सी पर लगी थी. नानाजी इन चीजों से बेहद खिन्न थे. उन्हें समझ आ गया था कि देश की समस्याओं का समाधान राजनीति से ही नही होगा. अपने 60वें जन्मदिन पर उन्होंने राजनीति से सन्यास की घोषणा कर दी. इसके बाद के तीन दशक उन्होंने दरिद्र नारायण की सेवा में बिता दिए. देश में किसी काल की राजनीति में ऐसे विरले ही उदाहरण मिलते हैं. 

जनसंघ के संस्थापकों में रहे दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर दीनदयाल शोध संस्थान का गठन नानाजी ने 1969 में ही कर लिया था. इसी के माध्यम से उन्होंने एकात्म मानववाद को व्यवहारिक धरातल पर उतारने का निर्णय किया. शुरू में उन्होंने कुछ काम उत्तरप्रदेश के गोंडा जिले में और महाराष्ट्र के बीड़ में किया. लेकिन अपने वृहद प्रयोगों के लिए उन्होंने उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश की सीमा पर बसे चित्रकूट धाम को चुना. उन दिनों चित्रकूट की चर्चा खूंखार डकैतों, खूनी जातीय संघर्षों और घोर पिछड़ेपन के लिए होती थी. चित्रकूट के 500 गांवों में दीनदयाल शोध संस्थान के माध्यम से नाटकीय परिवर्तन आया. कृषि आधारित कुटीर उद्योग, सिंचाई के वैकल्पिक साधनों, स्वास्थ्य के लिये वैकल्पिक माध्यमों को प्रोत्साहन देकर उन्होंने चित्रकूट की जनता की बेरोजगारी को कम किया. नानाजी ने 1 एकड़ और दो गायों का मॉडल तैयार किया जिसके माध्यम से एक किसान पांच लोगों के परिवार का भरण पोषण आसानी से कर सकता है.

देश के पहले चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना भी नानाजी के देखरेख में ही हुआ. दर्जनों आवासीय विद्यालयों के माध्यम से नानाजी ने न केवल अशिक्षा को कम किया बल्कि गुरुकुल की परंपरा को भी पुनर्जीवित किया. 

न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।

कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् ॥ 

गीता के इस श्लोक का अर्थ है कि न राज्य की कामना करता हूँ, न स्वर्ग और मोक्ष की. यदि कामना करता हूँ तो प्राणिमात्र के दुखों को दूर करने में सहायता करने की. गीता के इस श्लोक को ध्येय मानकर सम्पूर्ण जीवन लोककल्याण को समर्पित कर नानाजी 27 फरवरी, 2010 को अनंत की यात्रा पर निकल गए.

उन्हें भारत रत्न देकर भारत सरकार ने इस पुरस्कार की गरिमा को बढ़ाया है.

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Image credit: PTI

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