आर्थिक आधार पर रिजर्वेशन बिल के विरोध में प्रोपेगंडा

आरक्षण का मुद्दा कई वर्षों से देश में एक ज्वलंत मुद्दा रहा है. दलित और पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए लाया गया आरक्षण उस वर्ग को खलने लगा था जो आर्थिक रूप से पिछड़ा था पर दलित या पिछड़े वर्ग का नहीं था. यह स्वाभाविक भी था क्योंकि सामान्य श्रेणी वाला तबका पूरी तरह विशेषाधिकार प्राप्त ही नहीं था.

इसमे भी बहुत सारे लोग ऐसे थे जिन्हे आरक्षण की उतनी ही जरुरत थी जितनी किसी पिछड़े या दलित को. समाज का समरस विकास सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एनडीए सरकार ने ‘देर आए दुरुस्त आए’ की तर्ज पर अनारक्षित वर्ग के गरीबों को 10% के आरक्षण का तोहफा दिया है.

विपक्ष इस मुद्दे पर असमंजस में है. वह बौखलाहट में कह रही है कि यह चुनावी स्टंट है. विपक्ष की छटपटाहट स्वाभाविक है. लेकिन इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि यह कदम काफी ज़रूरी था. पर मीडिया इस बिल पर भ्रांतियां फैलाने से बाज़ नहीं आ रही. मीडिया और  विपक्ष के कुछ लोग एक सुर में यह गा रहे हैं कि यह आरक्षण केवल सवर्णों के लिए है. दलितों के शुभचिंतक जिग्नेश मवानी जी ने तो यहाँ तक कह दिया कि सरकार SC/ST कोटा ही खत्म कर देगी और केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण देगी.

ऐसी भ्रांतियों से गुमराह करने वालों से सचेत रहना जरुरी है. 

  • आरक्षण केवल हिन्दू सवर्णों के लिए है, यह मिथ्या है. आरक्षण सभी अनारक्षित गरीब परिवारों के लिए है. इसमें ईसाई और मुस्लिम समाज भी शामिल है. 
  • 8 लाख प्रति वर्ष से कम आय वालों के लिए है आरक्षण. इस बात पर काफी जगह सवाल उठाया जा रहा है कि अगर एक व्यक्ति 8 लाख प्रति वर्ष कमा रहा है तो वह गरीब कैसे हुआ. तथ्य यह है कि 8 लाख से कम सलाना आय का आंकड़ा पूरे परिवार की आमदनी मिलाकर होना चाहिए.
  • SC/ST कोटा प्रभावित होने की बात सरासर बेबुनियाद है, आरक्षण का 10% अलग से है ना कि SC/ST आरक्षण को कम करके.
  • आरक्षण का बिल पास नहीं होगा क्योंकि यह असंवैधानिक है, यह भाजपा का चुनावी जुमला है. देश के कई राज्यों में पहले से ही 50 प्रतिशत से ज़्यादा आरक्षण दिया जा रहा है.

विरोध के लिए विरोध करने वाले या इस आरक्षण के डिजर्विंग लाभार्थियों के विरोधी ही इसका विरोध कर रहे हैं

Image : Suresh Rankawat