क्या सरकार आपकी जासूसी करना चाह रही है?

अफवाहों का दौर है. सम्हल कर चलने में ही भलाई है. यह हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि आज कल अफवाहें किसी वायरल रोग की तरह फैला दी जा रही हैं. फैलाने वालों की अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षाएं हैं, परंतु यह लोगों के ऊपर बुरा प्रभाव डाल रही हैं (ज़ाहिर सी बात है). गलत या आधी अधूरी जानकारी व्यक्ति को न केवल भ्रमित करती है बल्कि उसको एक प्रकार से लोगों के सामने शर्मिंदा भी करती है. अब अपने देश में शेखी भघारने वालों की कमी थोड़े न है? परंतु हर अधूरी खबर को झूठ ही माना गया है. ऐसा ही एक झूठ सोशल मीडिया पर फिर फैलाया जा रहा है. आपकी ‘साइबर सिक्युरिटी’ के नाम पर. कहा जा रहा है कि सरकार आपकी जासूसी करवा रही है. 

अब देखिए कि मामला क्या है. 20 दिसंबर को, भारत सरकार ने भारत के राजपत्र में एक अधिसूचना जारी की, जो विभिन्न जांच एजेंसियों को किसी भी कंप्यूटर डिवाइस पर जाँच करने की शक्तियां प्रदान करने वाली लगती है. गृह मंत्रालय द्वारा जारी आदेश सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत किसी भी कंप्यूटर संसाधन में उत्पन्न, प्रेषित, प्राप्त या संग्रहीत किसी भी सूचना को इंटरसेप्ट करने, मॉनिटर करने और डिक्रिप्ट करने के लिए दस सूचीबद्ध सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को अधिकृत करता है.

अब इस खबर ने सोशल मीडिया पर इतना बवाल काटा है कि पूछो ही मत. संसद भी इससे अछूता नहीं रह गया है. इसको मोदी सरकार द्वारा व्यक्ति की निजता का हनन विपक्ष द्वारा बताया जा रहा है. कांग्रेस पार्टी का कहना है कि पुलिस को इतनी ताकत दे दी गयी है कि वह किसी के भी फोन कॉल को टेप कर सकती है और किसी भी कंप्यूटर डिवाइस के अंदर छेड़-छाड़ कर सकती है. यानी यह एक प्रकार की जासूसी है जो मोदी सरकार करवा रही है.

इतने आरोपो के बीच सत्य की गूंज सुनने में मेहनत करनी पड़ती है. MHA के आर्डर को उठा कर देखें तो पाएंगे कि इन आरोपो का कोई आधार नहीं है. सरकार ने कोई नया आर्डर जारी नहीं किया है. संभवतः उसने पुराने बने आर्डर को ही दोबारा दोहराया है. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69 की उप-धारा (1) और सूचना प्रौद्योगिकी (प्रक्रिया और सुरक्षा, अवरोधन, निगरानी और सूचना के डिक्रिप्शन) के नियम, 2008 के तहत ही इस आदेश को जारी किया गया है. यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 संसद में विपक्ष की बहस के बिना पास किया गया था. 

धारा 69 की उपधारा 1 यह बहुत स्पष्ट करती है कि अधिकारियों को किसी भी कंप्यूटर डिवाइस के माध्यम से किसी भी सूचना को प्रेषित करने की अनुमति केवल देश की अखंडता और सुरक्षा के लिए खतरा, कानून और व्यवस्था के लिए खतरा और किसी भी संज्ञेय अपराध के लिए खतरा होने की स्थिति में ही दी जाएगी. यह सभी नागरिकों पर ‘जासूसी’ नहीं है जो कांग्रेस पार्टी और अन्य आरोप लगा रहे हैं.

राज्य सभा में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यह भी कहा था कि यह ताकत सिर्फ और सिर्फ कुछ अपराधों पर ही इस्तेमाल करने की अनुमति दी गयी है जो IT अधिनियम के अंतर्गत आते हैं. यह जानकारी आवश्यक हो जाती है कि यह आदेश जाँच एजेंसियों की ताकत, जो IT अधिनियम के अंतर्गत उनको मिली है, उसी को दोहराता है, न कि उनको बदलता है. इसका मतलब सूचना और प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69(1) की रक्षा की गई है.

हम यदि सूचना प्रौद्योगिकी के नियम, 2008 जो कांग्रेस पार्टी के समय बनाये गए थे और वो भी MHA के आदेश में ही लिखे थे, उनको देखें तो पाएंगे कि वर्तमान आदेश कोई नया आदेश नहीं है. इस आदेश के प्रावधान पिछले एक दशक से ऐसे ही थे. धारा 4(1) के नियम कहते हैं कि – 
‘सक्षम प्राधिकारी किसी भी कंप्यूटर संसाधन में उत्पन्न, प्रसारित, प्राप्त या संग्रहीत ट्रैफ़िक डेटा या सूचना की निगरानी और संग्रह के लिए सरकार की किसी भी एजेंसी को अधिकृत कर सकता है.’
यह MHA के आदेश में उपयोग की गयी भाषा है, केवल अंतर यह है कि ‘किसी भी एजेंसी को अधिकृत’ कहने के बजाय, अब यह निर्दिष्ट किया गया है कि कौन सी एजेंसियां ​​इस शक्ति का उपयोग करने के लिए अधिकृत हैं. आदेश में उल्लेखित 10 एजेंसियां ​​सामान्य एजेंसियां ​​हैं जो देश में जांच करती हैं.

अब सरकार ने यह निर्दिष्ट करके नियम को स्पष्ट कर दिया है कि कौन सी एजेंसियां ​​राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था के लिए खतरों की विशिष्ट घटनाओं पर कंप्यूटर आधारित संचार को बाधित कर सकती हैं. अर्थात नियम को और दुरुस्त किया गया है, बदला नहीं गया है.

मीडिया से बात करते हुए कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने भी यह साफ किया था कि यह आदेश पूर्णरूप से संवैधानिक है, और कहा था कि यह किसी भी आम जनता के कंप्यूटर में जासूसी करने का आदेश नही देता है. उन्होंने यह भी कहा कि IT अधिनियम के प्रस्तावों के अंतर्गत यह आवश्यक हो जाता है कि किसी भी अवरोधन को पूरा करने से पहले गृह सचिव से अनुमोदन प्राप्त करना होगा. उन्होंने यह भी कहा कि जैसा कि आदेश में दस एजेंसियों का उल्लेख किया गया है, अन्य एजेंसियां ​​अब कंप्यूटर-आधारित संचार को बाधित करने के लिए अधिकृत नहीं हैं, जब तक कि वे किसी खास मामले के आधार पर ऐसा करने के लिए अधिकृत न हों. यानी यह आपकी ही सुरक्षा के लिए बनाया गया था.

अब सब बातें आपके सामने हैं. हर तर्क आपके सामने है. सबूत भी दिए गए हैं. आप स्वयं अब अपनी बुद्धि की कसरत करें. ज़रा यह सोचें कि कभी राफेल पर तो कभी सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम पर इतना बवाल क्यो मचाया जा रहा है, जबकि बवाल मचाने वालों को सत्य का पता है, फिर भी? क्या यह एक गैर जिम्मेदार विपक्ष की नींव नहीं रखता है. क्या यह सही है? 

सोचिये कि आप सरकार से अपनी सुरक्षा की उम्मीद लगाए बैठे हैं क्योंकि आपको वही एकमात्र संस्थान दिखाई देती है जो आपके हितों की रक्षा कर सकती है. आज-कल के अपराधी साइबर क्रिमिनल्स हैं. उनको पकड़ने के लिए नियमों को स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है. अब क्या यह सच में आपकी जासूसी है, या आपके हितों की रक्षा है? सोचिएगा ज़रूर