खिलाफत की भूल के भयावह परिणाम – अंक 1

सन 1914 से 1918 तक प्रथम विश्वयुद्ध चला था. प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी ने ब्रिटेन का समर्थन किया था. इतना ही नहीं, अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी स्वयं ही भारतीयों को ब्रिटिश सेना का हिस्सा बनकर विश्वयुद्ध में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे. गाँधी को आशा थी कि इस समर्थन के बदले ब्रिटेन कृतज्ञता एवं सदाशयता दिखाते हुए भारतीयों को अधिक अधिकार सौंपेगा और भारत स्वशासन की तरफ आगे बढ़ेगा. लेकिन उल्टे लन्दन से रौलेट एक्ट का तोहफा आया जिसका विरोध करने जुटी निर्दोष जनता के साथ जलियांवाला बाग जैसा नृशंस हत्याकांड हुआ. 

13 अप्रैल, 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड से कांग्रेस और महात्मा गाँधी की सोच में निर्णायक परिवर्तन आया. गाँधी समझ गए कि ब्रिटिश स्वेच्छा से भारतीयों को स्वराज नहीं देंगे. उन्होंने घोषणा कर दी कि इस शैतानी (ब्रिटिश) सरकार से किसी भी तरह का सहयोग महापाप होगा. यही असहयोग आंदोलन का आधार बना. सन 1920 में गाँधी राष्ट्रव्यापी दौरे करके असहयोग आंदोलन के लक्ष्य और तरीकों से लोगों को अवगत कराते रहे. महात्मा गाँधी की रैलियां सफल हो रही थीं, आन्दोलन जोर पकड़ रहा था लेकिन इनमें मुसलमानों की भागीदारी नगण्य थी. गाँधी इसे एक चुनौती के रूप में देखते थे और मुसलमानों को अपने आंदोलन से जोड़ने के लिए कृतसंकल्प थे. इस पर बहस हो सकती है कि इसके पीछे गांधी का उद्देश्य हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करके अपने संघर्ष को मजबूत करना था या सिर्फ सर्वधर्म समभाव के भाव छोड़ना.

प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की ने भी हिस्सा लिया था. वह जर्मनी, हंगरी, ऑस्ट्रिया जैसे देशों के साथ मिलकर लड़ा था और बुरी तरह पराजित रहा था. तुर्की का शासक खलीफा कहलाता था जिसे सुन्नी मुसलमानों का सर्वोच्च धार्मिक व राजनीतिक नेता माना जाता था. ब्रिटिश और उसके सहयोगी मित्र देशों ने खलीफा को न हटाने का वचन दिया था लेकिन फ़िलीस्तीन, ईरान, सीरिया इत्यादि जैसे मध्य पूर्व देशों को खलीफा के साम्राज्य से अलग कर दिया गया. विश्व भर में उद्वेलित मुसलमानों ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई. लेकिन भारत में तो गजब ही हो गया. रामपुर के दो मौलाना भाइयों मुहम्मद अली जौहर और शौकत अली ने 1920 में खिलाफत कमिटी का गठन किया. वे मुसलमानों को संगठित करके ब्रिटिश सरकार पर खलीफा को उसका राज्य लौटाने के लिए दबाव बनाने लगे. गाँधी बहुत ध्यान से इन घटनाक्रमों पर नजर बनाए हुए थे. उन्होंने खिलाफत आंदोलन के नेता मुहम्मद अली जौहर को असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन एकसाथ चलाने का प्रस्ताव दिया. इसे खिलाफत कमिटी ने स्वीकार कर लिया. 

खिलाफत या इस्लामिक राज्य का भारतीय अनुभव बड़ा ही वीभत्स है. खलीफा के आदेश पर ही मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर हमला किया था. सिंध के अंतिम हिन्दू राजा दाहिर की हत्या कर दी थी और अपनी माता की उम्र की रानी कमला देवी के साथ बलात्कार किया था. महाराज की दोनों पुत्रियों को तोहफे के तौर पर खलीफा को भेज दिया था. बाद में गजनी और गोरी के हमले भी भारत मे खिलाफत स्थापित करने के लिए ही हुए. कांग्रेस के अंदर भी इस इतिहास को जानने और इस पर रोष रखने वाले वाले थे. फिर भी वे इस आंदोलन का हिस्सा बनने को तैयार हो गए. 

इस तरह असहयोग आंदोलन 1 जनवरी, 1921 को आरम्भ हुआ. यह एक अनूठा आंदोलन था जिसमें मुख्य माँग थी स्वराज, हथियार था स्वदेशी और अहिंसा. इसकी आरम्भिक सफलता ने ब्रिटिश शासन को आश्चर्य में डाल दिया. यह पहला आंदोलन था जिसमें भारत के आम लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए. गाँधी इस आंदोलन के दौरान असहयोग आंदोलन की मुख्य मांगों के साथ खलीफा को पुनर्स्थापित करने की मांग भी किया करते थे. अब उनकी सभाओं में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही आते. गाँधी और कांग्रेस के कई नेताओं को लगता था कि वे हिन्दू-मुस्लिम एकता बनाने में सफल हो रहे हैं लेकिन शीघ्र ही उनका भ्रम ही नहीं टूटने वाला था बल्कि यह भी सिद्ध होने वाला था कि खिलाफत आन्दोलन को समर्थन कितनी बड़ी भूल थी.

खिलाफत कमिटी ने कांग्रेस से गठजोड़ भले ही किया था लेकिन स्वदेशी, अहिंसा या स्वराज में उनका विश्वास नहीं था. वे सिर्फ तुर्की के खलीफा को बचाने निकले थे. अपने सम्बोधनों में खिलाफत कमिटी के नेता अक्सर बहक जाते थे एवं घोर साम्प्रदायिक और भड़काऊ भाषण दिया करते थे. एकबार तो मुहम्मद अली जौहर ने यहाँ तक कह दिया कि हरिजनों को हिंदुओं और मुसलमानों में बराबर बाँट दिया जाए तो ही हिन्दू-मुस्लिम एकता कायम हो सकेगी. छोटे मौलवी सब मुसलमानों को जोड़ने के लिए यहाँ तक कहते थे कि खलीफा जल्द ही हिंदुस्तान पर कब्जा कर लेंगे और हिंदुस्तान दार-उल-इस्लाम बन जायेगा. इन सब बातों से देश की हवा विषैली हो रही थी और सांप्रादायिक वैमनस्य फैल रहा था. उत्तर प्रदेश से ऐसी खबरें भी आई कि कुछ लोग इस्लामिक शासन में रहने के लोभ में अपनी संपत्ति बेचकर अफ़ग़ानिस्तान चले गए. सनक का आलम यह था कि कुछ युवा कार्यकर्ता बिना यह जाने कि तुर्की दुनिया के किस कोने में है, पैदल ही पश्चिम की ओर कूच कर गए.

कांग्रेस के अंदर भी कुछ नेता इन सब चीजों को देख-सुन रहे थे और भविष्य को लेकर आशंकित थे. लेकिन महाराष्ट्र के रत्नगिरी जेल में कैद स्वातन्त्र्यवीर सावरकर यह अनुमान लगाने में सक्षम रहे कि खिलाफत का पागलपन हिंदुओं के लिए कैसी समस्या पैदा करने वाला है. देश में जगह जगह दंगे होने लगे थे. लेकिन सबसे वीभत्स स्थिति केरल में बनी. अगस्त, 1921 में केरल में यह अफवाह फैल गई कि ‘निजाम-ए-मुस्तफ़ा’ अर्थात इस्लामिक राज्य कायम हो गया है. इस अफवाह से उपजी उत्तेजना में केरल के मोपला में भयंकर दंगे हुए. लेकिन खलीफा की वस्तुस्थिति कुछ और ही थी. खलीफा को पदच्यूत किया जा चुका था. खलीफा को अंग्रेजों ने नही हटाया. भ्रष्टाचार और अयोग्य शासन से त्रस्त तुर्की की जनता को खलीफा से निजात दिलाया एक राष्ट्रवादी नेता कमाल-अता-तुर्क ने जिन्हे आधुनिक तुर्की का पिता माना जाता है.

5 फरवरी, 1922 को हुए चौरी चौरा कांड के बाद गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन समाप्त घोषित कर दिया. इसके साथ ही खिलाफत आंदोलन भी समाप्त हो गया. इस आंदोलन का देश के भविष्य पर गहरा प्रभाव पड़ा. मौलाना मोहम्मद अली जौहर आंदोलन समाप्त करने के गाँधी के इकतरफा फैसले से बहुत नाराज हुए. उन्होने कांग्रेस का साथ छोड़कर मुस्लिम लीग को पुनर्जीवित किया. खिलाफत कमिटी का संगठन और कार्यकर्ता अब मुस्लिम लीग के संसाधन बन गए. देश के आम मुसलमानों में घोर साम्प्रदायिकता फैली जिसके लिए जाने-अजनाने कांग्रेस भी दोषी थी. जिन्ना पहले दिन से खिलाफत के विरुद्ध थे. वे कांग्रेस छोड़कर विदेश चले गए और जब लौट कर आये तो उसी खिलाफत की राख पर फिर से उगे मुस्लिम लीग की राजनीति करने लगे. 

39 Comments

  1. ashok
    December 21, 2018 - 3:42 pm

    खिलाफत शायद पहला आंदोलन था जिसे भारत में साम्प्रदायिक माहौल खड़ा करने के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है पर अफसोस कि हमारे इतिहासकार तिलक के गणपति पूजन को ऐसा मानते हैं।वहीं विडम्बना ये है कि समय समय पर कांग्रेस ने अंग्रेजों के तलुए चाटे लेकिन आज के कांग्रेसी आरएसएस पर ऐसा आरोप लगाते हैं।

  2. प० रामगोपाल नाथ
    December 21, 2018 - 7:02 pm

    इतिहास के अनछुए पहलुओं को जानने का अवसर इस ब्लाग के माध्य्यम से मिला ..
    धन्यवाद 🙏🏻

  3. Avinash
    December 22, 2018 - 1:37 am

    I always found term ‘Khilafat’ misleading as it sounds more similar to ‘against’ and hence ‘asahyog’ or non cooperative movement – which it was not. The right terminolgy should be and should have been ‘Khalifahat’ so its easier to relate it with be Caliphate or Islamic state.

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