एग्जिट पोल के बाद ‘लिख ल्यो’ कहकर चौड़े होने वाले ठंडे पड़ चुके थे. उससे पहले उनकी चुनावी भविष्यवाणी के आत्मविश्वास से चुनाव आयोग भी संशय में पड़ जाता था कि मतगणना कराएं या यही मान लें. एक दल के भक्त गण दिल की धड़कनों को संभाल रहे थे. दूसरे दल के समर्थक चाहकर भी पत्थर पर दुब उगने का यकीन नहीं कर पा रहे थे. कुछ बजरंग बली का सुमिरन करके आशावादी हो रहे थे कि मंगल के दिन मंगल ही होगा. चुनाव प्रचार, ओपिनियन व एग्जिट पोल के प्रहसनों का भरपूर मजा लेने के बाद परिणामों का विश्लेषण झेलने के लिए जनता कमर कस चुकी थी. काले कोट व लाल टाई में एंकर भयंकर कुछ कर गुजरने के लिए स्टूडियो में सुबह सुबह आ गए थे. आज के परीक्षा परिणामों का तनाव माननीयों से अधिक रखने वाले सेफोलॉजिस्ट्स बेकरार थे, हर हाल में खुद को सही प्रमाणित करने की लग्जरी रखने वाले विश्लेषक बेताब.
टीआरपी पर जोरदार लूट-मार होने वाली थी. सबसे पहले, सबसे तेज के प्रोमो ऐसे चलाए जा रहे थे, गोया मतगणना आरम्भ होने से पहले ही रुझान-परिणाम बता दिए जाएंगे. तभी चुनाव आयोग की करुण पुकार आयी; “डेढ़ महीने से भचभचा रहे हो. चुनाव हो चुके हैं, कहो तो मतगणना करा लें.” संबद्ध पक्ष ‘विकल्पहीनता’ में यह मान गए और मतों की गिनती आरम्भ हो गयी. रुझान बताने की होड़ लग गयी, सूत्र सक्रिय हो गए. रुझानों में लगातार दिखते बदलाव से लोग यह समझ नहीं पा रहे थे कि हलकान फील करना है या मुस्कान बिखेरनी है. हलकान महसूस करने वालों को दिलासा दी जा रही थी कि अभी तो पोस्टल बैलेट की गिनती हो रही है.
रुझानों पर फैले खबरिया अराजकता या अफवाहों पर जनता ने वज्र संयम दिखाया. टीआरपी की लूट में अपना हिस्सा बढ़ाने के लिए चैनल्स अकथित रुप से यह कहते हुए प्रतीत हो रहे थे; “हमारे यहाँ मनपसंद रुझान/ परिणाम दिखाए जाते हैं.” जनता संग खेला जा रहा था. खीझ में जनता अपने टीवी रिमोट से खेलने लगी. किसी चैनल पर डेढ़ दो मिनट से अधिक रुकना जनता के लिए दुरुह हो गया था. सयाने लोग चुनाव आयोग की साइट पर जाते और वहाँ की खबरिया मंदी से सुस्त हो जाते. विश्लेषकों का हवा हवाई विश्लेषण जितना मनोरंजक था, दलीय प्रतिनिधियों के जीत का खोखला दावा उतना ही खीझ भरा. चैनल पर बैठे लोग दुनिया को वहीं सिमटा होने का वहम भी पाल बैठे थे.
बहरहाल, ‘हम जीत रहे हैं’ के दावों के बीच दोपहर बाद रुझान साफ हुए. कहीं कंधे झुके, कहीं हाथ हवा में लहराने लगे. एक को छोड़कर शेष राज्यों में मिठाई बँटने लगी. एक राज्य के लिए तो शाम तक यह डायलॉग चिपकाया जाता रहा; “पिक्चर अभी बाकी है दोस्त”. ‘लिख ल्यो’ की भविष्यवाणी में दल की जीत का दावा करने वाले खंभे नोचते हुए हार के कारण गिनाने लगे. कल तक सुशासन का कीर्तिमान भंग होता बता रहे थे, आज फुल फॉर्म आलोचक बन गए. इतनी आलोचना पहले पेट में खदकती ही रही होगी ना. पता नहीं, ये पहले शर्मीले थे या सहनशील. NOTA वालों को चहेटने की भूमिका बनाई जाने लगी जिनका पहले किया गया चहेटा भी इस परिणाम का एक कारक था. तो क्या हुआ जो राजनीति आग्रह की विषयवस्तु है, चहेटा की नहीं.
हालांकि हमलोग चार दिन लगातार एक सब्जी खाकर उब जाते हैं लेकिन परिणामों में जीतने वाला दल 15 साल की सत्ता विरोधी लहर को भी देश की राजनीति में ध्रुव परिवर्तन का संकेत बताने लगा. हास्य के पावरहाउस जिस नेता की जीत का पुनिया मुश्किल से हुआ था, उसके उभरने और निखरने की बात होने लगी. एक बार फिर पीएम पद का लड्डू उनके मन में फोड़ा जाने लगा. उत्साह पर प्रहसन कुछ दिन और जारी रहेगा. यह बात अलग है कि उनके उभरकर लिपटने व निबटने का प्रूवेन ट्रैक रिकॉर्ड है.
जीतने वालों की खुशी के समानान्तर भक्ति से ओत-प्रोत रुदन-क्रंदन भी आरम्भ हो गया. षडयंत्र सिद्धांत गढ़े जाने लगे. कल तक महिमामंडित किए जा रहे मतदाताओं को कुछ लोग परोक्ष रुप से भकलोल बताने लगे. कुछ ने उन पर परिपक्वता का लबादा लाद दिया. चिन्तन में फॉर्म स्ट्रेस पर स्ट्रेस बढ़ने लगा. नक्सलवाद की पीड़ा अचानक असह्य बतायी जाने लगी. सत्ता का अहंकार शिखर पर जाने की बात पर रोष दिखने लगा. कोर मुद्दे से भटकाव और नये मुद्दों से लगाव को कोसा जाने लगा. ऐसा करने में वे भी शामिल थे जो कल तक इन सरकारों के सुशासन के मुरीद बने हुए थे. उधर जीते हुए दल के नेतृत्व की परिपक्वता का प्लॉट भी तैयार किया जाने लगा. ‘एक जीतेगा, शेष हारेंगे और कुछ की जमानत जब्त भी होगी’ की अकाट्य भविष्यवाणी करने वाले एक विशेषज्ञ ने कहा; “सेंस ऑफ ह्यूमर की जीत हुई है”. परिणाम उल्टा होता तो भी यह टिप्पणी गलत नहीं होती.
इस सबसे भकुआई जनता को राहत तब मिली जब परिणाम देर रात तक आ गये. अगले दिन सरकार का स्वरुप भी लगभग तय हो गया. जनता को अपने फैसले का फौरी फायदा भी दिख गया जब एक राज्य के दो मुख्यमंत्री प्रत्याशियों के समर्थकों में धक्का-मुक्की की खबरें आईं. कहाँ तो उन्होने ईमोशन में फंसाकर रखा था, ये वैल्यू ऐड करके लाइव एक्शन भी दिखा रहे हैं.
‘यह जनता की जीत है’ और ‘हम हार के कारणों की समीक्षा करेंगे’ से अति अगंभीर जुमले छोड़े जाने लगे. एक टीकाकार ने कहा कि चिल्ल मारो, ऐसा कब हुआ है जो इस बार होगा. लेकिन क्या पता कि इस बार हो ही जाए – आशा पर आकाश टिका है.
लेखक द्वय: @Cawnporiah_ एवं @rranjan501
Pic Credit – dumielauxepices.net
