अंतिम लड़ाई का बिगुल फूँक दिया गया था. जस्टिस खेहर ने कहा कि हम 5 दिसंबर को यह मामला सुनेंगे. 5 दिसंबर को क्या हुआ, 2 मिनट में क्या निर्णय सुनाया गया? कहाँ से उतनी बुद्धि लायी गयी कि इतने महत्वपूर्ण विषय को 2 मिनट में अगली तारीख दे कर खिसका दिया गया? ऐसा मंदिर समर्थकों का तर्क था. जैसा कि हमने शुरू में कहा था, यहाँ वही ‘डर’ वाली बात आ रही है. इस मामले को कोई हाथ लगाने को तैयार नहीं है. हिंदू पक्षकारों में से एक का तो कहना है कि अदालत का व्यवहार सड़क पर लड़ने वाले लड़कों की तरह था. महोदय आगे कहते हैं कि ‘लड़ता कौन है बुद्धिमानों में? वही जिसका पक्ष कमज़ोर हो. यहां वकील और पैरोकारों नाच नाचकर शोर मचाने लगे.
चीफ जस्टिस नाराज़ थे कि इतने बड़े लोग ऐसा व्यवहार कर रहे हैं. हिंदू पक्ष पूरी तैयारी के साथ आया था, चाहो तो आर्ग्युमेंट शुरू कर दें वाले मूड में. इतनी तैयारी थी. मगर हुआ क्या भाई? उन्होंने अब 8 फरवरी की तारीख दी है. कुछ लोगों का यह तर्क था कि ट्रांसलेशन सबमिट नहीं हुआ है. ट्रांसलेशन सबमिट नहीं हुआ? गलत तथ्य! सब सबमिट हो चुका है. हिंदू पक्षकारों का कहना है कि दूसरे पक्ष को नहीं मिला तो यह उनकी गलती नहीं है. यह एडवोकेट को ऑन रिकॉर्ड को दे दिया गया था और रिसीविंग भी ले ली गयी थी. दूसरे पक्ष ने नहीं पढ़ा तो यह उनकी गलती है. एक ही वाक्य में कहें तो सब अदालती दाँव पेंच हैं.
एक विवरण आपके सामने पिछले आर्टिकल्स में रखा गया था कि 1528 के पहले यहाँ क्या था. व्हेदर देयर वाज़ ए टेम्पल ऑर नॉट? इफ देयर वाज़ ए टेम्पल देन गवर्नमेंट शुड एक्ट अकॉर्डिंग टू द विशेज़ ऑफ द हिंदू सोसाइटी. अदरवाइज गवर्नमेंट ऑफ इंडिया टू द विशेज़ ऑफ मुस्लिम सोसाइटी फ़ॉर स्योर. यह हिंदू पक्षकारों का तर्क है. उनका कहना है कि जब यह सिद्ध हो चुका है कि वहाँ मंदिर था, तो बहुसंख्यक हिंदुओं की भावनाओं का ध्यान रखा जाए.
हिंदू पक्षकार आगे कहते हैं कि अयोध्या में मंदिरों की कोई कमी नहीं है. सैकड़ों मंदिर हैं. सब राम जी के हैं. हज़ारों मंदिरों में से बमुश्किल दो मंदिर श्रीकृष्ण जी के हैं. भगवती और गणपति का एक मंदिर है. राम जी के जीवन में जो घटनाएं हुई, सब पर समर्पित एक मंदिर है. वनवास हुआ, कैकयी कोप भवन में गयी, एक मंदिर है बस. दो मंदिर नहीं हैं कोप भवन के नाम से. मतलब यह कि तर्कों के साथ तथ्यों का समायोग भी बेहतर तरीके से रखा गया.
जन्मभूमि कहाँ है यह प्रश्न उठता है. उनके हिसाब से लड़ाई क्या है? लड़ाई यह है कि हिंदुओं का 1528 में अपमान हुआ. सब गीत गा रहे थे कि टूट गया सिंहासन, टूट गया सिंहासन. और टूट गया सिंहासन. उस सिंहासन को प्राप्त करना. मंदिर का क्या करना है? यहाँ तो हजारों खंडहर पड़े हैं.
अपने तर्कों को आगे रखते हुए वह कहते हैं; “1963 में चीन ने हिंदुस्तान की कितनी भूमि हड़पी है, क्या हमने एक इंच भी वापस ली? संसद में रेजोल्यूशन है कि नहीं?” 1963 में भारत की संसद का प्रस्ताव है कि एक एक इंच भूमि वापस लेंगे. संघ के स्वयंसेवकों ने 50 साल पूरे होने पर सारे हिंदुस्तान को उस प्रस्ताव से अवगत कराया है. एक हज़ार साल बाद हिंदुस्तान की एक पीढ़ी कहती है कि 1963 के संसद के प्रस्ताव का क्रियान्वयन करेंगे. क्या अब भी कहेंगे कि इसे छोड़ दें. आप याद करिये, पार्लियामेंट में चर्चा तो चली पण्डित नेहरू ने कहा था, ‘”छोड़ दो जी! जाने दो जी! घास का तिनका भी पैदा नहीं होता”. तब कांग्रेस के ही एक सांसद महावीर त्यागी खड़े हो गए; “अरे मेरी खोपड़ी पर भी बाल नहीं है. मार कर तो देखो. छू कर तो देखो इस खोपड़ी को.” 1961 में हवाई हमला करके गोवा आज़ाद हुआ. बाबर के काल से भी लंबा है गोवा का काल. हमने छोड़ दिया क्या गोवा? देश के सम्मान को सीमाओं में बांधते हो? फिर तो तुम कह दोगे 712 ई• में हिंदुस्तान ग़ुलाम हो गया था, छोड़ दो. यह मंदिर की लड़ाई है या सिंहासन की, यह सोचने वाला विषय है.’
यह सम्मान की लड़ाई है, संघर्ष है अन्यथा मुसलमान भी कह रहे हैं कि 50 फ़ीट छोड़ कर बना लीजिए. क्यों बना ले भाई? मंदिर वहीं बनेगा. यह भी सवाल आपके मन मे होगा कि यदि यह लड़ाई है तो यह कब तक चलेगी? इसका भी जवाब हिंदू पक्षकार देते हुए कहते हैं कि जब तक हमारे सम्मान की पुनर्प्रतिष्ठा नहीं हो जाती. कितने तो आज भी जीवन के अंतिम चरण में जी रहे हैं और कहते हैं कि इस जन्म में देखने को मिलेगा मंदिर या नहीं. गंगा का प्रवाह अगर चलता रहता है तो गंगा का जलकण समुद्र में मिलता रहेगा. याद रखें,जो इस कार्य में आएगा, उसका अपमान होना तय है.
मगर इस बार कोई सौदेबाज़ी नहीं होगी. 1949 में हो गयी, अब नहीं होगी. सिंहासन की लड़ाई है – रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे!’
इतने तथ्यों के साथ अब आप स्वयं तय करें. यह पाठक पर निर्भर करता है कि वे आखिर क्या करना चाहते हैं. यदि वे सेक्युलर हैं तो अदालती कार्यवाही को देखे लें. यदि धार्मिक हैं तो पक्षकारों के तर्कों को देख लें. और यदि दोनों ही नहीं है तो फिर आराम से लोपक पढ़ते रहें.

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