आपको मंदिर चाहिए कि विकास?

 

अरे, आपको मंदिर चाहिए कि विकास? विकास के पथ पर मंदिर कहाँ आते हैं? ये तो बस मंदिर पर वोट बटोरने आये हैं. ये देश तोड़ेंगे. जातिवादी…सावरकर के फॉलोवर्स…अंग्रेजों के टट्टू!

कुछ याद आया?

अगर आप टीवी डिबेट्स देखने के आदि हैं तो यह आपने जरुर सुना होगा. सवाल यह यह कि विकास कहाँ हैं? विकास यदि करना है तो मंदिर की बात क्यों? मंदिर ही बनेगा तो विकास कैसे होगा? विकास-मंदिर, मंदिर-विकास की पहेली में आपको गोल गोल घुमाते हुए आपका घंटा डिबेट में सोख लिया जाता है.

सीधी सी बात है. अब तक मंदिर नहीं बना तो विकास रुका नहीं तो बनने के बाद विकास कैसे रुक जाएगा? धर्म और राजनीति को एक ही तराज़ू पर तौल दो? ऐसे तर्क उनके ही होते हैं जिनको मंदिर का इतिहास नहीं पता. उनके लिए मंदिर का इतिहास नब्बे के दशक से शुरू होता है. उनके लिए मंदिर विकास वाले मॉडल में कहीं फिट नहीं बैठता है. कम से कम उनके तर्कों से तो यही प्रतीत होता है.

एक छोटे परिवार का ही उदाहरण लेते हैं. यदि दो भाइयों के बीच विवाद हो तो क्या वह घर तरक्की करेगा? यह विवाद उनके घर को दो फाड़ कर देगा. वैसे ही भारतवर्ष भी एक परिवार है. क्या इस झगड़ते परिवार की तरक्की होगी? नहीं. तरक्की तभी होगी जब शांति हो और उससे समृद्धि आए. अयोध्या के झगड़े को तो निपटाना ही होगा. मगर नहीं. विकास तभी होगा जब मंदिर नहीं बनेगा. आपका तर्क ही मान लिया लें तो यह बताइए कि उसके बाद देश का विकास किस गति से होगा? कोई तथ्यात्मक विश्लेषण है? कोई विकास मापने का पैमाना है? नहीं? तो किस हिसाब से आप देश के बहुसंख्यकों की भावनाओं को समझौते की बुनियाद पर तौल देते हैं? मतलब यह नहीं है कि मंदिर बनने के बाद विकास की रफ्तार ज़बरदस्त तेज़ी से बढ़ जाएगी. लेकिन हमारा प्रश्न बस इतना ही है कि आखिर विकास और मंदिर एक साथ क्यों नहीं.

हिंदू समाज आज़ादी से भी पहले से उस मंदिर के लिए लड़ रहा है. बात सिर्फ मंदिर की नहीं बल्कि सिंहासन की है. सिंहासन, जो भगवान श्री राम का है, जन्मभूमि का है. जन्मभूमि बदली नहीं जा सकती है. सीधी सी बात है. मगर इसको विकास से जोड़कर क्यों देखा जाता है? क्या विकास के लिए अमेरिका ने चर्च बनाने बंद कर दिए? नहीं न? धार्मिक स्थल बनाना या न बनाना धार्मिक पद्धति और भावनाओं पर निर्भर करता है. विकास दुनिया की राजनैतिक परिस्थितियों और सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है. एक देश की तरक्की के लिए विकास और धार्मिक सौहार्द दोनों ही आवश्यक हैं. यह आपके ‘सेक्युलर’ एजेंडा में भी होना चाहिए. जिस ‘जन्मभूमि’ से करोड़ो हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुई है, उसको कैसे आप रोक सकते हैं? आपके तर्कों और कानूनी लड़ाई में अंतर है कि नहीं?

देश को विकास भी चाहिए, देश को मंदिर भी चाहिए वरना यह आंदोलन ही न हुआ होता. धर्म के रास्ते पर चलकर ही तो परमानन्द की प्राप्ति होती है. अदालत में भी गीता पर हाथ रख कर ही शपथ दिलाई जाती है. देश के संविधान की शुरुआत में ही महाभारत के श्लोक हैं. तो तय करिये की विकास और मंदिर को एक ही तराज़ू पर तौलना कितना उचित है.

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