भाजपा के अलावा उत्तर प्रदेश के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों में आवगमन कर चुके और उर्दू के खानदानी कलमकार व संपादक शाहिद सिद्दीकी ने 7 दिसम्बर, 2018 को ट्विटर के माध्यम से कहा कि कांग्रेस को मन्दिर-मन्दिर घूमने की जगह नेहरूवियन गाँधीवाद की तरफ लौटना चाहिए.
मुझे नेहरूवाद समझ मे आता है और गाँधीवाद की भी थोड़ी बहुत समझ है लेकिन नेहरूवाद और गाँधीवाद को किस मात्रा में एक दूसरे से मिलाने पर नेहरूवियन गाँधीवाद का घोल तैयार होता है इसकी समझ मुझे नही थी. लेकिन प्रख्यात नेहरूवादी और पार्ट टाइम गाँधीवादी रामचन्द्र गुहा ने जैसी मेरी नासमझी को दूर करने का दायित्व अपने ऊपर ले लिया और गोमांस खाते हुए अपनी तस्वीर ट्विटर पर पोस्ट कर दी. कहाँ तो कांग्रेस राज में रामचन्द्र गुहा शाकाहारी होते थे और भाजपा राज में गोमांस के सेवन तक पहुँच गए हैं. लेकिन यह मेरा मुद्दा नही है. मेरा मुद्दा तो नेहरूवियन गाँधीवाद है.
नेहरू और गाँधी के विचार एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत नही भी थे तो अलग अवश्य थे. अलग भी इतना कि जितना कठिन सावरकरवादी लीगी (मुस्लिम लीग) होना है या जिन्नावादी महासभाई (हिन्दू महासभा) होना है उससे कम कठिन नेहरूवियन गाँधीवादी होना भी नही है. लेकिन जहाँ पहले दो किस्म की प्रजाति से यह धरा शून्य है वहीं तीसरे किस्म के जीव ठीक ठाक संख्या में पाए जाते हैं.
गाँधी के लिए अहिंसा राजनीति का अस्त्र ही नही था वरन यह गाँधी का जीवन दर्शन भी था. इसका परिणाम यह था कि गाँधी के आश्रमों में मासांहार पूर्णतया वर्जित था. यहाँ तक कि जब सन 1934 में सीमांत गाँधी के नाम से प्रसिद्ध खान अब्दुल गफ्फार खान और उनके भाई महात्मा गाँधी के वर्धा आश्रम में कुछ लम्बे समय के लिए आये तो गाँधी जी के सामने दुविधा खड़ी हो गई क्योंकि गफ्फार खान मांसाहारी थे और सब्जी-भाजी में उनकी ठीक रुचि न थी. तो ऐसे में गाँधी जी ने अपने आश्रम से बाहर खान बन्धुओं के लिए भोजन के व्यवस्था की योजना बनाई. ये अलग बात है कि खान बन्धुओं ने इस व्यवस्था को अनावश्यक मानकर आश्रम का शाकाहारी भोजन ग्रहण करना ही ठीक समझा. लेकिन नेहरू इन वर्जनाओं को नही मानते थे और भोजन के विषय मे स्वतन्त्र विचार के आदमी थे. गांधी सार्वजनिक जीवन मे सादगी को बहुत महत्व देते थे. खुद हमेशा दूसरे दर्जे में यात्रा करते थे. अपने हाथों से बुने कपड़े पहनते थे. लेकिन नेहरू ने प्रधानमंत्री बनने के बाद दिल्ली का सबसे आलीशान तीनमूर्ति भवन अपनी रिहाइश के लिए चुना. चार्टर्ड प्लेन से उन्हें कभी भी गुरेज न था.
गोरक्षा भी एक ऐसा विषय था जिसपर गाँधी और नेहरू के विचार अलग ही थे. गाँधी ने कभी द्रवित होकर कहा था कि यदि मैं एकदिन के लिए तानाशाह बनूँ तो पहला काम गोहत्या पर प्रतिबंध का होगा. लेकिन नेहरू के लिए यह विषय महत्व न रखता था. इसीलिए संविधान के डिरेक्टिव प्रिंसिपल का हिस्सा बनाकर इसे छोड़ दिया गया. गोकशी देश मे अब भी जारी है और देश के बहुसंख्यक हिन्दू अहिंदुओं के हृदय परिवर्तन की प्रतीक्षा कर रहे हैं.
धर्म परिवर्तन भी एक ऐसा मुद्दा था जिसपर गाँधी और नेहरू अलग अलग सोच रखते थे. गांधी का मानना था कि यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य धर्म के धर्मग्रन्थों का अध्ययन करे और उसे उन ग्रन्थों में सत्यता दिखे तो वह निस्संदेह धर्म परिवर्तन कर सकता है. किंतु जिस तरह से मिशनरी हरिजनों और वनवासियों को अपना आसान निशाना बनाते हैं उससे गाँधी बेहद नाराज थे.
मिशनरियों को चुनौती देते हुए महात्मा गाँधी ने कहा “यदि मिशनरी समझते हैं कि ईसाई धर्म में धर्मांतरण से ही मुक्ति सम्भव है तो उन्हें ये काम मुझसे या महादेव देसाई (गांधी के सचिव) से आरम्भ करना चाहिए. गरीब गिरिजन (वनवासियों के लिए गांधी यही शब्द प्रयोग करते थे) और हरिजन तो गाय के समान भोले और मूक हैं. उन्हें ईसाई चावल के लिए बनाया जाता है न कि ईसा के लिए.
लेकिन नेहरू को जैसे इस बात से कोई फर्क ही नही पड़ता था. यहाँ तक कि उनकी ही सरकार के गृह मंत्री कैलाशनाथ काटजू ने सन 1953 में मिशनरियों पर प्रतिबंध लगाने की बात की तो उनकी कोशिशों को नेहरू और मौलाना आजाद ने ही पलीता लगा दिया. यहाँ तक कि 1960 में नियोगी कमीशन ने ईसाई धर्मांतरण पर अपनी रिपोर्ट में कहा कि आर्थिक सहायता को धर्मपरिवर्तन के हथियार के रूप में उपयोग किया जा रहा है और सेवा कार्य को मुखौटे की तरह उपयोग में लाया जा रहा है. यही नही वनवासियों में अलग पहचान स्थापित करने के लिए उन्हें अलगाववाद की तरफ भी मोड़ा जा रहा है. लेकिन अपनी ही सरकार द्वारा बनाई गई कमीशन की इस अत्यंत महत्वपूर्ण रिपोर्ट पर नेहरू ने कान देना जरूरी न समझा.
गांधी जहाँ अंग्रेजी के विरुद्ध थे और स्वतंत्र भारत मे एकदिन भी राजकीय कार्यों के लिए अंग्रेजी का उपयोग के विरुद्ध थे वहीं नेहरू ने यह सुनिश्चित किया कि अंग्रेजी अनन्तकाल तक प्रभु वर्ग की भाषा बनी रहे. लोकतंत्र के मामले में भी गांधी के विचार नेहरू से बहुत अलग थे. गांधी सत्ता के अधिकतम विकेंद्रीकरण के पक्ष में थे. पंचायतों और नगर निकायों को शक्ति देना चाहते थे. लेकिन हम जानते हैं कि आज भी इन संस्थाओं के पास कोई विशेष शक्ति नही. गांधी तो दलीय लोकतंत्र को भी स्वीकार नही करते थे. उन्होंने दलीय लोकतंत्र को बाँझ कहा था, वे कांग्रेस को अराजनीतिक संगठन में बदल देना चाहते थे.
अर्थव्यवस्था और औद्योगिकीकरण पर भी दोनों के विचार बिल्कुल अलग थे. जहाँ नेहरू समाजवाद और रूसी अर्थव्यवस्था मॉडल से प्रभावित थे वहीं गांधी ग्रामोद्योग को ही भारत की समस्याओं का समाधान मानते थे और भारी उद्योगों को भारत के प्रतिकूल मानते थे.
डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल और कृपलानी जैसे लोग प्रारम्भ से ही गांधी के साथ थे. लेकिन नेहरू का मामला ऐसा न था. 1922 में हुए चौरा चौरी कांड के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन को समाप्त कर दिया. इससे जो निराशा और असन्तोष पनपा उसके परिणामस्वरूप स्वराज पार्टी का गठन हुआ. इसमें सुभाष चन्द्र बोस, चित्तरंजन दास, विट्ठलभाई पटेल जैसे नेताओं के साथ मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू भी शामिल हुए. अगले 15 साल की राजनीति में नेहरू सुभाषचंद्र बोस के साथ या यों कहें कि पीछे ही रहे. लेकिन जब सुभाषचन्द्र बोस और गांधी के मध्य कांग्रेस की नीतियों को लेकर संघर्ष हुआ तो नेहरू गांधी खेमे में चले गए. अपने से 8 वर्ष छोटे सुभाष की छाया में नेहरू सर्वमान्य नेता नही बन सकते थे लेकिन गांधी खेमे में यह संभावना मौजूद थी.
हिन्दू-मुस्लिम समस्या ही एकमात्र मुद्दा था जिसपर नेहरू और गांधी एक ही विचार रखते थे. वस्तुतः इसी मुद्दे पर नेहरू औए गांधी के जो विचार थे उसे ‘नेहरूवियन गांधीवाद’ कहा जा सकता है. इसी एक सहमति ने नेहरू के लिए भविष्य के राजद्वार खोले. 1937 के प्रांतीय और केंद्रीय सदन के चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा. चुनाव के पहले कांग्रेस और लीग में अनौपचारिक सहमति बनी थी कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग, दोनों ही दल मिलकर सरकार बनाएंगे. लेकिन अब कांग्रेस इसके लिए सहमत नही थी. जिन्ना इससे बहुत आहत हुए. 100 से भी अधिक सेवाईल सूटों के मालिक जिन्ना अब शेरवानी में थे. मुस्लिम लीग की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई. साम्प्रदायिकता की आग में देश जलने लगा.
1940 आते आते द्वितीय विश्वयुद्ध चरम पर था और लीग की साम्प्रदायिक राजनीति भी. द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन जिस तरह से जन और धन की हानि झेल रहा था वैसे में यह स्पष्ट था कि विश्वयुद्ध के नतीजें जो भी हों लेकिन भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हो ही जाएगी. ऐसे में गांधी को लगता था कि सबसे बड़ी चुनौती मुस्लिम समस्या का समाधान है. मुस्लिम समस्या पर गांधी का मत था कि मुस्लिम समाज के प्रश्नों और दुविधाओं के समाधान का दायित्व हिंदुओं का है जबकि डॉ राजेन्द्र प्रसाद, राजाजी और सरदार पटेल जैसे लोग मानते थे कि इस मामले में हिंदुओं का कोई अतिरिक्त दायित्व नही है और इस मुद्दे का समाधान दोनों को ही करना होगा. लेकिन नेहरू यहाँ गांधी से सहमत थे. कांग्रेस की राजनीति यहाँ से मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति बनती गई और नेहरू गांधी के करीब आते गए. लेकिन इसमें किसी को भी रंचमात्र भी संदेह न होना चाहिए कि नेहरू और गांधी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति इस देश के लिए भयंकर परिणाम लेकर आया. करोड़ों हिन्दू अपने पूर्वजों की भूमि से विस्थापित हुए. मरने वालों की सँख्या भी 40 लाख से अधिक थी. 1000 वर्ष के इस्लामी अतिक्रमण का सामना करते हुए हिंदुओं की जितनी क्षति नही हुई उससे अधिक क्षति भारत के विभाजन के रूप में ‘नेहरूवियन गाँधीवाद’ के रूप मे हुई. जब नेहरू ‘ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी’ जैसा जानदार भाषण संसद के सेंट्रल हॉल में दे रहे थे तब कितनी ही हिन्दू-सिख कन्यायें पश्चिमी पंजाब और पूर्वी बंगाल में बलात्कार का शिकार हो रही थीं. कितने ही वृद्ध, और बालक भागते भागते दम तोड़ रहे थे.
हिंदुओं का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ही नेहरूवियन गाँधीवाद है. इस नेहरूवियन गाँधीवाद को देश जितनी शीघ्रता से तिलांजलि देगा उसका उतना ही भला होगा. दूसरे शब्दों में उतना ही कम नुकसान होगा.
लेखक: मुकुल मिश्रा (@MukulKMishra)

5 Comments
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