प्यार का पंचनामा: फ्लैशबैक में

 

समय के साथ जीवन सरल होता जा रहा है. हर घटना आपके पांच इंची फ़ोन में घटने के पहले खबर बनकर चमक जाती है. अलेक्सा जी गाने सुनाती हैं तो गूगल बाबा राह दिखाते हैं. खाना भी फ़ोन से आता है और सुना है कि मय्यत का सामान भी, वो भी ‘डील ऑफ़ द डे’ के साथ. पर क्या सब कुछ आज पहले से आसान है? नहीं, एक चीज़ है जो पहले से काफी जटिल हो गयी है और वो है प्यार, खासकर मनचले लड़कों के लिए.

जी हाँ, मैं उन दिनों की बात कर रहा हूँ जब फ्रेंड, जस्ट फ्रेंड्स, फ्रेंड्स विथ बेनिफिट आदि परिभाषाएं नहीं होती थीं. एक लड़की के साथ किसी लड़के का रिश्ता सिर्फ बाइनरी में होता था. या तो वो मुंहबोली बहन होती थी या प्रेमिका, अधिकांशत: मुंहबोली. प्रेम त्रिकोण, चौकोण, षष्टकोण सिर्फ फिल्मों में होते थे. असल ज़िन्दगी में नवीं- दसवीं तक “तेरी वाली, मेरी वाली” चिन्हित हो जाती थीं. इसके साथ दोस्तों में कसमें भी खायी जाती थीं; “भाई मैं भाभी के चरणों के ऊपर नहीं देखूँगा कभी”. हालांकि कभी कभी भाभी अक्सर इन सब कसमों वादों से अनभिज्ञ अपने “देवरों” को लव लेटर लिख मारती थीं. ऐसी विस्फोटजनक परिस्थितियाँ यदा-कदा ही होती थीं क्योंकि प्यार के इज़हार के तरीके तकनीकी लिमिटेशन से ग्रस्त थे. किसी लड़की का किसी लड़के तक प्यार का सन्देश बिना बदनामी, बाप की मार, नज़रबंदी और यहाँ तक कि असमय विवाह के बगैर पहुँचना बड़ा ही मुश्किल होता था.

लड़कों में इस समस्या का उतना असर नहीं था. एक तो लड़कों की प्रजाति उस समय लतखोर हुआ करती थीं और लड़की के बाप, भाई या पडोसी से पिट जाना और फिर उन्हें रात के अँधेरे में पीट देना, स्कूटर की लाइट फोड़ देना इत्यादि एक तरह से परमवीर चक्र टाइप फीलिंग दे जाता था. दोस्त भी इसी समय काम आते थे. वे अपना स्कूटर, लूना या साइकिल जो भी यथा शक्ति वाहन हो, उस पर सवार रहते थे. प्रेमी के प्रेम पत्र घर के अंदर फेंकते ही गाडी सरपट भगा देते थे. भागना भी आसान था क्यूंकि तब दुनिया ग्लोबल विलेज नहीं हुई थी और मुहल्लों में ही सिमटी थी. प्यार भी इन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अक्सर अपने या पड़ोस वाले मोहल्ले में ही हो जाता था. मोहल्ले का प्यार फ़ोन, वाहन आदि कठिनाइयों का असर काफी हद्द तक काम कर देता था. वैसे तो इजहार औपचारिकता ही होती थी, प्रेमी तो बस प्रेमिका के घर के २-३ चक्कर लगा कर खुश हो जात्ते थे.

ऐसा भी नहीं था कि प्यार सदा मुंहबोला हुआ करता था. कभी कभी प्यार परवान भी चढ़ता था, अंजाम तक भी पहुँचता था. लड़के के चक्कर मारते वक्त लड़की का घर के गेट पर या खिड़की पर खड़े होकर मुस्कुराने से प्यार कन्फर्म मान लिया जाता था. लड़के के मित्र उसके विवाह की मुंहबोली तैयारियां शुरू कर देते थे. इस तैयारी की शुरुआत लड़की को एक गानों का कैसेट उपहार स्वरुप देकर की जाती थी. गाने अक्सर रिकॉर्ड करवाए जाते थे और कुछ दिलफेंक आशिक अपनी आवाज़ में २-४ सड़क छाप शेर भी रिकॉर्ड कर देते थे. प्यार और परवान चढ़ जाता था जब अगले दिन लड़के के चक्कर लगाने के वक़्त (जिसे आजकल स्टाकिंग कहा जाता है) लड़की उन गानों को जोर जोर से बजाते हुए उसका इंतज़ार करती थी.

इसके बाद कॉफ़ी हाउस में एक दो मुलाक़ातें, सस्ते इत्र के तोहफे और बात शादी तक पहुँच जाती थी. ऐसे समय में चाचियों और मामियों की सेवाएं ली जाती थीं. गरीब, नौकरी पेशा लड़कों को तो “बेटा कुछ बन जाओ तो बात करेंगे” की सोन-चिरैय्या दिखा दी जाती थी. ज्यादातर ऐसे लड़के उस लड़की के बच्चों के मामा के रूप में रीएंट्री मारते थे. कुछ बिरले ही होते थे जिनमे लड़की को भगा कर, दूसरे शहर के आर्य समाज मंदिर में शादी करने का माद्दा होता था. ऐसे परम प्रतापी प्रेमियों के किस्से चाय की टपरियों, पान के ठेलों और सड़क की पुलियाओं में श्री सत्यनारायणकी कथा की तरह बांचे जाते थे. तब प्यार बहुत आसान था क्योंकि प्यार क्या होता है, ये नहीं पता होता था, किसको, किससे क्यों हुआ का भी कोई उत्तर नहीं होता था, पर गर परवान चढ़ा तो अक्सर निभ भी जाता था

 

लेखक: अनुराग दीक्षित (@bhootath)

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