छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान के चुनाव कांग्रेस के लिए करो या मरो का चुनाव है। यदि इन तीन राज्यों में कांग्रेस हारती है तो ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ हकीकत में बदल जायेगा। कांग्रेस के प्रचार पर यह दबाव स्पष्ट दिख भी रहा है। तभी राहुल गाँधी के करीबी और राजस्थान में मुख्यमंत्री पद के पसन्दीदा उम्मीदवार सीपी जोशी ने कहा कि मोदी ‘छोटी जात’ के हैं और हिन्दू धर्म पर बोलने का अधिकार उनके जैसे ब्राह्मणों को ही है। वहीं यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष राज बब्बर ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की माँ को बेवजह चुनावी चौसर पर घसीटा। तो पूर्व केंद्रीय मंत्री व नेहरू-गाँधी परिवार के बेहद खास माने जाने वाले विलास मुत्तेमवार ने ‘आरोप’ लगाया कि मोदी किसी बड़े खानदान से नही हैं और उनके दादा-परदादा का नाम कोई नही जानता। वैसे तो लोग राजीव गाँधी के दादा परदादा का नाम भी नही जानते हैं लेकिन वह एक अलग मुद्दा है। कांग्रेस के दरबारी पत्रकारों ने यह देखते हुए की सीपी जोशी, राज बब्बर और विलास मुत्तेमवार के बड़बोलेपन से चुनावों में कांग्रेस को नुकसान हो सकता है, सूत्रों के हवाले से ऐसी खबरें प्रसारित कराई कि कांग्रेस सुप्रीमों इन हरकतों से नाराज हैं।
लेकिन ये समझना होगा कि राजनीति में बेहद व्यक्तिगत होकर और निचले स्तर तक जा कर कीचड़ उछालना कांग्रेस का पुराना शगल रहा है। इसके लिए हम चलते हैं सन 1977 में। 1977 के आम चुनावों में देश की जनता ने आपातकाल की ज्यादतियों के लिए कांग्रेस को दंडित किया और जनता पार्टी चुनाव जीत गई। आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहेब देवरस मानते थे कि एक दलित प्रधानमंत्री देश और हिन्दू समाज को अच्छा सन्देश देगा। बाबू जगजीवन राम एक सुलझे हुए, राजनीतिक सूझबूझ में माहिर और दक्ष प्रशासक माने जाते थे। बंगलादेश मुक्ति आंदोलन के समय रक्षामंत्री के रूप में उनकी भूमिका को देश देख चुका था। तो जनसंघ धरा पूरी तरह जगजीवन राम के समर्थन में था। लेकिन जनता पार्टी का समाजवादी धरा किसी भी कीमत पर जगजीवन बाबू को प्रधानमंत्री बनाने को तैयार न था। किसी तरह मोरारजी देसाईं पर सहमति बनी। लेकिन पहले दिन से ही सरकार कई तरह के विरोधाभाषों से जूझ रही थी। मोरारजी ईमानदार लेकिन बेहद जिद्दी और अक्खड़ माने जाते थे। उनका व्यक्तित्व सरकार चलाने में आड़े आ रहा था। माना जा रहा था कि शीघ्र ही नेतृत्व परिवर्तन होगा और तब के उपप्रधानमंत्री जगजीवन राम को सरकार का नेतृत्व मिलेगा। मोरारजी लंबे समय तक नही चलेंगे इसपर जनता पार्टी के समाजवादी भी सहमत थे। लेकिन जगजीवन राम उनको किसी भी कीमत पर स्वीकार न थे और वे लोग चौधरी चरण सिंह को प्रधानमंत्री बनाने की योजना पर काम कर रहे थे।
उधर इंदिरा और संजय का मानना था कि जगजीवन राम का कांग्रेस से जनता पार्टी में जाना ही ‘जनता लहर’ का कारण था। इंदिरा और संजय हर हाल में जगजीवन राम को दंडित करना चाहते थे। दुश्मन का दुश्मन दोस्त, इस आधार पर समाजवादी धरे और कांग्रेस ने एक योजना बनाई जो घटिया राजनीति का प्रतीक बन गई। जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम का चरित्र ठीक न था। ये बात लूट्यन्स दिल्ली में आम थी। इस योजना के तहत दिल्ली यूनिवर्सिटी के सत्यवती कॉलेज की एक छात्रा और सुरेश राम के निजी पलों को एक गुप्त कैमरे में कैद किया गया। कहा जाता है कि ये काम तब चौधरी चरण सिंह के करीबी रहे और आजकल नीतीश की सेवा में लगे एक समाजवादी नेता ने किया था। इन तस्वीरों को नेशनल हेराल्ड के तत्कालीन सम्पादक और मशहूर लेखक खुशवंत सिंह को भेज दिया गया। खुशवंत तब संजय और इंदिरा के बेहद करीबी थे। उन्होंने आपातकाल का भी समर्थन किया था। ये तस्वीरें इंदिरा के सामने प्रस्तुत की गईं। फिर किसी बिचौलिये के माध्यम से ये तस्वीरें जगजीवन राम को भेजी गईं और न छापने के एवज में उन्हें जनता सरकार और जनता पार्टी से इस्तीफा देने को कहा गया।
बिहार का यह दलित नेता अपने जीवन में बहुत सारे चुनौतियों को झेलते हुए यहाँ तक पहुँचा था और इतनी जल्दी हार मानने वाला नही था। जाहिर है जगजीवन बाबू ने झुकने से इनकार कर दिया। उनका अंदाजा था कि उन्होंने दशकों तक कांग्रेस और गाँधी परिवार की सेवा की है। ऐसे में वे लोग जगजीव राम के परिवार पर हमला नही करेंगे जिसका राजनीति से कोई सम्बन्ध नही था। लेकिन हुआ इसका उल्टा। उन दिनों मेनका गाँधी ‘सूर्या’ नामक एक पत्रिका निकालती थीं। कहने को तो वे सम्पादक थीं लेकिन इस पत्रिका का सारा काम खुशवंत नेशनल हेरल्ड के कार्यालय से ही सम्भालते थे। तो कहा जाता है कि गाँधी परिवार के निर्देशों पर ये तस्वीरें ‘सूर्या’ में छाप दी गईं।
पूरे देश मे हंगामा मच गया। जनता पार्टी के अंदर जगजीवन राम के विरोधियों को मौका मिल गया था। उनकी राजनीति इसके बाद धीरे धीरे समाप्ति की ओर बढ़ गई। जिस जगजीवन राम को दलित वोटों के लोभ में इंदिरा गाँधी ‘बाबूजी’ कहा करती थीं, उन्ही जगजीवन राम की इज्जत उछालने में उन्हें दो बार सोचने की जरूरत महसूस नही हुई।
सुरेश राम का राजनीति से कोई सम्बन्ध न था। वे कोई ग़ैरकानूनी काम नही कर रहे थे और न ही उनकी हरकतों का उनके पिता के रसूख से कोई विशेष सम्बन्ध था। और दिल्ली विश्वविद्यालय की वह छात्रा, जिसका न राजनीति से कोई लेना देना था और न सत्ता से, उसकी इज्जत सरेआम उछाल दी गई।
जिस पार्टी और परिवार का ऐसा इतिहास है, यदि वह प्रधानमंत्री के दिवंगत पिता और वयोवृद्ध माता को राजनीति के चौसर पर मोहरा बना रही है तो आश्चर्य नही होना चाहिए।
लेखक – गेंदा भैया

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