हम भारतीय ‘अतिथि देवो भव:’ की बात करने वाले लोग हैं. हमारे घर में जब भी कोई मेहमान आता है तो.हम यह प्रयास करते हैं कि उसकी सुख-सुविधा में किसी भी प्रकार की कमी न रह जाए. लेकिन मेहमान नवाजी तब तक ही करनी चाहिए, जब तक मेहमान से नुकसान न हो.
यहां जिन मेहमानों का ज़िक्र किया जा रहा है, वे पड़ोसी देशों से घुसपैठ कर आए रोहिंग्या मुसलमानों सहित अन्य घुसपैठिये हैं. भारत की पिछली सभी सरकारों द्वारा इन घुसपैठियों की भरपूर मेहमान नवाजी की गई है, लेकिन वर्तमान सरकार ने इन घुसपैठियों को मेहमान मानने से साफ तौर पर इंकार कर दिया है.
इससे पूर्व सरकार ने इन घुसपैठियों के देश में प्रवेश पर भी रोक लगा दी थी, जबकि पहले की सरकारों ने इस संबंध में विचार भी नहीं किया था.
घुसपैठियों के विषय में सरकार की मंशा को अमित शाह ने भी स्पष्ट किया. गत दिवस अमित शाह कश्मीर के सुंदरबनी में एक सभा को संबोधित कर रहे थे, तब उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की समाप्ति से पहले सभी घुसपैठियों को देश से बाहर कर दिया जाएगा.
श्री शाह ने कहा कि हमारी सरकार ने रोहिंग्याओं की घुसपैठ पर लगाम लगाने का काम किया है, जबकि पीडीपी की सरकार ने रोहिंग्याओं का स्वागत किया था. श्री शाह के अनुसार ये घुसपैठिये इस देश में दीमक की तरह हैं, जो इस देश को खोखला कर रहे हैं.
यह सच है कि आज़ादी के सत्तर साल बाद भी भारत ग़रीबी से जूझ रहा है. इसके बाद भी यदि हम दूसरे देशों से घुसपैठ कर आए लोगों को शरण देंगें तो हम देश के नागरिकों की गरीबी कैसे दूर पाएंगे.
आज भारत के पास भरपूर संसाधन हैं लेकिन इनका उपयोग पहले भारतीयों के लिए हो और बाद में औरों के लिए, यह आवश्यक है. यहां हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत की जनसंख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है, तब घुसपैठियों को देश में शरण देने का क्या औचित्य है.
घुसपैठिये भूमिहीन हैं किन्तु अधिकांश राज्य सरकारें वोट बैंक के चक्कर में इन्हें राशनकार्ड उपलब्ध करा देती हैं. इसके बाद ये घुसपैठिये देश के किसानों के खून पसीने की कमाई को एक रुपए किलो गेहूं व दो रुपए किलो चावल की दर से ख़रीदकर मौज़ उड़ाते हैं. इतना ही नहीं देश के संसाधनों पर ‘डाका डालने’ के बाद देश विरोधी गतिविधियां भी करते हैं.
बता दें कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी व जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती द्वारा इन घुसपैठियों का खुले तौर पर समर्थन किया जाता है. भारत में घुसपैठ की गतिविधियां रोहिंग्या मुसलमानों द्वारा सर्वाधिक की जा रही हैं.
ये वही रोहिंग्या हैं, जिन्हें म्यांमार की सरकार ने देश से बाहर कर दिया है. किसी दूसरे देश द्वारा बाहर किए गए लोगों के प्रति ममता बनर्जी व महबूबा मुफ्ती की सहानुभूति हज़ारों सवाल खड़े करती है. घुसपैठियों को समर्थन का एकमात्र कारण सहानुभूति नहीं बल्कि महज़ वोटों की लालसा है.
बहरहाल, सरकार ने घुसपैठियों के प्रति अपना रुख स्पष्ट कर दिया है. रोहिंग्याओं की अनेक खेप देश से बाहर भेज दिए गए हैंं.अब देखना यह है कि सरकार की सख्ती के बाद ये घुसपैठिये आख़िर कब तक देश में रह पाते हैं लेकिन एक प्रश्न राजनीतिक गलियारों में अवश्य गूंज रहा है कि देश का वोटर घुसपैठियों का समर्थन करने वालों को वोट करेगा या उन्हें देश से बाहर करने वालों को.

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बहुत अच्छी व्याख्या