तुष्टिकरण कब तक, कहाँ तक, किसकी कीमत पर?

शनिवार को जोधपुर में रामनवमी शोभायात्रा के विरोध में हिंदुओं के घरों पर हमला हुआ. कुछ घरों में आग लगा दी गई और कुछ पर पथराव हुआ. महिलाओं के साथ घर मे घुसकर बदतमीजी की गई. पुलिस की गाड़ियों पर भी पथराव हुआ. समुदाय विशेष के लोगों के सामने पुलिस पूरी तरह असहाय नजर आई. इस पर तुर्रा यह कि समुदाय विशेष के उपद्रवियों की जगह पुलिस ने निर्दोष हिंदुओं को ही उठाकर थाने में बंद कर दिया. भाजपा नेता, केंद्रीय मंत्री व जोधपुर से उम्मीदवार गजेन्द्र शेखावत के हस्तक्षेप के बाद ही देर रात को उन युवकों को थाने से रिहा किया गया.

सूरसागर इलाके के जिन घरों पर हमला हुआ है, वह अन्य पिछड़ा वर्ग के माली जाति के लोगों का बताया जाता है. जोधपुर, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का गृहनगर भी  है और उनकी राजनीति का केंद्र भी है. अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत आसन्न लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के उम्मीदवार भी हैं. ऐसे में यह प्रश्न तो उठता ही है कि मुख्यमंत्री यदि अपने ही शहर में, अपने ही समुदाय के लोगों को न्याय दिलाने में सक्षम नही हैं तो बाकी राजस्थान में जनता किन परिस्थितियों में होगे. लेकिन सवाल तो और भी हैं.

राजस्थान में चुनावी मुकाबला द्विध्रुवीय है. समुदाय विशेष बड़ी संख्या में तो भाजपा की तरफ आने से रहे. ऐसे में उनका वोट तो कांग्रेस को ही जाना था. फिर ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि मुख्यमंत्री अपने ही लोगों को न्याय नही दिला सके. क्या तुष्टिकरण की राजनीति करते करते कांग्रेस इतनी पंगु हो गई है कि वह हिंदुओं के साथ न्याय कर ही नही सकती? लेकिन यह समस्या कांग्रेस भर की नही है. याद करें तो ‘अजगर’ की राजनीतिक थ्योरी में समुदाय विशेष को जोड़कर ‘मजगर’ बनाने वाले चौधरी चरण सिंह ही थे.

वर्ष 2013 में जाटों के खिलाफ हिंसा करने में समुदाय विशेष ने कोई कोर-कसर नही छोड़ी. तब भी चौधरी अजित सिंह या समाजवाद पार्टी एक क्षण को भी जाटों के साथ खड़ी नही हुई. अक्सर ऐसा देखने मे आता है कि हिन्दू जातियों और समुदाय विशेष राजनीतिक गठजोड़ में समुदाय विशेष की हालत दामाद वाली और हिंदुओं की हालत घर के नौकर वाली होती है.

उत्तर प्रदेश में भी जहाँ भी दलितों और समुदाय विशेष के बीच संघर्ष हुआ है, मायावती या तो चुप रहीं हैं या मुसलमानों के पक्ष में झुकी हैं. यही उनका भी काम करने का तरीका है. यदि उत्तर प्रदेश या देश मे कहीं भी भाजपा की सीटें कम होती हैं तो इससे समुदाय विशेष की हिम्मत दोगुनी हो जाएगी. ऐसे में इनका ओबीसी और दलित जातियों से संघर्ष भी बढ़ेगा. लेकिन उस हालात में अखिलेश, राहुल या माया इनके काम आएंगे या नही, यह लाख टके का सवाल है.

सवाल अब इन तथाकथित पिछड़ा वर्ग व दलितों की राजनीति करने वाले नेताओं से करना व्यर्थ है क्योंकि इन नेताओं को तो अब सिर्फ़ अपनी कुर्सी,अपने परिवार और अपने घर के ख़ज़ाने भरने की चिंता है. सवाल अब दलित व पिछड़े को अपने आप से पूछना होगा कि समुदाय विशेष जब उनके घर में घुस कर मारेगा तो वो जाति देखकर नहीं मारेगा. वह सबको काफ़िर कह कर मारेगा.और तब दलितों व पिछड़ों की राजनीति के नाम पर अरबों रुपये की सम्पत्ति कमा कर बैठे इनके नेता किसकी तरफ़ खड़े होंगे?