इस देश की राजनीति में उस समय एक नई ताज़ा हवा चलती तब दिखी जब बंगलुरू साउथ से 28 वर्षीय तेजस्वी सूर्या को भाजपा का टिकट दिया गया. मीडिया में इनकी ज़्यादा बात भले ना हो लेकिन यह अपने आप मे एक सुखद है कि इस देश की राजनीति में युवाओं का आगमन ही नहीं हो रहा, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा उन्हे चुनावी मैदान में भी उतारा जा रहा है.
यह खबर लुट्येन्स मीडिया की हेडलाइन न बन पाई. वस्तुतः वे किसी बड़े नेता के बेटे को चुनावी टिकट मिलने का इंतज़ार कर रहे थे. उनके अरमानों को एक बड़ा झटका तब लगा जब तेजस्वी का नाम सामने आया. वैसे तेजस्वी की भाषण शैली ने बहुत से लोगों को प्रभावित किया है. उनके कुछ वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हुए हैं. लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि सिर्फ भाषण देने की कला से ही कोई व्यक्ति एक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने लायक नहीं बन जाता. अब उनको कौन समझाए कि युवा शक्ति के नाम पर बेगूसराय में भी एक ऐसे ही नेता को उतारा जा रहा है लेकिन क्योंकि वह विपक्षी खेमे का नेता है तो ज्यादा शोर नहीं किया जा रहा. वैसे भी चुनावी सरगर्मी के बीच में क्षेत्रीय उम्मीदवार की बात कौन करता है. असली लड़ाई तो राष्ट्रीय नेतृत्व के धुरंधरों के बीच होती है.
तेजस्वी पर आरोप भी लगने शुरु हो गए. वैसे तेजस्वी यह पहले से ही जानते हैं कि यदि राजनीति में आए हैं तो उनके चरित्र पर कीचड़ उछलना तय है. वही हो भी रहा है. तेजस्वी की एक तस्वीर को सोशल मीडिया पर आधार बनाकर यह बताया जा रहा है कि उनकी विचारधारा सांप्रदायिक है. यह सांप्रदायिक एक ऐसा शब्द है जिसको हम राजनीति में न जाने कितने दशकों से सुनते आ रहे हैं. ट्रेन की सीट लेने से लेकर दिवाली के पटाखे फोड़ने तक, यदि आपने आवाज उठाई तो तुरंत सांप्रदायिक वाला ‘येलो कार्ड’ आपको पकड़ा दिया जाएगा.
एक तस्वीर को आधार बनाकर हवा बनाई जा रही है. उस तस्वीर में तेजस्वी कुछ ‘धारदार हथियारों’ के साथ बैठे हुए दिखाई दे रहे हैं. हालांकि सनातन संस्कृति में इसको शस्त्र पूजा कहते हैं लेकिन नए आधुनिक सेक्युलरवादी राजनीति में इसको कम्युनल कहा जाता है. उन लोगों के तर्कों को आप सुनेंगे तो कपिल शर्मा के शो की टीआरपी निश्चित रूप से गिर जाएगी. जैसे हास्यास्पद तर्क तेजस्वी को साप्रदायिक साबित करने के लिए दिए जा रहे हैं, वह भारतीय राजनीति में विपक्षी पार्टियों की एक दयनीय स्थिति परिलक्षित करती हैं.
बड़ी अजीब स्थिति है कि समाज के अंदर यदि कोई एक वर्ग दुख प्रकट करने के लिए तलवारों को लहराते हुए रक्तरंजित शरीर के साथ मजमा निकाले तो वह उसका धार्मिक अधिकार है. दूसरी तरफ दूसरा वर्ग सिर्फ शस्त्र पूजा करे तो वो साप्रदायिक हो जाता है. तर्क दिए जाते हैं कि इसी के बाद सांप्रदायिकता फैलती है. उचित तो यह है कि तराजू को बराबर पकड़ा जाए, पैमाने एक रखे जाएं.
यदि आपके शब्दकोष में सांप्रदायिकता का यही अर्थ है तो यह सभी वर्गों के लिये होना चाहिए. सिर्फ एक वर्ग पर सभी सीमाएं लगा देना ‘दोमुँहापन’ कहा जाता है. राजनीति में बदलाव सिर्फ क्रांति से नहीं आता है. बड़ी विडंबना तो यह है कि शांतिकाल की पैरवी करने वालों ने ही सबसे ज़्यादा अशांति फैलाने वालों की पैरवी की है.
तेजस्वी बेंगलुरु में चुनाव लड़ रहे हैंं. यदि वह जीत जाते हैं तो यह राजनीति में एक नए युग की शुरुआत होगी. यदि वह सफल न हुए तब भी कम से कम यह बात तो तय है कि एक युवा को अवसर दिया गया. देश की लोकसभा में युवाओं की भागीदारी बढ़ेगी. वैसे भी यह देश मात्र राज घरानों के घर के युवाओं को राजनीति में आते देखकर थक चुका है. देखना यह है कि बंगलुरू के लोग क्या सोचते हैं. बाकी राजनीति है, चलती रहेगी.
दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.
