भारत के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद देशहित व सामाजिक कार्यों के लिए प्रदान किए जाने वाले सम्मान पद्म पुरुस्कार से देश के महानायकों को सम्मानित कर रहे थे. इस दौरान कुछ ऐसा हुआ जिसे देख वहाँ बैठे सभी लोग तालियां बजाने लगे. शनिवार को राष्ट्रपति 106 साल की सालूमरदा थीमक्का को राष्ट्रपति भवम में ही पद्मश्री से सम्मानित कर रहे थे. इस दौरान राष्ट्रपति भवन का कड़ा प्रोटोकॉल भी ‘महानायिका’ के आगे कमज़ोर हो गया. पद्म पुरस्कारों के वितरण समारोह में कर्नाटक में हजारों पौधे लगाने के लिए पर्यावरणविद् व सामाजिक कार्यकर्ता सालूमरदा थीमक्का को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद सम्मानित कर रहे थे. इस दौरान थीमक्का ने आशीर्वाद स्वरूप राष्ट्रपति के सर को हाथ लगा दिया.
एक निश्चित व कड़े प्रोटोकाल के अनुसार आयोजित होने वाले इस समारोह में थिमक्का से 33 साल छोटे राष्ट्रपति ने पुरस्कार देते वक्त उनसे चेहरा कैमरे की तरफ करने को कहा तो उन्होंने राष्ट्रपति का माथा छू लिया और आशीर्वाद दिया. थीमक्का के प्रेम से भरे इस कार्य से प्रधानमंत्री समेत अन्य मेहमानों के चेहरे पर मुस्कान आ गई. साथ ही राष्ट्रपति भवन उत्साहपूर्वक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.
मनमोहक स्वभाव की थिमक्का से जब उन्हें पद्मश्री पुरस्कार के विषय में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा खुद को पद्म पुरस्कार के लिए चुने जाने पर वो बहुत खुश हैं. हालांकि राज्य सरकार द्वारा उनके योगदान को महत्व नहीं दिए जाने से वो निराश भी हैं. मगर कर्नाटक सरकार उन्हें कई बार विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित कर चुकी है. उनके नाम पर पर्यावरण से जुड़ी योजना का नाम भी रखा जा चुका है. लेकिन दुःख इस बात का है कि थिमक्का को सरकार की तरफ से वृद्धावस्था पेंशन के रूप में महज 500 रुपए हर महीने दिए जाते हैं. खबर है कि पूर्व की सरकार ने उन्हें दो करोड़ रुपए नकद और जिंदगी गुजारने के लिए जमीन देने का आश्वासन भी दिया था लेकिन अभी तक सरकार की तरफ से ऐसा कुछ भी नहीं किया गया है.
थीमक्का की कहानी धैर्य और दृढ़ संकल्प की कहानी है. यह मनुष्य को जीने व आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करती है. थिमक्का जब 40 वर्ष की थीं तो संतान न होने की वजह से खुदकुशी करने की सोच रही थीं, लेकिन अपने पति के सहयोग से उन्होंने पौधा रोपण में जीवन का संतोष तलाश लिया. थिमक्का ने अब तक बरगद के 400 पेड़ सहित 8000 से अधिक पेड़ लगाएं हैं. साल 2016 में बीबीसी उन्हें दुनिया की प्रभावशाली और प्रेरणादायक महिलाओं में शुमार किया था. थिमक्का को उनके प्रकृति प्रेम व वृक्षारोपण के लिए ‘वृक्ष माता’ के नाम से भी जाना जाता है.
