केंद्रीय गृह सचिव राजीव गौबा ने कहा कि केंद्र सरकार ने गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम 1967 के तहत जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट को गैरकानूनी संगठन घोषित किया.
यह कदम सरकार के द्वारा आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत उठाया गया. गृह सचिव ने आगे कहा कि यासीन मलिक के नेतृत्व वाले जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने घाटी में अलगाववादी विचारधारा को हवा दी और यह 1988 से हिंसा और अलगाववादी गतिविधियों में सबसे आगे रहा है. श्री गौबा ने कहा कि जम्मू और कश्मीर पुलिस के द्वारा जेकेएलएफ के खिलाफ 37 एफआईआर दर्ज की गई हैं. सीबीआई ने भी दो केस दर्ज किए जिसमें से एक आईएएफ जवान की हत्या का मामला भी शामिल है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने भी एक केस दर्ज किया है, इन सभी की जांच जारी है.
ज्ञात हो कि पिछले एक महीने में संगठन बैन करने की यह दूसरी बड़ी कार्रवाई है. गत महीने आतंकी गतिविधियों में शामिल जमात-ए-इस्लामी को भी प्रतिबंधित किया गया था. कश्मीर घाटी में पुलवामा हमले के बाद से ही सभी संदिग्ध गतिविधियों पर सुरक्षा एजेंसियों ने नजर परखी है. इस सिलसिले में ही हाल ही में राज्य के करीब 600 शिक्षकों को ‘प्रतिकूल सूची’ में रख दिया गया था. इन सभी के परिजनों का संदिग्ध तौर पर किसी आतंकी संगठन से संबंध होने की बात कही गई थी.
सनद रहे पुलवामा में गत 14 फरवरी को हुए आतंकवादी हमले के बाद अलगावादी नेताओं के खिलाफ भारत सरकार ने अपने तेवर कड़े कर लिए थे. इसी सिलसिले में सरकार ने अलगाववादी नेताओं को दी गई सुरक्षा वापस ले ली थी. गत दिनों हुर्रियत नेता सैय्यद अली शाह गिलानी के घर पर छापेमारी भी सरकार की कार्रवाई का ही एक हिस्सा है.
हुर्रियत नेताओं को पाकिस्तान समर्थक कहा जाता है. इन पर आरोप है कि ये घाटी में अलगाववादी भावनाओं को भड़काने के साथ-साथ सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंकने के लिए युवाओं को पैसे देते हैं. सुरक्षा एजेंसियों ने घाटी में कार्रवाई करते हुए कुछ समय पहले मीर वाइज उमर फारूक के घर से हॉट लाइन बरामद की थी. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मीर वाइज इस हॉट लाइन का इस्तेमाल पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं से बातचीत करने के लिए करता था.
घाटी में इस बड़ी कार्रवाई से एक बात स्पष्ट हो चुकी है कि सरकार किसी भी कीमत पर आतंकी व आतंकी संगठनों या उनसे हमदर्दी रखने वालों के साथ कोई भी नरमी नहीं बरतना चाहती. ये अलगाववादी संगठन ही हैं जो कश्मीरी के युवाओं को इकट्ठा कर सेना पर पत्थरबाजी करने के लिए उकसाते हैं. ये अलगाववादी नेता हमेशा से ही पाकिस्तान की भाषा बोलने के लिए जाने जाते रहे हैं.
लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा इनकी सुरक्षा व्यवस्था व इनकी सुख सुविधाओं के लिए सरकारी गाड़ी देना तथा इस सरकार से पहले कोई भी बड़ी कार्रवाई न करना सरकार के इनसे संबंधो पर भी सवालिया निशान खड़ा करता है. यह बात जग जाहिर थी कि ये अलगाववादी नेता घाटी में पाकिस्तान की विचारधारा को बढ़ाने का काम करते हैं. लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार से पूर्व किसी भी सरकार ने इन अलगाववादी नेताओं के खिलाफ बैन जैसा कोई भी कदम नहीं उठाया है.
हालांकि मुमकिन है कि यासीन मलिक के संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) पर बैन के बाद पूरा विपक्ष आंदोलन करना शुरू कर दे. इससे पूर्व जम्मू में जमात-ए-इस्लामी संगठन पर भी बैन लगाया गया था, जिसका जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने सड़कों में उतरकर आंदोलन किया था और आज फिर महबूबा ने ट्वीट कर कहा कि यासीन मलिक ने जम्मू-कश्मीर का मुद्दा सुलझाने के लिए काफी पहले हिंसा छोड़ दी है. उनके संगठन को बैन करने से क्या हासिल होगा.
इस तरह के फैसलों से कश्मीर सिर्फ एक खुली जेल में तब्दील हो जाएगा जबकि महबूबा को भी पता है कि कश्मीर की वर्तमान स्थिति के लिए ये संगठन ही पूर्ण रूप से जिम्मेदार हैं. लेकिन राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए इन्हें आतंकी व उनके संगठन भी प्रिय लगने लगते हैं.
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