टीवी समाचारों के उन्माद से आहत एक एंकर भयंकर बार बार आह्वान करते हैं कि टीवी मत देखिए. यह उनलोगों के लिए यह प्रयोज्य नहीं है जो पहले ही टीवी देखना छोड़ चुके हैं. समझा जाता है कि इनमे से कई लोगों ने तो इस एंकर भयंकर से दुखी होकर ही टीवी देखना बंद किया. ये उन्माद से दुखी हैं, वे रुदाली क्रंदन के अवसाद से खिन्न थे. आशंका होती है कि आम टीवी दर्शक इस आह्वान पर गंभीर होकर टीवी के साथ पाकिस्तान क्रिकेट टीम के फैन्स जैसा व्यवहार (भारत से हारने के बाद) न करने लगें. इसलिए इस आह्वान की गहन और वस्तुनिष्ठ पड़ताल करने की जरुरत है.
सबसे पहले तो एंकर भयंकर महोदय से यह स्पष्टीकरण लेने की आवश्यकता है कि उनका आह्वान सिर्फ टीवी समाचारों तक ही सीमित है या टीवी के अन्य कार्यक्रम भी इस दायरे में आते हैं. यदि समाचारों को छोड़कर टीवी के अन्य कार्यक्रम इस दायरे में नहीं आते तो सास-बहु सीरियल्स से रिश्तों में नये पारिवारिक पेंच जोड़ने को श्रीमान का एनओसी समझा जाए. रियाल्टी शो के नाम पर बीमा, बैंकों व भौतिक उत्पादों से भी शानदार तरीके से सपने बेचने को जायज माना जाए, बनावटी भाव भंगिमाओं से जीवन को ही वर्चुअल बना देने की कोशिश का स्वागत किया जाए. टैलेन्ट हंट शो के नाम पर बच्चों को बचपन से मुक्त करके उन्हे समय से पहले वयस्क बनाने वालों को पुरस्कृत किया जाए. बिग बॉस के घर को सदाचार की पाठशाला घोषित कर दिया जाए. जाँबाज बनाते या खोजते टीवी शो को वीरता पुरस्कार दिया जाए. फैशन के नाम पर फूहड़ता फैलाते व नग्नता परोसने वाले कार्यक्रमों को आधुनिकता का वाहक करार दिया जाए.
यदि एंकर भयंकर महोदय सिर्फ टीवी समाचार न देखने की बात कर रहे हैं तो यह उत्सुकता जगती है कि क्या लोग उनका कार्यक्रम या उनका चैनल भी देखना छोड़ दें. यदि हाँ, तो यह उसी डाल को काटने जैसा आत्मघाती है, जिस डाल पर व्यक्ति बैठा है. इस स्थिति का संज्ञान उनका चैनल भी लेगा, आखिरकार चैनल भी एक व्यवसायिक इकाई है और ये तो बड़े ताले का इंतजाम करते प्रतीत होते हैं. इनका कर्तव्य तो यह था कि यह अपने चैनल के घटते दर्शकों की संख्या बढ़ाने पर कोई सकारात्मक पहल करते. उन्मादी चैनल यदि युद्ध का डंका बजा रहे हैं तो ये अपनी शांति की शहनाई से दर्शकों को अपनी ओर खींचकर अपना और अपने चैनल का भला करते. अपने कार्यक्रम के प्रारम्भ में ही अपना निर्णय देते हुए किए जाने वाले मोनोलॉग को और लंबा करते ताकि दर्शक भी रीझें और पैनल में आए अतिथियों को एक कप अतिरिक्त कॉफी भी मिल जाए.
ऐसा नहीं है कि ‘टीवी मत देखिए’ का आह्वान हाल के भारत-पाक तनाव के कारण ही आया है. पृष्ठभूमि में गोदी मीडिया का जुमला भी हावी रहा है. गोदी मीडिया के समानान्तर यह बताने की जरुरत उन्हे नहीं लगती कि मीडिया किस काल में ऐसा था कि वह किसी के कंधे नहीं चढ़ा या किसी के सिर पर. मीडिया सत्ता के सरोकारों से मुक्त हो, यह आदर्श स्थिति है. लेकिन 70 साल की लोकतांत्रिक यात्रा में कितने आदर्श शेष हैं, यह उंगली पर गिना जा सकता है. विकास की तरह क्षरण भी एक क्रमिक प्रक्रिया है, यह मानने से गुरेज तो एंकर भयंकर भी नहीं करेंगे.
सामान्य जन तक टीवी की जब पहुँच हुई, तब भारत के प्रधानमंत्री मिस्टर क्लीन थे. तब किसी बुद्धिजीवी ने इसे बुद्धू बक्सा का नाम दे दिया. उस समय सिर्फ दूरदर्शन था पर कहते हैं कि नेता को टीवी पर देख देखकर उकता जाने की स्वस्थ परम्परा तभी शुरु हुई थी. पीवीएनआर का समय आते आते स्थिति ऐसी हो गयी कि चार साल का मेरा नटखट भतीजा घर में जब अधिक उधम मचाता था तो लोग उसे पीवीएनआर बनने को कह देते और वह अपनी नाक कृत्रिम रुप से फुलाकर स्टैच्यू बन जाता था. चैनलों की संख्या बढ़ी और वे आठ पहरिया हो गए तो नेताजी के अधिक दिख सकने का स्कोप बढ़ा. अटल जी से लेकर मम सिंह तक यह कमोबेश जारी ही रहा. अभी ऐसी कौन सी नयी कयामत आ गयी है?
बाद की बात छोड़िए, तब आम लोगों तक टीवी की पहुँच ही नहीं थी. जेपी आन्दोलन के समय सारे नियम ताक पर रखकर टीवी पर फिल्म ‘बॉबी’ सिर्फ इसलिए दिखायी गयी थी कि दिल्ली के लोग घर में फिल्म देखें और रामलीला मैदान की रैली में न जाएं. आज के निजी चैनल व्यवसायिक उपक्रम हैं और अपनी टीआरपी के लिए कुछ भी कर गुजरने लगे. सुविधाजनक राहें गयीं जो स्थायी नहीं हैं. एंकर भयंकर महोदय और उनके चैनल ने भी एक राह पकड़ ली. इन्होने अपनी राह को भी उत्तम बताया होता तो बात बनती पर ये तो दोनों राहें बंद कराने की नकारात्मकता पर उतर आए हैं.
आज कुछ चैनल देशभक्ति परोसने का दावा कर रहे हैं, कुछ लोगों को उसमे युद्धोन्माद दिख रहा हैं. दूसरी ओर एक आधा चैनल अमन के कबूतर उड़ा रहे हैं, अनेक लोगों को इस शांति प्रेम में देशद्रोह की बू आती है. एंकर भयंकर महोदय सिर्फ पहला मामला देख रहे हैं. जनमानस दोनों में से किस तरफ खड़ा है, यह चैनलों को मिलती टीआरपी के आंकड़े देखकर समझा जा सकता है. लिहाजा, एंकर भयंकर का आह्वान थोड़ा बहुत ‘अंगूर खट्टे हैं’ जैसा ही है. और फिर भी ये चैनलों के उन्माद से अवसाद में हैं तो अन्य चैनलों के अपने भाई-बंधुओं को ही मना लें. कृपया हमें मुफ्त के मनोंरंजन से वंचित न करें, एंटरटेनमेन्ट चैनल इतने एंटरटेनिंग नहीं है.
