आज़ादी के 72 साल बाद मिला देश के लिए जान न्योछावर करने वाले सैनिको को सम्मान

घर जाकर बताना कि उनके सुनहरे कल के लिए हमने आज अपना बलिदान दे दिया – यह संदेश है देश के लिए जान न्यौछावर करने वाले सैनिकों का जिनकी याद में कल नेशनल वॉर मेमोरियल का द्वारा उद्घाटन देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने किया.

यह मेमोरियल भारत के लिए शहीद हुए सैनिकों के शौर्य और यश गाथा युगों युगों तक सुनाता रहेगा. शहीदों के सम्मान का प्रतीक नेशनल वॉर मेमोरियल वीर योद्धाओं को भारत के कण कण की ओर से श्रद्धांजलि है. शहीदों द्वारा दिए गए बलिदान का कर्ज कोई भी भारतीय कभी चुका नहीं सकता किन्तु यह एक प्रयास है, उनके सम्मान का. सनद रहे, भारत विश्व के बड़े देशों में अकेला ऐसा देश था जिसके पास वार मेमोरियल नहीं था.

यह स्मारक उन समस्त शहीदों को श्रद्धांजलि देता है, जिन्होंने आज़ादी के पश्चात हुए युद्ध (अनेकों ऑपरेशन सहित) में अपने प्राण न्यौछावर किए. इनमें 1947-48 भारत पाकिस्तान युद्ध, 1961 गोवा की स्वतंत्रता (ऑपरेशन विजय), 1962 भारत-चीन युद्ध, 1965 व 1971 भारत पाकिस्तान युद्ध, 1987 सियाचिन, 1987-88 श्रीलंका (भारतीय शांति सेना), 1999 कारगिल एवं अन्य ऑपरेशन्स में शहीद हुए 25,942 शहीदों के नाम इस मेमोरियल की प्रत्येक ईंट में अंकित किया गया है.

इस मेमोरियल के उद्घाटन समारोह में पत्थर से बने स्तंभ के नीचे ज्योति प्रज्ज्वलित कर प्रधानमंत्री ने शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पित किया. चालीस एकड़ में फैले इस वार मेमोरियल की लागत 175 करोड़ रुपए है. इस भव्य नेशनल वॉर मेमोरियल को षटभुज आकार में निर्मित किया गया है. इस मेमोरियल के केंद्र में 15 मीटर ऊंचा स्मारक स्तंभ बनाया गया है. इस पर भित्ति चित्र, ग्राफिक पैनल, शहीदों के नाम और 21 परमवीर चक्र विजेताओं की मूर्ति बनाई गई है. स्मारक चार चक्रों पर केंद्रित है – अमर चक्र, वीरता चक्र, त्याग चक्र, रक्षक चक्र. इसमें तीनों सेनाओं थल सेना, वायुसेना और नौसेना के शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी गई है.

इस अभूतपूर्व नेशनल वॉर मेमोरियल को इस प्रकार तैयार करने का प्रयास किया गया है कि राजपथ व इसकी भव्य संरचना के साथ कोई भी छेड़छाड़ न हो. आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि भारत में अंग्रेजी सत्ता होने के बाद भी प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए 84000 भारतीय जवानों की याद में इंडिया गेट बनया गया था. उसके बाद 1971 के युद्ध में शहीद हुए 3843 सैनिकों को श्रद्धांजलि देने हेतु अमर जवान ज्योति का निर्माण किया गया था, लेकिन वॉर मेमोरियल का निर्माण नहीं किया जा सका था.

यूँ तो वॉर मेमोरियल के न बनने के कई कारण दिए जा सकते हैं किंतु सत्य तो यह है कि 1960 में नेशनल वार मेमोरियल बनाने का प्रस्ताव सशस्त्र बल के द्वारा दिए जाने के बाद सरकारों की लगातार उदासीनता व सार्थक सोच के आभाव  ने इसका निर्माण नहीं होने दिया. एक अन्य कारण नौकरशाह और सेना के बीच गतिरोध को भी माना जाता है. नौकरशाहों ने मेमोरियल के लिए दिल्ली से बाहर स्थान चुना गया था जिसका भारतीय सेना ने विरोध किया था.

लेकिन केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद शहीदों के सम्मान हेतु स्मारक बनाए जाने के इस विषय को 2015 में मंजूरी दी गयी और अब आज इसका उद्घाटन कर दिया गया है. इस देश में हर विषय पर राजनीति होती है. अब इस विषय पर भी राजनीति होगी. विपक्ष यह प्रश्न उठा सकता है कि चुनाव के पूर्व ही इसका उद्घाटन करने की आवश्यकता क्यों हुई. हालांकि राजनीति में सबकुछ जायज़ है, किन्तु शहीदों के सम्मान पर राजनीति करना राष्ट्र कभी भी स्वीकार नहीं करेगा.