वर्ष 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट को एक दशक बीत चुका है. इस दौरान भारतीय बैंकिंग व्यवस्था अपने सबसे अधिक उथल-पुथल वाले दौर से गुजरी है. नॉन परफार्मिंग एसेट (N.P.A) जैसा शब्द इस सेक्टर विशेष के शब्दकोश से निकलकर आम जनमानस के बीच प्रचलित हो चुका है. इसी के साथ पॉलिसी पैरालिसिस, ‘फ़ोन’ बैंकिंग, भ्रष्टाचार, घाटे के प्रोजेक्ट्स, डूबते ऋणों, वैश्विक मंदी और भागते हुए आर्थिक अपराधियों के कारण भारतीय बैंक चरमराते हुए नज़र आये. इन्हीं सब नकारात्मकता के बीच ढांचागत सुधार की प्रक्रिया नए तरीके से 2014 के बाद से शुरू हुई और बीते सप्ताह तीन अच्छी खबरें सामने आई.
1- नीरव मोदी घोटाले को पीछे छोड़ते हुए पंजाब नेशनल बैंक (P.N.B) इस तिमाही के नतीजों में 16,000 करोड़ के N.P.A की रिकवरी दिखाते हुए 230 करोड़ का मुनाफा घोषित किया है.
2- ग्यारह में से तीन राष्ट्रीयकृत बैंकों (बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ महाराष्ट्र और ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स) को केंद्रीय रिज़र्व बैंक ने नेट N.P.A 6% से नीचे लाने के कारण प्राँप्ट करेक्टिव एक्शन (P.C.A) फ्रेमवर्क से बाहर कर दिया है. अब ये बैंकों नई शाखाएं खोलने के साथ नए कर्ज़ पर लगे आंशिक प्रतिबंध से बाहर आ चुके हैं.
3- ICICI बैंक की पूर्व CEO चंदा कोचर पर हुई कार्यवाही बैंकिंग क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के प्रति सरकार के सख्त रवैये की एक बानगी है. इस कड़ी में तकरीबन 10-12 बैंकों के ताकतवर डायरेक्टर्स और सीईओ विभिन्न स्तर पर जाँच का सामना कर रहे हैं.
भगौड़े आर्थिक अपराधी विजय माल्या के प्रत्यर्पण की प्रक्रिया के बीच सरकार द्वारा करीब तीन लाख करोड़ के N.P.A का सफलतापूर्वक निष्पादन सुर्खियां नहीं बना पाया. इसके मूल में है इंसोल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड – I.B.C, जो नरेंद्र मोदी सरकार के सबसे बड़े आर्थिक सुधारों में से एक है. वर्ष 2008-14 के बीच भारत की छद्म विकास दर के पीछे राष्ट्रीयकृत बैंकों द्वारा ऋण की बंदरबांट को माना जा सकता है. 2014 तक बैंकों का बकाया ऋण 18 लाख करोड़ से बदलकर 54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था. इसके मद्देनजर अर्थव्यवस्था को संकट से उबारने के लिए IBC समय की मांग बन था.
राजनैतिक हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार, अति उत्साह और कर्ज की आसान उपलब्धता ने निजी क्षेत्र को मुनाफे के बजाय विस्तार पर ध्यान केंद्रित करने पर लगा दिया. कांग्रेस सरकार भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण संबंधी मंजूरी और भ्रष्टाचार के कारण रद्द होते लाइसेंस से नीतिगत शिथिलता का शिकार हो गयी. परियोजनाएं या तो ठप्प पड़ गयी या क्षमता से कम पर काम करने लगी. फलस्वरूप ऋण अदायगी की असमर्थता एक बड़े NPA क्राइसिस के रूप में बदल गयी. NDA सरकार ने रिज़र्व बैंक के साथ मिलकर 2015 में बैंकों का एसेट क्वालिटी रिव्यू (A.Q.R) किया और जो N.P.A 2013-14 में ढ़ाई लाख करोड़ के आंके गए थे, उसकी वास्तविकता में 9-10 लाख करोड़ रुपयों के बीच निकली. इस विकराल समस्या को सुलझाने के लिए 2016 में IBC को लाया गया.
कानूनों के मकड़जाल होने के कारण भारत में इस तरह के डूबे हुए ऋणों के समाधान का रिकॉर्ड विश्व की बड़ी अर्थ व्यवस्थाओं में सबसे खराब रहा है. विश्व बैंक ने वर्ष 2015 तक भारत, चीन, ब्राज़ील, रूस, जापान, US, और UK की तुलना औसत रिकवरी और समय के बारे में एक तुलनात्मक रिपोर्ट दी थी. इसमें दिखाया गया कि NPA के अंदर भारत की औसत ऋण अदायगी बहुत कम थी, और प्राप्ति में समय बहुत अधिक लगता था. इस रिपोर्ट में भारत के बाद सिर्फ ब्राज़ील एक ऐसा देश था जिसने भारत से भी खराब प्रदर्शन किया था. रिपोर्ट के अनुसार भारत एक डॉलर पर औसतन करीब 26 सेंट की रिकवरी कर रहा था, उस रिकवरी में भारत को औसतन करीब साढ़े चार साल लग जाते थे. यह बताने के लिए काफी था कि देश में NPA की स्थिति आखिर क्या थी.
I.B.C एक एकीकृत कोड है जो कानूनों को एक स्पष्ट ढाँचा प्रदान करता है. इसके तहत दिवालियापन के सभी मामले समयबद्ध 180 दिन (+90 दिन) में निपटाये जाने का प्रावधान है. इससे नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (N.C.L.T) में एक अलग खण्ड पीठ का निर्माण हुआ जहां कोई भी हितधारक (स्टेकहोल्डर) डिफॉल्ट होने की सूरत में अपील कर सकता है. अपील की प्रक्रिया शुरू होने पर कम्पनी का नियंत्रण एक कमिटी को चला जाता हैं. कमिटी 180 दिन में मूल्यांकन कर ऋण के अदायगी की योजना अथवा परिसंपत्तियों या कंपनी के विक्रय की प्रक्रिया शुरू करने पर निर्णय देगी.
N.C.L.T में बीती तिमाही (Q3) तक कुल 1,483 मामले दाखिल किए गए, जिसमें से 65 मामलों का 52% की औसत कर्ज़ अदायगी के साथ पूर्णतया समाधान हो चुका है. करीब 300 मामलों में लिक्विडेशन की प्रक्रिया की शुरुआत हो चुकी है. देश के 25% बड़े N.P.A जिन्हें ‘डर्टी डज़न’ के नाम से जाना जाता है; इसमें एस्सार स्टील, लेनको इंफ्रास्ट्रक्चर और भूषण स्टील जैसे बड़े नाम शामिल हैं. इसमें से 5 मामलों को औसत 317 दिनों में निपटा दिया गया है और शेष 7 को मार्च 2019 तक समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया है.
सरकार कानून में कमियां दूर करने के लिए समय-समय पर संशोधन ला रही है. 180+90 दिन की समय सीमा का अनुपालन एक बड़ी चुनौती है. IBC सुप्रीम कोर्ट में ऑपरेशनल क्रेडिटर द्वारा दायर याचिका से पार पा चुका है. सरकार से ऋणदाता ,कर्मचारियों के बाद उनके हितो की रक्षा की भी अपेक्षा बनी हुई है.
शक्तिशाली रुइया परिवार के स्वामित्व वाले एस्सार ग्रुप द्वारा बैंकों के बकाया 53,000 करोड़ लौटाने का प्रस्ताव हो या अनिल अंबानी द्वारा रिलायंस कम्युनिकेशन के लिए बैंकरप्सी दायर करना कानून की व्यापकता और असर को दर्शाता है. सुप्रीम कोर्ट ने एक टिप्पणी में इसे ‘Defaulter Paradise is Lost’ कहकर सराहना की है. IBC के कारण भारत ‘ईज आफ डूइंग बिजनेस’ की प्रतिस्पर्धा में ऊंची छलांग मार कर अब 103 से 70 वे स्थान पर पहुँच चुका है. I.B.C भारत में स्वच्छ और पेशेवर बैंकिंग एवं व्यवसाय के लिए पहला कदम है. आने वाले समय में सरकार वित्तीय संस्थानों के लिए FRDI बिल लाकर ढांचागत सुधार की प्रक्रिया को जारी रखेगी. उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसे सुधार भारत को विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ खड़ा होने में मदद करेंगे और देश के वित्तीय संस्थानों में अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप कॉर्पोरेट गवर्नेंस की स्थापना होगी.

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