“लोहिया ने नारा दिया था- पिछड़ा पावे सौ में साठ. यह नारा सामंतवादी शक्तियों के हित में हैं. मैं कहता हूँ पिछड़ा पावे सौ में नब्बे.” यह नारा देते हुए जगदेव प्रसाद ने लोहिया के नेतृत्व वाली संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी छोड़ दी और बना ली शोषित समाज दल. इसके साथ ही यह निश्चित हो गया कि कम से कम हिन्दी पट्टी में समाजवादी राजनीति का अर्थ जातिवादी राजनीति से अधिक कुछ नहीं होगा. कहानी कुछ ऐसे शुरू होती है.
1967 का चुनाव कांग्रेस के लिए कई बुरी खबरें लेकर आया. जहाँ लोकसभा में पार्टी बमुश्किल बहुमत प्राप्त कर सकी, वहीं पार्टी कई राज्यों में चुनाव हार गई. बिहार में भी कांग्रेस बहुमत से कुछ पीछे रह गई. सोशलिस्ट पार्टी नम्बर दो पार्टी बनकर उभरी, जनसंघ तीसरी और भाकपा चौथी पार्टी बनकर सामने आई. ऐसे में गैर-कांग्रेसी दलों का सतरंगी गठजोड़ बना और मुख्यमंत्री पद के लिए सहमति बनी 13 सीटों वाले जनक्रांति दल के नेता महामाया प्रसाद पर. जाहिर है कि 68 सीटों वाले सोशलिस्ट पार्टी की जगह 13 सीटों वाले जनक्रांति दल को मुख्यमंत्री पद मिलना सोशलिस्ट पार्टी के लोगों को रास नहीं आया. लेकिन इन सबमें सबसे अधिक निराश और बेचैन थे जगदेव प्रसाद. जगदेव को मंत्री पद भी नही मिला था.
कांग्रेस तब तक नेहरू-शास्त्री युग को छोड़कर इंदिरा युग मे प्रवेश कर चुकी थी और बची खुची नैतिकता को भी पार्टी ने त्याग ही दिया था. बिहार और उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्यों को पार्टी अधिक समय तक गैरकांग्रेसी दलों के हाथ मे नही छोड़ना चाहती थी और इसके लिए जरूरी हथकंडे आजमाये जा रहे थे. बिहार में शीघ्र ही मौका भी बन ही गया. बीपी मण्डल (मण्डल कमीशन वाले) महामाया प्रसाद की सरकार में सोशलिस्ट पार्टी के कोटे से स्वास्थ्य मंत्री बनाये गए थे. लेकिन वे सांसद थे, विधानसभा या विधानपरिषद के सदस्य नही थे. सोशलिस्ट पार्टी का नियम था कि विधानपरिषद के सदस्य (एमएलसी), पार्टी के पदाधिकारी और सांसद मंत्री न बन सकेंगे. इसी आधार पर लोहिया ने मंडल के मंत्री बनने पर नाराजगी जताई और उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा.
मंडल के मंत्रिपद से त्यागपत्र को सोशलिस्ट पार्टी के एक धड़े ने बिल्कुल जातिगत भाव से लिया. पार्टी के अंदर का त्रिवेणी संघ (कोइरी, कुर्मी, यादव) सक्रिय हो गया. मंडल और उनके पिता कांग्रेस में रह चुके थे. कांग्रेस ने मण्डल को अपने जाल में फाँसा. सोशलिस्ट पार्टी टूट गई और नई पार्टी बनी शोषित समाज दल. जगदेव प्रसाद इस पार्टी के अध्यक्ष बने और पहले सतीश प्रसाद सिंह और फिर बिंदेश्वरी प्रसाद मण्डल बिहार के मुख्यमंत्री बने. कुल मिलाकर इस सरकार की आयु एक माह से कुछ अधिक रही लेकिन इससे बिहार की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई.
शोषित समाज दल का प्रयोग बुरी तरह असफल रहा. लेकिन जिस आधार पर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी टूटी, उसने बिहार की राजनीति को विषाक्त कर दिया. बिंदेश्वरी मण्डल व सतीश प्रसाद सिंह जैसे बड़े नेता तो शोषित समाज दल से अलग हो गए लेकिन जगदेव इसी प्रयोग के साथ बने रहे. अब तक लगभग गुमनाम रहे जगदेव ने राज्यव्यापी दौरे आरम्भ किये. उनकी भाषा और भंगिमा पूरी तरह बदल गई. आलोचनाओं का लक्ष्य अब कांग्रेस नही, बल्कि सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी और सबसे अधिक जनसंघ था. सभी गैरकांग्रेसी दलों को उन्होंने सवर्णवादी घोषित कर दिया. कहा जाने लगा कि जगदेव कांग्रेस के इशारे पर ही राजनीति को विषाक्त करने पर लगे थे.
जगदेव प्रसाद के आक्रामक तरीके और ‘पिछड़ा पावे सौ में नब्बे’ ने कम्युनिस्ट पार्टी व सोशलिस्ट पार्टी को भी अपनी भाषा बदलने को मजबूर कर दिया. जहाँ सोशलिस्ट व कम्युनिस्ट पार्टीयों से सवर्ण नेता हाशिये पर चले गए, वहीं कांग्रेस के अंदर से ओबीसी नेता हाशिये पर चले गए.
जातिवादी राजनीति की उर्वर जमीन तैयार हुई. अब तक जो राजनीति विचारधारा की लड़ाई थी अब वह जाति की लड़ाई बन गई. लेकिन इन सब के बाद भी 1972 के विधानसभा चुनाव में जगदेव की शोषित समाज दल को कोई विशेष सफलता नहीं मिली.
सरकार तो कांग्रेस की बन गई लेकिन पिछड़ा वर्ग जहाँ सोशलिस्ट पार्टी के साथ बना रहा. जगदेव खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगे. एक हारे हुए जुआरी की तरह जगदेव प्रसाद ने और अधिक आक्रामक रुख अख्तियार किया. बिहार में नक्सल आंदोलन जोर पकड़ने लगा था. जगदेव ने नक्सल आंदोलन को एक तरह से समर्थन दे दिया. इसके बाद मगध क्षेत्र में नक्सलियों और किसानों के बीच पहली बार संघर्ष हुआ. यह साल 1973 का था. जगदेव अब ‘बिहार के लेनिन’ कहलाने लगे. इस घटना ने कांग्रेस और खास कर मगध के कांग्रेसी नेता रामाश्रय प्रसाद सिंह को सतर्क कर दिया जो कुर्था से ही जगदेव को हराकर विधानसभा पहुँचे थे.
बिहार और गुजरात मे छात्र आंदोलन जोर पकड़ने लगा था. यह आपातकाल के पहले का समय था. जेपी नेपथ्य से सामने आ चुके थे. जगदेव प्रसाद को जिस आदमी से सबसे अधिक चिढ़ थी वे जेपी ही थे. यहाँ तक कि जगदेव ने खुलेआम कहा कि ‘मैं भड़वा बन सकता हूँ लेकिन जेपी के साथ नही जाऊँगा’. लेकिन कहा जाता है कि तबतक सत्ताधारी दल का एक गुट इन्हें कहीं और पहुंचाने का निर्णय कर चुका था. जगदेव जेपी आंदोलन से तो दूर रहे लेकिन वे अपने स्तर पर आंदोलनों में लगे थे. 5 सितंबर 1974 का दिन था. कुर्था में जगदेव एक ‘सत्याग्रह’ का नेतृत्व कर रहे थे. पुलिस से झड़प हुई और सत्याग्रही हिंसक होने लगे. पुलिस की तरफ से दो गोली चली. एक लक्ष्मण चौधरी नाम के कार्यकर्ता को लगी और दूसरी जगदेव के गर्दन में धंस गई. मौके पर ही जगदेव की मृत्यु हो गई.
राजनीति में जगदेव असफल ही रहे. लेकिन उनका असर उनके जाने के बाद बना. आपातकाल के बाद भले ही समाजवादियों को जेपी के कृपा से ही सत्ता मिली लेकिन उनका मॉडल जेपी के घोर विरोधी जगदेव प्रसाद वाला ही रहा और बिहार दिन-ब-दिन गर्त में जाता रहा. जगदेव से मिली सीख का सबसे शानदार उपयोग लालू ने किया. सत्ता मिलने के पहले तक लालू समन्वयवादी बने रहे लेकिन सत्ता मिलते ही उनके अंदर का जगदेव जाग गया. फिर बिहार का जो हुआ वह एक अलग कहानी है.
यह भी एक विडंबना ही मानी जाएगी कि जिस रामाश्रय प्रसाद सिंह पर जगदेव की हत्या के षड्यंत्र का आरोप उनके समर्थक लगाते रहे, उन्ही रामाश्रय के पैर छू कर जगदेव के पुत्र नागमणि ने राजनीति में प्रवेश किया. ये अलग बात है कि नागमणि ने बिहार में मौजूद हर दल में गुल खिलाने की कोशिश की और अब तक दर्जन बार से अधिक बार दलबदल कर चुके हैं. यह भी दिलचस्प बात ही मानी जायेगी कि 1992 में मण्डल के दौर में जगदेव का नाम लेकर राजनीति चमकाने वाले लालू और नीतीश के सरकारों में रामाश्रय ताकतवर मंत्री बने.

21 Comments
Ye yadav, kurmi aur koiri log vote wale time to bolte hai Bhura Bal Hatao. Fir jobs hoti nahi to Mumbai jakar Shiv Sena se apni ammijan ke niche kd bhura baal hatwate hai.
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