ओड़िशा की चुनावी स्थिति

2014  के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने तमाम हिंदीभाषी प्रदेशों, गुजरात और महाराष्ट्र में अधिकतर सीटें जीत ली थी. जाहिर है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में इन राज्यों में पिछला प्रदर्शन दुहरा पाना अत्यन्त कठिन रहने वाला है. ऐसे में भाजपा की नजर कुछ नए राज्यों पर है जहाँ से इस नुकसान की भरपाई की जा सके. इसमे पश्चिम बंगाल और ओड़िशा से भाजपा को सबसे अधिक उम्मीदें हैं. पश्चिम बंगाल की राजनीति पर लोपक का आकलन आप पढ़ ही चुके हैं. इस लेख में हम ओड़िशा की राजनीतिक परिस्थियों की चर्चा करेंगे.

बीजू पटनायक ओड़िशा में हमेशा एक नायक के रूप में देखे गए. भारतीय वायुसेना का एक ऐसा पायलट जिसने बेहद विपरीत परिस्थितियों में श्रीनगर एयरपोर्ट पर सेना उतारकर कश्मीर बचाने में बड़ी भूमिका अदा की थी. यही नही इंडोनेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री सुतन सहरीर को डच सेना से बचाकर बीजू ने ओड़िशा को विश्व के मानचित्र पर एक सम्मानजनक जगह दिलाई थी. लेकिन इन सबके बाद भी 1969 में कांग्रेस से त्यागपत्र देने के बाद 2 दशकों तक उन्हें ओड़िशा की राजनीति में जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा. उसके बाद ही वे बोफोर्स में बदनाम हुई कांग्रेस को.1990 में अपने दम पर मुख्यमंत्री बन सके.1995 के चुनाव में उन्हें फिर से हार का सामना करना पड़ा. जबरदस्त लोकप्रियता के बाद भी बीजू पटनायक की राजनीतिक सफलता सीमित रही क्योंकि वे कांग्रेस के संगठन का तोड़ ढूंढ पाने में नाकामयाब रहे थे. 

1997 में बीजू पटनायक का जब देहांत हुआ तब वह जनता दल से लोकसभा सांसद थे. उनके निधन से खाली हुई सीट पर उनके वफादार साथी उनके परिवार से ही किसी को चुनाव लड़ाना चाहते थे. जब बीजू पटनायक के बड़े बेटे प्रेम पटनायक ने राजनीति में जाने से इनकार कर दिया तब उनके छोटे बेटे नवीन को राजनीति में उतारा गया. दून स्कूल और दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़े, नवीन जीवन भर ओड़िशा और राजनीति से दूर रहे थे. नवीन जब पहले चुनाव के लिए ओड़िशा पहुँचे तो उन्हें ओड़िया भाषा नहीं आती थी. बड़ी मशक्कत के बाद नवीन पटनायक को अपने पिता के लोकसभा सीट असिका के उपचुनाव में जनता दल का टिकट मिल सका. नवीन लोकसभा तो पहुंच गए लेकिन जनता दल में उन्हें अपना भविष्य नजर नही आ रहा था. जनता दल वैसे भी पतन के कगार पर खड़ी थी.

भाजपा के संसाधनों और समर्थन से ही जनता दल तोड़कर नवीन ने अपने पिता के नाम पर बीजू जनता दल के नाम से पार्टी बनाई और भाजपा से गठजोड़ करके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा बन गए. 1998 में हुए लोकसभा चुनाव में ओड़िशा के 21 लोकसभा सीटों में बीजू जनता दल को 9 और भाजपा को 7 सीटें मिली. नवीन पटनायक ओड़िशा और राजनीति से पूरी तरह अनजान थे. लेकिन अपने पिता की विरासत और भाजपा की मदद से पहली कोशिश में ही राजनीति में अपनी जगह बनाने में कामयाब रहे. 1999 में आये चक्रवाती तूफान से मची तबाही और कांग्रेस सरकार के निकम्मेपन और भ्रष्टाचार के कारण सन 2000 का विधानसभा चुनाव जीतना नवीन पटनायक के लिए खास कठिन नही था.

एक रिलक्टेंट राजनेता के रूप में शुरुआत करने वाले नवीन पटनायक ने मुख्यमंत्री बनने के साथ ही अपना राजनीतिक रंग दिखाना शुरू किया. सबसे पहले उन्होंने अपनी पार्टी  के ही विजय महापात्र जैसे बड़े नेताओं के पर काटे और बीजू जनता दल पर पूरा नियंत्रण प्राप्त कर लिया. फिर ओड़िशा की अफसरशाही के नट बोल्ट कसे और एक बेहतर शासन व्यवस्था बनाई. पहले दिन से नवीन पटनायक ने अपनी छवि एक साफ सुथरे और विकासशील राजनेता की रही. कांग्रेस के कुशासन से परेशान और देश के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक ओड़िशा में बेहतर बुनियादी ढांचे और विकास की नींव नवीन पटनायक ने ही रखी. सन 2000 का चुनाव जीतना नवीन पटनायक के लिए कठिन नही था. लेकिन उस सफलता को दुहराना जरूर कठिन था. खुद बीजू पटनायक भी 5 साल में ही ओड़िशा के सत्ता से बाहर हो गए थे. ऐसे में नवीन पटनायक ने कांग्रेस के प्रभावी नेताओं को तोड़ना शुरू किया. सन 2000 से लेकर 2004 के बीच मे जिले से लेकर पंचायत तक कांग्रेस के संगठन को नवीन ने छिन्न भिन्न कर दिया. इसी का नतीजा रहा कि कांग्रेस के जिस जानकीवल्लभ पटनायक ने 1995 में बीजू पटनायक को सत्ता से बाहर किया था, उन्हें नवीन पटनायक के हाथों हार का सामना करना पड़ा.

बढ़ती ताकत के साथ जब नवीन को लगा कि ओड़िशा में चुनाव जीतने के लिये भाजपा की जरूरत नही रही तो 2009 के बेहद महत्वपूर्ण चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया. लेकिन इसके बाद भी उनकी विजय यात्रा निर्बाध जारी रही. पिछले 19 वर्षों से लगातार मुख्यमंत्री रहकर नवीन पटनायक ने ओड़िशा ही नही, भारत के राजनीतिक इतिहास में भी अपनी खास जगह बना ली है.

2014 नवीन की राजनीति का हाई प्वाइंट था जब नवीन पटनायक जब ओड़िशा के 147 विधानसभा सीटों में से 117 सीटों पर बीजू जनता दल की जीत हुई जबकि लोकसभा के 21 सीटों में से 20 सीटों पर बीजू जनता दल का कब्जा हो गया. एक तरह से विपक्ष ओड़िशा से पूरी तरह साफ हो गई. लेकिन इसके बाद ओड़िशा में नवीन पटनायक का प्रशासन पर नियन्त्रण कम हुआ है. बीजू जनता दल के कार्यकर्ताओं पर गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं. ज्यादातर मंत्री अलोकप्रिय हैं. बीजू जनता दल के कई बड़े नेता पार्टी से अलग थलग कर दिए गए हैं.

जय पांडा जैसे करिश्माई नेता भाजपा के करीब जाते दिख रहे हैं. नवीन पटनायक की गुड बुक से बाहर होने के बाद जिस तरह से जय पांडा को प्रताड़ित किया गया है, उससे पटनायक की छवि भी खराब हुई है. लोग उन्हें एक ऐसे नेता के तौर पर देखने लगे हैं जो अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के साथ बेहद क्रूरता से पेश आता है. नवीन पटनायक को 20 वर्षों की एन्टी-इनकम्बेंसी का भी सामना करना है.

भाजपा पिछले कुछ वर्षों में ओड़िशा की राजनीति में तेजी से आगे बढ़ रही है. केंद्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने पिछले कुछ सालों में ओड़िशा की राजनीति में तेजी से अपनी जगह बनाई है. इसके कारण बीजू जनता दल का दमन भी बढ़ा है. पिछले पंचायत चुनावों में मिली सफलता ने भाजपा की उम्मीदों को खाद पानी तो दिया ही है. इतना तो तय है कि आसन्न लोकसभा और विधानसभा चुनाव नवीन पटनायक के लिए सबसे कठिन चुनाव होंगे.

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