सजीव संविधान और 70 वर्षों का गणतंत्र

गणतांत्रिक व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ राज्य का प्रमुख वंशानुगत न होकर के राज्य के बीच का ही कोई निर्वाचित सदस्य होता है. भारत में गणतंत्र कोई आज की चीज़ नहीं है. सोलह महाजनपदों में से एक लिच्छवी महाजनपद में भी गणतंत्र अपने समुन्नत रूप में था.

आज़ादी के बाद हमारे भारत देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए और विधि का शासन स्थापित करने के लिए हमने संविधान का निर्माण किया. संविधान वो दस्तावेज है जो भारत के सभी नागरिकों को समुचित न्याय, स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार की गारंटी देता है. वहीं यह अपने नागरिकों को उनके मूल कर्तव्यों का भी भान कराता है.

‘संविधान सभा’ के सभी सदस्य स्वतंत्रता सेनानी थे और उनमें देश को आगे बढ़ाने का एक शानदार विज़न था. इसलिए उन्होंने संविधान को एक सजीव और दूरदर्शी दस्तावेज़ के रूप मे तैयार किया ताकि परिस्थितियों के अनुसार इसमें आवश्यक बदलाव भी किए जा सकें. इंदिरा गांधी के द्वारा देश पर जबरिया आपातकाल थोंपने के बाद जनता पार्टी की सरकार के द्वारा संसद के पटल पर 44वां संविधान संशोधन रखा गया जिसने राष्ट्रपति की आपातकालीन उपबंध लागू करने के लिए जिम्मेदार कारकों को संविधानवाद के मुताबिक सीमित किया. इसके अतिरिक्त संपत्ति के अधिकारों को मौलिक अधिकारों की सूची से बाहर कर दिया.

हमारे देश मे एक बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था है. इसलिए अक्सर देखा जाता है कि कोई भी नेता किसी भी दल से चुनाव जीतकर विधायिका पहुँचने के बाद सत्ताकांक्षी और बहुमत सिद्ध करने के करीबी दल को समर्थन देकर अपनी स्वार्थ सिद्धि करने का प्रयास करता है. इस अवसरवादी व्यवस्था को खत्म करने के लिए संसद ने 52वें संविधान संशोधन विधेयक के द्वारा ‘दल बदल निरोधी कानून’ को दसवीं अनुसूची में जोड़कर ‘हॉर्स ट्रेडिंग प्रक्रिया’ पर लगाम लगाई. अभी हाल ही में विधायिका द्वारा देश मे समुचित समता सुनिश्चित करने के लिए आर्थिक रूप से पिछड़े गरीब सवर्णों को भी 124वें संविधान संशोधन के मार्फ़त आरक्षण की सुविधा प्रदान की गई.

70 वर्षों में हमारा गणतंत्र समय के साथ और भी फला फूला है. समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप इसमें परिवर्तन करने की नम्यता इसे और भी सुन्दर बना देती है.