“गणतंत्र दिवस की सभी को शुभकामनाएँ”, एक छोटा सा मेसेज डाल दिया फेसबुक और ट्विटर पे, लाइक, आरटी और “आपको भी” व “धन्यवाद” के बीच कुछ लोगो को अपना प्रोफाइल फोटो तिरंगे से बदलते देखा तो मन में ख्याल आया, ये भी नया फैशन है जो आजकल प्रचलन में है, ये मेरे जैसे ओल्ड स्कूल के व्यवहार से परे है. PDA के तर्ज पे ही शायद पब्लिक डिस्प्ले ऑफ नैशनलिस्म भी समय की पुकार होगी.
समय के साथ गणतंत्र दिवस मनाने के तरीकों में भी बदलाव आया है, पहले जहां सवेरे परेड और शाम को “गांधी” फ़िल्म देखकर 26 से 27 जनवरी होती थी, आजकल सवेरे सोशल मीडिया पे देशभक्ति का प्रदर्शन करके (जिसमे असंख्य व्हाट्सएप्प फारवर्ड भी है), शाम रिपब्लिक/तिरंगा थीम्ड पार्टी या #SelfiWithTiranga से खत्म हो सकती है, और शॉपिंग पसंद लोगो के लिए भी ये विशेष अवसर होता है “सबसे सस्ते तीन दिन” की आड़ में कंपनियों के गोदाम में फालतू पड़े समान का बोझ हल्का करने का. बचे खुचे लोग इस मौके का लाभ उठाकर आस पास के “वीकेंड डेस्टिनेश” पे कल्टी हो लेते हैं.
मेरे स्कूल में अलग माहौल होता था, इतनी ठंड में भी सुबह 6 बजे पहुचने का फरमान होता था जिसे बिना किसी ना-नुकुर के अमल किया जाता था, इसके साथ तिरंगे में लपेटने के लिए फूल लेके आने की फरमाइश भी थी. (जिसके लिए ‘और सुबह’ उठ के अगल बगल के घरों से फूल चुराना पड़ता था)
आजकल के “लल बबुआ” कॉन्वेंटी बच्चो से अलग हमारे स्कूल वाले हमें समय के थपेड़ों को झेलने के लिए तैयार करने में विश्वास रखते थे, सो ठंड में भी आठवीं तक हाफ पैंट पहनकर जाना पड़ता था, स्वेटर फुल लेकिन पतलून हाफ.
6 बजे स्कूल पहुँचने के लिए पाँच-सवा पाँच बजे घर से निकलना पड़ता था. माघ की ठंड में सवेरे 5 बजे बिल्कुल अंधेरा होता है, ऐसे में भी देशभक्ति पूरे उफान पे रहती थी, रास्ते में ही सफ़ेद टीशर्ट और सफ़ेद हाफ़पैंट पहने अपने से कुछ बड़े बच्चों के छोटे छोटे ग्रूप मिलते थे जो देशभक्ति से ओत-प्रोत गीत गाते हुए सड़क पर घूमते थे. इस प्रक्रिया को ‘प्रभात फेरी’ कहा जाता था. स्कूल पहुचने से पहले ही रास्ते में पड़ने वाले स्कूल/ऑफिस में भी लाउड स्पीकर चीख चीख कर देशभक्ति गीतों के माध्यम से आपको सम्पूर्ण देशभक्ति मोड में ला देते थे.
स्कूल में NCC वाले अपने ड्रेस में परेड को तैयार रहते थे, बच्चे भी राष्ट्रगान गाने के लिए उस दिन ज्यादा जोश में रहते थे. जहां कुछ बच्चे सुभाष चन्द्र बोस या नेहरू के वेश में आते थे, वहीं बच्चो का एक बड़ा झुंड हाथों में तिरंगा लेकर लहराते रहता था, उन बच्चो का अलग ही स्वैग होता था. स्कूल में भी देशभक्ति के गाने बजते रहते थे, जिसमे हमें ये बताया जाता था कि कैसे हमारे देश की धरती सोना उगलती रहती है या कैसे तूफान में फँसे कश्ती रूपी देश को हमारे महापुरषों ने निकाल के हमें दिया है और इसको सम्भाल कर रखने का बहुत बड़ा बोझ हम बच्चों के कंधों पर ही है, और इतने से भी आपके अंदर देशभक्ति न जगी हो तो शहीदों को याद करके आँखों में आँसू लाने का फरमान लता जी दे ही देती थी. कुल मिलाकर देशभक्ति इस ठिठुरते ठंड में भी पूरे उबाल पे होती थी.
इस दिन का सबसे बड़ा आकर्षण झंडोत्तोलन के बाद मिलने वाली मिठाई का था, वो चार लड्डू उस दिन पता नही क्यों कुछ ज्यादा ही स्वादिष्ट लगते थे और नसीब अच्छा रहा तो आपको दूसरा पैकेट मिलने की भी सम्भावना रहती थी.
मिठाई मिलते ही भीड़ घर को दौड़ती थी, उद्देश्य TV पे गणतंत्र दिवस परेड देखना. इंटेरनेट और विकिपीडिया विहीन जीवन मे हर झांकी से अलग अलग राज्यो के बारे में कुछ नया देखने सुनने को मिलता था. परेड में प्रयोग होने वाले अस्त्र शस्त्र अचंभित और आश्वस्त करते थे कि देश की सीमाएं सही मे सुरक्षित है (ये अलग बात थी कि तब भी अधिकतर अस्त्र शस्त्र विदेशों से ही खरीदे होते थे). शाम को भी TV पे गांधी, शहीद और पुकार जैसी फिल्मों से देशभक्ति मोड जारी रहता था.
अब ज़माना बदल गया है, लोगो के सोंच में थोड़ी एडवांसमेंट आ गयी है, लोग तिरेंगे पे भी सवाल उठा रहे है, राष्ट्रगान ना गाने को अभिव्यक्ति की आज़ादी बता रहे है, देश की अखंडता की बात तो छोड़ ही दें, यहां “भारत तेरे टुकड़े होंगे” कहने को भी अपना अधिकार बता रहे हैं. इनको सप्पोर्ट करने वाले सड़कछाप व अदूरदर्शी राजनीतिज्ञ व बुद्धिजीवी भी मिल जाएंगे.
ऐसे में क्या गणतंत्र दिवस की कोई प्रासंगिकता है? या अब देशभक्ति के भी कोई मायने हैं? ये सोच कर मन विचलित हो रहा था…
इन्हीं सब उधेड़बुन के बीच राकेश रंजन जी उर्फ़ प०से० के ये शब्द याद आ गये..
“जब तक राष्ट्रगान सुनकर हमारे रोंगटे खड़े होते रहेंगे
@rranjan501
तक तक हमारा गणतंत्र सुरक्षित और अक्षुण्ण है”
थोड़ी तसल्ली मिली और मन ही मन गुनगुनाते हुए झोरा उठा के चल दिये “सुनो गौर से दुनिया वालो, बुरी नज़र……”
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चित्र साभार : Suresh Rankawat

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शानदार लेख , आज कल जब बच्चों को नेशनलिज्म पे ज्ञान देते हुए सुनता हूं तो आंखो से आंसू आ जाते है, धैर्य की परीक्षा चल रही हो जैसे