Lopak Staff

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दिवाली पर बुद्धिजीवीयो के नाम खुला ख़त

डियर बुद्धिजीवियों, पटाखों से होने वाले प्रदुषण की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिये धन्यवाद। पटाखे तो खैर हमें जलाना ही था। बाकी आपसे पर्यावरण को बहुत उम्मीदें हैं।

जय बाबा री

“जै बाबा री” का उद्घोष अभी रामदेवरा जाने वाले प्रत्येक रास्ते पर पुरज़ोर गूँजता सुनाई दे जाएगा. कभी परमाणु परीक्षण से सुर्ख़ियो में आए देश के पश्चिमी भाग में स्थित

लोकतंत्र में जातिवाद 

आज आपको एक कहानी सुनाता हूँ। बहुत पहले जंगल में लोकतंत्र की स्थापना हुई। उसी जंगल में एक खलीलाबाद नाम का उपवन था। उस उपवन में गधों की आबादीचालीस फीसदी

भक्ति शक्ति युक्ति आगार…

किसी घनघोर मजबूरी में, घटाटोप भुच्च अनहरिया रात में, सुनसान सड़क पर एकदम अकेले, कहीं चले जाय रहे हों,सन्नाटे का साँय साँय कान सुन्न कर रहा हो, झींगुर टिटही अपना

उँची स्कर्ट या नीची सोच

तुम लड़की हो, तुम्हें ऐसे छोटे कपड़े पहनकर बाहर नहीं जाना चाहिए…तुम्हें देर रात तक यूं लकड़ों के साथ बाहर नहीं जाना चाहिए…तुम्हें पार्टी नहीं करनी चाहिए… शराब नहीं पीनी

न्यू ईयर रेजॉल्यूशन

टीवी एंकर्स, अखबारों के स्तंभकार व मूर्धन्य ट्विटकार पूरे साल के घटनाक्रम को हमारे सामने ‘गागर में सागर’ टैप परोसकर कैलेंडर से बेहतर यह बता रहे हैं कि नया साल

टुन्न थे, सुन्न हुए

यह लोकतंत्र की खूबसूरती है कि नयी सरकार बनने के बाद शुरुआती कुछ महीने वह चुनाव में अपनी पार्टी के किए गए वादे पूरे करने में चुस्ती दिखाती दिखती है.