लिबरलों को गो-हत्यारों से इतना प्रेम क्यों है?

स्वतंत्र भारत में ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं जिसे देश को नही बताया गया. इन्हे सरकारों द्वारा छुपाया गया, घटना को पूर्णतः दफन कर दिया गया, विशेषकर यदि वह हिन्दूओं से संबंधित हो. मुलायम सिंह यादव ने 1990 में 40 कारसेवकों की हत्या अयोध्या में करवा दिया और दिल्ली की सड़को पर हजारों सिखों कीहत्या 1984 में कर दी गई. राजनीति में दोनो घटनाओं की चर्चा होती रही है पर 1966 की घटना क्यों देश भूल गया? क्या हुआ था 7 नवंबर 1966 को?

गौ रक्षा हमेशा संवेदनशील विषय रहा है. इस पर प्रतिबंध का कानून बनना चाहिए, इसका कांग्रेस के कुछ हिन्दू नेता भी समर्थन कर रहे थे. लेकिन ऐसा नही हुआ. तब संतो का एक प्रतिनिधिमंडल तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिला. प्रतिनिधि मंडल ने निवेदन किया कि गौ हत्या पर प्रतिबंध लगे तो इंदिरा गांधी ने विचार करने का आश्वासन देकर मामले को खटाई में डाल दिया. गाय के लिए इंदिरा सरकार की बेरुखी देखकर संतो ने’गौ रक्षा अभियान समिति’ बनाई और देश भर में सत्याग्रह शुरू किया. इतिहास में पहली बार सारे हिन्दू संग़ठन एक पटल पर दिखाई दे रहे थे. इस आंदोलन में सनातन धर्मी , आर्य, नामधारीऔर आरएसएस सभी शामिल थे. साथ ही कांग्रेस के कुछ हिन्दू नेता जैसे लाला हरदेव साहेब और गुलजारी लाल नंदा भीशामिल थे. देश भर में आंदोलन चला और लगभग 35 हज़ार लोग जेल गए. आज प्रश्न करने पर मीडिया खतरे में आ जाता है, लोग अपनी टीवी स्क्रीन को काला कर देते हैं. उसी मीडिया/प्रेस ने कवर नही किया इतनी बड़ी खबर को. तब हिंदुस्तान समाचार में कार्यरत रहे वरिष्ठ पत्रकार मनमोहन शर्मा ने बतायाकि PMO से मीडिया हाउस को फोन पर एडवाइजरी जारी की गई कि इन खबरों को प्रमुखता से न छापा जाये और जोPMO से जारी ब्रीफिंग बिना किसी संसोधन के छापा जाए.

गौ रक्षा अभियान समिति ने 7 नवंबर को संसद के सामनेआंदोलन करके मांग करने का फैसला किया कि ‘गौ रक्षा कानून’ संसद में पेश हो. सरकार ने समिति के लोगो से मिल कर येन-केन-प्रकारेण आंदोलन समाप्त करने की कोशिश की. इस आंदोलन में साधु संत आगे थे. सरकार की ख़ुफ़िया ब्यूरो ने रिपोर्ट दी कि साधु-संतो पर गोली चलने की आशंका है. हैरानी की बात है कि इसके बाद भी प्रदर्शनकारियों को संसद केदरवाजे तक आने की अनुमति थी. प्रदर्शनकारियों की संख्या लगभग ढाई लाख थी जिसमे साधु संतो के साथ बच्चे, बूढ़े व महिलाएं भी थे. मंच पर लगभग 100 लोग थे. इस मंच पर देश के सारे राजनीतिक दलों के साथ ही अन्य संग़ठन के लोग नेता मौजूद थे जो चाहते थे कि गौ रक्षा कानून बने. लगभग सबने भाषण दिया जिसकी अगुवाई करपात्री जी महाराज कर रहे थे और साथ दे रहे थे नामदारी गुरु बाबा जगजीत सिंह जी. तभी अचानक गोली चलने लगी और आंसू गैस के गोले दागे जाने लगे. लोग कुछ समझ पाते, तब तक भगदड़ मच गई. लोग संसद परिसर में घुस कर जाने बचाने तथा दीवार कूदकर बचने की कोशिश करने लगे. लोकतंत्र के मंदिर में लाशें बिछी पड़ी थीं. संसद भवन के दरवाजे से लेकर पटेल चौक तक खून ही खून दिख रहा था. ज़ख्मी कराह रहे थे और पानी मांग रहे थे पर कोई पानी देने वाला नही था. सेना ने मौके को अपने नियंत्रण में लिया.

अनौपचारिक आंकड़ों के अनुसार सौ के करीब लोग मारे गए और एक हजार से अधिक घायल हुए थे. 7 नवंबर 1966 काला दिन था जिसे उस समय की इंदिरा सरकार गांधी सरकार ने अख़बार में नही छपने दिया. देश में कई छोटी घटनाओ पर सत्ता बदलने की नौबत आ जाती है. दादरी की घटना पर देश में असहिष्षुता बढ़ जाती है, लोग अवार्ड वापसी करने लगते है और मानवता जाग जाती है. 1966 में जब लोकतंत्र इतना मजबूत था, सहिष्णुता तो मीडिया/ प्रेस क्यों चुप रहा? क्यों किसी ने अखबार के पन्नों को काला नही किया? संसद चल रही हो और लोकतंत्र के मंदिर के दरवाजे पर गोलियां चले और देश को ख़बर नही, यह तो अजीब ही है.

इंदिरा गांधी सरकार यहीं नही रुकी. पूरे मामले को दबाने के लिए दिल्ली की सड़को पर आगजनी करवाई गयी. यह करने के लिए गुंडे बुलाए गए, साथ थे हरियाणा के माफिया किंग. आग लगाने का दोष प्रदर्शनकारियों पर थोपा गया, लूट-पाट का दोष का आरोप उन पर मढ़ा गया जिससे आंदोलन से लोगों का ध्यान भटक जाये और प्रदर्शनकारियों को दोषी माना जाए.

इंदिरा गांधी सरकार यह भूल गई कि यदि प्रदर्शनकारियों का ध्येय लूटपाट होता तो वो अपने बच्चो और महिलाओं को नही लाते. ऐसा स्वतंत्र भारत में पहली बार हुआ कि सेना को आंतरिक स्थिति में बुलाया गया. इसका जवाब दिल्ली की जनता ने लोकसभा चुनाव में दिया जब दिल्ली की 7 में से 5 सीटों पर जनसंघ जीती.

देश के युवा को अखलाक याद है, गोसेवकों की कथित गुंडई याद है पर इतिहास में घटी इतनी बडी घटना याद नहीं.