देश के 100 फ़िल्म निर्माताओं ने कहा मोदी हटाओ, हम पूछते हैं ‘फिर किसको लाओ?’

अभी हाल ही में पता चला कि फिल्म इंडस्ट्री से 100 फ़िल्म निर्माताओं ने प्रधानमंत्री मोदी को न चुनने का आग्रह किया है. एक जॉइंट स्टेटमेंट में उन्होंने देश से यह आग्रह किया कि भारतीय जनता पार्टी को न चुने, वह देश की अर्थव्यवस्था,बोलने की आज़ादी, संविधान और एकता के विरुद्ध कार्य कर रही है. भारतीय जनता पार्टी और मुख्यतः उसके अध्यक्ष अमित शाह ने राष्ट्र की आत्मा को छलनी किया है. इन फ़िल्म निर्माताओं में से अधिकतर मलयालम इंडस्ट्री से हैं.

यह पढ़ने के बाद दो मिनट के लिए ऐसा लगता है, जैसे यह किसी राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ताओं का वक्तव्य है. किसी राजनैतिक पार्टी या व्यक्ति से आपकी नाराज़गी स्वाभाविक है. लोकतंत्र में बात रखने की पूरी छूट है, लेकिन जब आप ऐसे वक्तव्य देने लग जाते हैं, वह भी लिखित में, तो आपके प्रशंसकों में एक असमंजस की स्थिति बन जाती है.

कला के क्षेत्र में कार्य करने वाले लोग जब राजनीति की बात करने लगे तो उनसे सवाल भी राजनीति वाले ही पूछे जाएंगे. उनसे पूछा जाएगा कि यदि देश में बोलने की आज़ादी पर प्रतिबंध है, तो आप यह बात कैसे बोल रहे हैं? आपकी ही बिरादरी के विभिन्न वामपंथी विचारधारा के कलाकार कैसे विभिन्न मंचों पर देश के प्रधानमंत्री पर आरोप-प्रत्यारोप वाला खेल खेल रहे हैं.

इन सवालों का जवाब देने से आप यह कहकर बच नहीं सकते हैं कि हम तो कलाकर हैं और हमारा राजनीति से क्या लेना देना. मीठा-मीठा गप गप और कड़वा कड़वा थू-थू नहीं हो सकता है. रही बात संविधान की तो इसी संविधान के तले भाजपा बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान का चुनाव हारी है.  तब इसी संविधान का जय-जयकार किया जा रहा था. ऐसा तो है नहीं कि मोदी के अलावा बाकी नेताओं का दूध-भात चल रहा हो. संविधान में तो सभी के बराबर अधिकार हैं. इसी के दम पर भाजपा चुनाव जीतती और हारती है. तो फिर उसी संविधान पर संदेह क्यों?

दिक्कत यह है कि एक व्यक्ति के विरुद्ध द्वेष भावना इतनी ज्यादा है कि एक काल्पनिक भय पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है. अवार्ड वापसी, असहिष्णुता के बाद अब यह तीसरी इनिंग चल रही है. इसी देश में भारत के टुकड़े करने के नारे लगाने में सम्मिलित एक व्यक्ति को लोकसभा का टिकट दे दिया जाता है और इसका विरोध करने की जगह यही बिरादरी समर्थन करती है. उसका जब विरोध होता है तो तर्क दिया जाता है कि लोगों की आवाज़ दबाई जा रही है. विचारधाओं के द्वंद के मध्य एक स्वस्थ्य डिबेट तो लोकतंत्र का सम्मान ही होता है. लेकिन  तर्कों की कमी के कारण काल्पनिक भय से आतंकित होने की बातें करना लोकतंत्र का सम्मान नहीं बल्कि उसका घोर अपमान है.

वैसे इसमें कुछ गलत बात नहीं है कि नज़रियों का द्वंद है और यह हमेशा चलता रहेगा. एक नज़रिया सकारात्मक है, दूसरा नकारात्मक. आप एक व्यक्ति के विरोधी भले हो, लेकिन उसका प्रत्यक्ष विरोध की जगह आप इसी राजनीति के दूसरे व्यक्तियों का समर्थन भी तो कर सकते हैं. आप यह दिखा सकते हैं कि क्यों नरेंद्र मोदी से बेहतर कोई और व्यक्ति हो सकता है. उसके पीछे आप अपने तर्क दे सकते है और एक स्वस्थ्य डिबेट की नींव रख सकते हैं, लेकिन पता नहीं ऐसा क्यों नहीं किया गया. कहा जा रहा है कि इस इंडस्ट्री के बहुत से लोग नरेंद्र मोदी की ‘भक्ति’ करते हैं. अगर इस तर्क को मान भी लिया जाए, तब भी यह किसी को अधिकार नहीं देता है कि किसी पार्टी की कैम्पेनिंग पर लग जाये, और खुद को ‘न्यूट्रल’भी दिखाए.

अगर वो लोग एक व्यक्ति के समर्थक हैं तो आप भी तो उसी एक व्यक्ति के विरोधी हैं? दोनों ही अपने स्तर पर आवाज़ उठा रहे हैं. तो लोकतंत्र कहाँ खतरे में है?

सच तो यह है कि लोकतंत्र में संविधान का सबसे बड़ा अपमान काल्पनिक भय को उत्पन्न करना ही है. यह लोकतंत्र के ऊपर न केवल संदेह पैदा करना होता है बल्कि संविधान की ताकत को भी कमतर करता है. देश का वो संविधान जिसने सभी को लोकतंत्र की भुजाएं बनने का अवसर प्रदान किया है, उन भुजाओं को कमज़ोर करना लोकतंत्र में पाप है. इस पाप को करने के लिए लोकतंत्र के पीछे ही छुपा जाता है. यही इस देश की बहुत ही बड़ी विडंबना है.

दावा त्याग – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. आप उनको फेसबुक अथवा ट्विटर पर सम्पर्क कर सकते हैं.