क्यूंकि खून हमेशा पानी से गाढ़ा होता है

मुकेश अंबानी ने अपने छोटे भाई अनिल अंबानी को जेल में जाने से रोक लिया है. उन्होंने रिलायंस कम्युनिकेशन द्वारा सोनी एरिक्सन को दिए जाने वाले 453 करोड़ रुपयों को अदा किया है. यदि वह यह नहीं करते तो अनिल अंबानी की अगली रात जेल में कटती. मुकेश अंबानी का ऐसा करना ही यह बताता है कि धन संपदा से भी बहुत ऊपर आपके मूल्य होते हैं. मुकेश अंबानी सिर्फ धन कुबेरों की लिस्ट में ही ऊपरी पायदान पर नहीं हैं, बल्कि उन्होंने अपनी संस्कृति और सभ्यता के एक पुरोधा के रूप में अपने आप को साबित किया है.

यह बहुत बड़ी घटना के रूप में प्रदर्शित की जा रही है, लेकिन जिनको भारत की परंपराओं का पता है, वो यह समझते हैं कि यह मुकेश अंबानी का कर्तव्य था. इससे उनके कद में कोई कमी नहीं आई है. बल्कि उनका कद और बढ़ जाता है. वैसे भी ‘अपना खून’ पानी से ज़्यादा गाढ़ा होता है. कोई माने या न माने, लेकिन दशकों की राजनैतिक द्वंद में यदि एक वर्ग बिना वजह के निशाने पर लिया गया है, तो वह देश का धनाढ्य वर्ग है. इसने अपनी मेहनत से धन संपदा एकत्रित की है. एक समय तो वह भी था जब 1973 में कॉर्पोरेट टैक्स 90% हुआ करता था. परंतु किसी भी अन्य वर्ग ने इस वर्ग के लिए आवाज़ नही उठाई कि जब सारा रिस्क उठाकर एक व्यक्ति प्रॉफिट कमाता है, तो उसका 90% वह सरकार को क्यों भरे.

उस समय ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के नीचे इस वर्ग की पीड़ा दबा दी गयी. क्योंकि इस देश के धनी वर्ग को अंग्रेज़ी भाषा का ‘इन्विंसीबल’ मान लिया गया था. उन्हें तो जैसे कुछ हो ही नही सकता है. देश के राजनैतिक वर्ग इस काल्पनिक छवि का खूब इस्तेमाल किया. आज भी विभिन्न रैलियों में आप एक तथाकथित युवा नेता को अपनी आस्तीन चढ़ाते हुए यह बोलते सुन सकते हैं कि कैसे अंबानी परिवार के रिश्ते देश के प्रधानमंत्री से हैं. यह कुछ और नहीं बल्कि उसी दशकों पुरानी राजनीति का फ्लेवर है जिसका एक बार फिर से देश में इस्तेमाल किये जाने का प्रयास किया जा रहा है. वैसे इसी बहाने उस 3 हज़ार करोड़ वाले भ्रम का साँचा भी टूट गया जिसके आधार पर यह बताने का प्रयास किया जा रहा था कि अनिल अंबानी की कंपनी को देश कर प्रधानमंत्री द्वारा 30,000 करोड़ का लाभ पहुंचाया गया है. क्योंकि 30,000 करोड़ रुपये का लाभ कमाने वाला व्यक्ति 453 करोड़ तो भर ही सकता है. नहीं?

मुकेश अंबानी वह व्यक्ति है जिसने लक्ष्मी और सरस्वती, दोनों की ही स्तुति की है. उनकी सफलता का राज़ यही है. वैसे भी जो पेड़ अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ होता है वो कभी टूट कर नहीं गिरता है. चाहें कितनी भी आंधी आ जाये. मुकेश अंबानी उसी का उदाहरण है. धीरूभाई अंबानी के दोनों पुत्रों की आर्थिक स्थितियों के अंतर से ही आप समझ सकते हैं कि ‘पैसा बनाना’, और ‘पैसा बनाते रहना’ , दो अलग चीजें होती हैं. यह कोई ‘अंबानी स्तुति’ नहीं है, बल्कि सच्चाई के श्यामपट्ट पर लिखी वही पुरानी दास्तान है जिसको सनातन परंपरा के मूल से उठाया गया है. इस देश का धनाढ्य वर्ग भी उतनी ही मुसीबतें उठाता है जितना कोई और वर्ग उठाता है. अंतर बस इतना है कि इनकी मुसीबतें कुछ दूसरी होती हैं. अनिल अंबानी तो अब एक और उदाहरण के रूप में सामने आए हैं.

बहुत से लोगों द्वारा यह भी माहौल बनाया जाता है कि देश के अन्य धनाढ्य लोगों की तरह मुकेश अंबानी दान नहीं करते हैं. इस भ्रम को भी अंबानी ने तोड़ा है. दान करना ही एकमात्र लक्ष्य नहीं होना चाहिए, अपितु आपका दान कहाँ जा रहा है, इसको भी भली भांति आपको पहचानना पड़ेगा. आपको यह देखना पड़ेगा कि आपका दान कहीं ऐसे विश्वविद्यालय में तो नहीं लग रहा है जहां से भारत की अखंडता को तोड़ने वाले नारे लगते हो, ऐसे मीडिया हाउस को तो नहीं जा रहा जिसको सर्जिकल स्ट्राइक पर बनी फिल्म ‘अति-राष्ट्रवादी’ लगती हो? ऐसे किसी व्यक्ति के पास तो आपका धन कदापि नहीं जाना चाहिए जो आपके पैसे से सनातन संस्कृति की गलत छवि विश्व में रखते हो. मुकेश अंबानी ने इसी एक मूल विचार को ले कर अंग्रेज़ी के ‘डोनेशन’ वाले शब्द को सार्थक किया है. यही उनको बाकी लोगों से अलग खड़ा करती है.

यह एक सच्चाई है कि इस वर्ग से आने वाले कई ऐसे धनी लोग हैं जिन्होंने देश में इस वर्ग की बहुत खराब छवि बनाई है. नीरव मोदी, विजय मालया, मेहुल चौकसी इत्यादि उनके कुछ उदाहरण है, लेकिन यदि सभी लोग ऐसे होते तो फिर देश की अर्थव्यवस्था की नींव तो कमज़ोर पड़ गयी होती. हाथ की पांचों उंगलियां समान नहीं होती हैं.

देश की जनता धीरे-धीरे ही सही, लेकिन यह समझ रही है कि कैसे राजनैतिक स्वार्थ के लिए समाज का ‘वर्गीकरण’ किया गया है. ऐसी सोच विकसित की गई है जैसे यदि कोई अमीर है तो वह पैदाइशी गरीबों के अधिकार छीनने वाला है. यह सोच जिस ‘वामपंथी जड़’ से उगी है, वह भारत की राजनैतिक दुनिया से खत्म होते होते अब समाज में भी खत्म हो रही है. प्रधानमंत्री मोदी ने जिस ‘पर्दे के पीछे’ वाले खेल की बात पिछले साल की थी, वह यथार्थ के धरातल पर बिल्कुल सत्य थी. अंतर बस इतना है कि आज देश का प्रधानमंत्री इस वर्ग की भी सुनवाई कर रहा है.

सभी वर्गों के एकत्रित प्रयास से ही तो हमारे देश की अर्थव्यवस्था की गाड़ी गतिमान है. मुकेश अंबानी बधाई के पात्र हैं. अनिल अंबानी भी प्रशंसा के योग्य हैं क्योंकि उन्होंने भी भारतीय संस्कृति का पालन करते हुए अपने बड़े भाई और भाभी का धन्यवाद किया है. इसी भारत की छवि हम हर परिवार में देखते हैं. यह छवि एक सुखद अनुभूति भी है, और देश की एकता का मूलमंत्र भी है.

5 Comments

  1. श्यामवीर सिंह
    March 19, 2019 - 11:01 am

    में बहुत दिनों ये सोच रहा था कि ऐक भाई जेल जाने वाला है और दूसरे को कोई परवाह ही नहीं जब ये खबर पड़ी मन को सकून मिला, ये देखकर अच्छा लगा कि भारतीय परम्परा ओर अपनत्व अभी बाकी है और ये कमाया नहीं जाता ये परवरिश से आता है 👍👍👍👍

    • देव
      March 19, 2019 - 2:09 pm

      मैं भी यही सोच रहा था

  2. प्रमोद
    March 19, 2019 - 11:40 am

    अजीज प्रेमजी पर लिखते तो अच्छा होता ।ये भी अच्छा है पर वो बेहतर होता

  3. Mark
    March 19, 2019 - 12:04 pm

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  4. MANOJ SHARMA
    March 19, 2019 - 6:52 pm

    Mujhe to pahle hi pata tha jiska bada bhai mukesh ambani ho bhala vo jail jasakta hai paise k karan mujhe pahle hi pata tha k mukesh ambani aage aakar anil ko support karenge aur vahi kiya dil bahut bada hai mukesh ambani ka

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