प्रख्यात धर्मगुरु सदगुरू जग्गी वासुदेव ने हाल में एक टाइम्स नाउ चैनल को साक्षात्कार दिया है. एक प्रश्न के उत्तर में सदगुरू ने कहा कि कानून के अनुसार जेएनयू के छात्र नेता रहे कन्हैया कुमार और उमर खालिद को जेल में होना चाहिए था. लेकिन ये दोनों ही आजाद घूम रहे हैं और मीडिया के एक हिस्से के लिए आकर्षण बने हुए हैं. ऐसे लोगों को सजा देने का वक्त आ गया है. देश की जनता भी पुलवामा घटना के बाद भावनात्मक रूप से इसके लिए तैयार है.
दिल्ली पुलिस ने जो रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल की है, उसके अनुसार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जो भारत विरोधी नारे लगे थे, उसमें कन्हैया और खालिद की भी संलिप्तता थी. सदगुरू के बयान को इसी आलोक में देखा जाना चाहिए. सदगुरू ने यह भी कहा कि देश के अंदर, देश तोड़ने वाले तत्वों को वामपंथियों ने एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदान किया है. करीब 40 मिनट के साक्षात्कार में सदगुरू ने राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न खतरों के बारे में बात की है और अपनी राय रखी है. इसमें करीब 2 मिनट उन्होंने कन्हैया और उमर खालिद जैसों के बारे में बात की है लेकिन इस 2 मिनट ने बॉलीवुड और पत्रकारिता जगत के ‘लेफ्ट लिबरल गैंग’ के पूँछ में आग लगा दी है.
हिंदी फिल्मों में अभिनेत्री बनने का प्रयास करके थक चुकी स्वरा भास्कर, बीते दिनों के तथाकथित अभिनेता जावेद जाफरी, पत्रकार होने का दावा करने वाले सलिल त्रिपाठी, स्वाति चतुर्वेदी, फेक न्यूज़ के नाम पर करियर बनाने की कोशिश कर रहे प्रतीक सिन्हा, उर्दू पत्रकारिता और राजनीति के नावों में सवारी करने वाले शाहिद सिद्दीकी जैसों ने इस मुद्दे पर ट्वीट किया है. वहीं बीबीसी के सस्ता वर्जन और फर्स्ट कॉपी बनने की कोशिश कर रही ‘वायर’ ने तो इसपर एक आर्टिकल ही लिख मारा है. इन सबका भाव एक ही है कि एक आध्यात्मिक गुरु को राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले पर बोलने का क्या अधिकार है.
भारत की महान ऋषि परम्परा का ज्ञान इन्हें नही होगा, यह तो हम जानते हैं. लेकिन पिछली सदी के महान सन्तों के कार्य और विचार से भी यह अनभिज्ञ हैं, यह निराशाजनक है. भारत की परम्परा रही है कि धर्मगुरु राष्ट्रीय राजनीति और सामाजिक नीतियों, परिस्थितियों पर चर्चा करते हैं और अपने विचार देते रहे हैं. स्वामी विवेकानंद ने जितना कार्य अध्यात्म के क्षेत्र में किया है, उतना ही कार्य उन्होंने सामाजिक उत्थान और कुरीतियों को दूर करने के लिए भी किया है. स्वामी सहजानंद सरस्वती ने तो अपना पूरा जीवन ही किसानों की समस्याओं पर काम करते बिता दिया था जबकि वे एक दंडधारी सन्यासी थे. स्वामी अरविंदो का लेखन भी अध्यात्म के साथ साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्र उत्थान पर विशेष रूप से केंद्रित है. किसी के विचारों से सहमत या असहमत होना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है लेकिन आध्यात्मिक गुरु होने के कारण सदगुरू राष्ट्रीय सुरक्षा पर अपने विचार ही न व्यक्त कर सकें, यह मानसिकता एक कम्युनिस्ट की ही हो सकती है क्योंकि इनकी रुचि न तो राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्र की अखंडता में है और न अध्यात्म में है.
विभाजन के पूर्व भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने जिस तरह से मुस्लिम लीग को न केवल वैचारिक समर्थन दिया बल्कि मुस्लिम के लिए पर्चे पोस्टर बनाये और बकायदा उनका प्रचार किया, यह किसी से छिपा नही है. भारत के विभाजन में मुस्लिम लीग के बाद यदि किसी राजनीतिक संगठन की प्रत्यक्ष भूमिका थी तो वह कम्युनिस्ट पार्टी ही थी.
विभाजन के बाद भी इन्हें अपने कर्तृत्व पर कभी कोई अफसोस नही रहा. तभी तो भारत-चीन युद्ध के समय कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े धड़े ने चीन का समर्थन किया था. जिस धड़े ने चीन का समर्थन किया था, वही आज मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में जाना जाता है. वामपंथी विचारकों को यह सोचने की आवश्यकता है कि ऐसा कैसे सम्भव होता है कि कश्मीर के अतिवादी और अलगवववादी तत्व वामपंथी संगठन से समर्थन पाते रहे हैं लेकिन इसकी जगह वे सदगुरू पर अपमानजनक टिप्पणी कर के साबित कर रहे हैं कि चोट सही जगह लगी है.
कभी देश का मुख्य विपक्षी मोर्चा रहे वामपंथियों को यदि यह समझ मे नही आ रहा है कि बंगाल और त्रिपुरा में मिटने के बाद वे केरल तक ही क्यों सीमित रह गए हैं तो यह शायद देश के लिए अच्छा ही है.
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