चीन ने एक बार फिर से पाकिस्तान के अंदर पल रहे आतंकवादी मसूद अजहर को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशन में दिये गये प्रस्ताव पर अपने वीटो पावर का इस्तेमाल करते हुए रोक लगा दी. इससे हुआ यह कि अब मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित करने के लिए भारत को नया प्रस्ताव लाना होगा.
चीन ने लगातार चौथी बार ऐसा किया है. ऐसा नहीं कि चीन को पता नहीं है कि भारत के साथ पाकिस्तान के क्या रिश्ते रहे हैं. उसको यह भी पता है कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों ने भारत को कैसे दंश दिए हैं. फिर भी चीन का यह गैर-जिम्मेदाराना रवैया विश्व बिरादरी के सामने चीन की असलियत को उजागर कर रहा है. अमेरिका से अपनी तुलना करने का स्वप्न देख रहा चीन दूरदृष्टि के मामले में अमेरिका से बहुत पीछे है. उसकी इस हरकत ने यह साबित कर दिया है.
आज जब विश्व के समक्ष आतंकवाद एक बड़ा सिर दर्द बना हुआ है, उस समय चीन ने एक आतंकवादी को ही बचाने का कार्य किया है. इसकी गूंज बहुत दूर तक जाएगी. इसके साथ ही चीन का यह रवैया उसके मित्र देशों के लिए भी एक संदेश है कि चीन भरोसे के काबिल देश नहीं. एक तरफ जहाँ अमरीकी प्रभाव को चुनौती देने के लिए चीन ने हर प्रकार के पापड़ बेले हैं, वहीं ड्रैगन का यह दो धारी तलवार वाला खेल विश्व के किसी भी शान्तिप्रिय देश के गले नहीं उतरेगा. सीधे शब्दों में, चीन ने अपनी विश्वसनीयता पर ही कुठाराघात किया है.
दूसरी तरफ हमारे देश में उठ रही आवाज़ें और भी दुर्भाग्यपूर्ण है. ऐसा लगता है जैसे एक व्यक्ति के खिलाफ माहौल बनाने के चक्कर में देश की सुरक्षा से भी खिलवाड़ किया जा रहा है. नरेंद्र मोदी से आप एक व्यक्ति विशेष के रूप में कितनी भी नफरत करें, लेकिन उससे यह सत्य नहीं बदल जाता है कि वो जनता द्वारा एक चुने हुए प्रतिनिधि है. देख कर आश्चर्य हो रहा है कि कैसे वुहान स्पिरिट का मज़ाक उड़ाया जा रहा है. अजीब परिस्थितियां बनी हुई हैं.
देश का प्रधानमंत्री शांति प्रस्ताव ले कर जब वुहान जाता है तो हमारे देश के कुछ लोग उसका मजाक उड़ाते हैं. उनका कहना होता है कि चीन इन शांति प्रस्तावों से सुधरने वाला नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी को कुछ सख्ती दिखानी होगी. इनकी बातों से ऐसा लगता है जैसे इन लोगों को कठोर कदम उठाने वाला नेतृत्व अधिक प्रिय है. देश का नेतृत्व कठोर कदम भी उठाकर दिखाता है. जब प्रधानमंत्री उरी और पुलवामा का जवाब देते हैं और डोकलाम में भारतीय जीवटता का परिचय देते हैं, तब भी यही लोग उस एक चीज़ का भी मज़ाक उड़ाते हैं. दोनों ही परिस्थितियों में देश के बुद्धिजीवी वर्ग का रिएक्शन चौंकाने वाला था. समझ में यह नहीं आता कि वह चाहते क्या हैं? हमने छोटे बच्चों को खिलौने वाली रेलगाड़ी के लिए रोते देखा था, लेकिन हमारे बुद्धिजीवी उस रेलगाड़ी को असली पटरी पर दौड़ाने वाली बातें कर रहे हैं.
हम आतंकवाद से लड़ाई के उस मुहाने पर खड़े हैं जहाँ हमारा इकलौता साथी हमारा साहस और एकता ही है. अच्छी बात यह है कि देश में ऐसा नेतृत्व भी है जो मज़बूती के साथ खड़ा है. पार्टी चाहें जो भी हो, लेकिन नेतृत्व क्षमता की भूरी-भूरी प्रशंसा बनती है. हमारे देश की राजनैतिक विरासत ने हमें यही सिखाया है कि जब पाकिस्तान के दो टुकड़े करो, तब सेना के बाद नेतृत्व की भी सराहना करो. आज की राजनीतिक कटुता के मध्य में ऐसा लगता है जैसे समान विचारधारा न होना जैसे कोई अपराध बन चुका है. जहां इस बात का गर्व होना चाहिए कि हमारे देश का नेतृत्व मज़बूती के साथ आतंकवाद से लड़ रहा है, हमारे यहां सवालों की बौछार ही खत्म नही हो रही है. कभी कभार अपने धारा परवाह ज्ञान की धारा को रोक भी लेना चाहिए. वस्तुतः ऐसे मौकों पर तो सभी को एक स्वर में सरकार के साथ खड़े रहना चाहिए, लेकिन आज की राजनैतिक घटनाओं ने खाटी राजनीति करने वालों को निराश किया होगा.
प्रख्यात हिंदी के कवि और देश के पूर्व प्रधानमंत्री ने अपनी एक कविता में अमेरिका और पाकिस्तान को ‘चिंगारी के खेल’ के बारे में चेताया था. वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद अमेरिका के रुख में बदलाव देखने को मिला, लेकिन चीन अपनी किस क्षति के बाद रुकेगा, यह देखने वाला होगा.
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