16 फरवरी 2019 को सुबह 10 बजे फेसबुक पर एक ग्रुप बनाया जाता है. ‘क्लीन द नेशन’ नामक इस फेसबुक ग्रुप का मुख्य उद्देश्य रखा जाता है उन लोगों के सोशल मीडिया एकाउंट को रिपोर्ट करना, जो पुलवामा आतंकवादी हमले में या तो आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति दिखा रहे हैं, अथवा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हुतात्माओं के बलिदान का अपमान कर रहे हैं.
इस ग्रुप को शुरू करने वाले व्यक्ति का नाम मधुर सिंह है. मधुर के द्वारा फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट की जाती है जिसमें उसने पीले रंग की एक टी-शर्ट पहन रखी है, जिस पर भारतीय सेना के उस शौर्य को परिलक्षित किया गया है जिसमें सेना ने एक पत्थरबाज को जीप में बांधकर लोगों की जान बचाई थी. वीडियो में मधुर कहते हैं कि अब यह समय आपकी ‘डिस्प्ले प्रोफाइल’ बदलने का नहीं है. यह समय उन लोगों को चिन्हित करने का है जो हमारे जवानों के बलिदान पर हँस रहे हैं. उनको चिन्हित कर उस कृत्य की शिकायत उनके ऑफिस, यूनिवर्सिटी या स्कूल में करें ताकि उनको नौकरी से निकाला जाए तथा ऐसे कृत्य करने वालों को उनकी यूनिवर्सिटी/स्कूल से निष्कासित कराया जा सके. देश की सेना का अपमान करने वाले लोगों को उनके कुकृत्य का दंड मिलना ही चाहिए.
गौरतलब है कि इस ग्रुप में इंजीनियर, कंसल्टेंट्स, छात्र, एंटरप्रेन्योर्स जैसे 42 ‘फाउंडिंग मेम्बर्स’ शामिल हैं. इस ग्रुप में अंकित जैन और कपिल ऋषि यादव जैसे कुछ मेम्बर्स भी शामिल हैं जिनको प्रधानमंत्री मोदी और कुछ केंद्रीय मंत्रियों द्वारा सोशल मीडिया पर फॉलो भी किया जाता है. इस ग्रुप में सिद्धार्थ कपूर, अविरल शर्मा, अनुराग सक्सेना, आशुतोष वशिष्ठ, आयुष गुप्ता जैसे बहुत से ऐसे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने अपनी ‘प्रोफेशनल लाइफ’ से समय निकालकर यह कार्य किया है, क्योंकि इनके लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि है. इनमें से कुछ ने उन कॉलेज को ईमेल लिख कर शिकायत दर्ज कराई जहाँ का छात्र/छात्रा ऐसे देशविरोधी कृत्य में सम्मिलित थे. कुछ तो खुद कॉलेज भी पहुँचे थे. वहीं कुछ ने उनकी कंपनी में फ़ोन कर कंपनी के मैनेजमेंट को इस मामले में जानकारी दी, जिनके कर्मचारी द्वारा ऐसा कार्य हो रहा था. एक पंक्ति में कहें तो यह एक ‘टीम वर्क’ है जिसको किया गया है. आशुतोष वशिष्ठ का कहना है कि इस ग्रुप को शुरू करने के पीछे मुख्य कारण उन लोगो को चिन्हित करना है जो अपने नाम के आगे भारतीय तो ज़रूर लिखते हैं, लेकिन भारतीयता उनसे कोसो दूर खड़ी है. हमारे देश कि सेना दुश्मन देश पर सर्जिकल स्ट्राइक तो करेगी ही, लेकिन हम यह सुनिश्चित करेंगे कि हमारे देश के अंदर रह रहे देशद्रोहियों को उनके अंजाम तक पहुंचाया जाए.
बस यही बात उस ‘लिबरल बिरादरी’ को अखरने लगी जिसके लिए अपनी रक्षा करने के लिए तलवार उठाना ‘असहिष्णुता’ या ‘हाइपर नेशनलिज़्म’ के अंतर्गत आता है. गांधी के गाल ले कर चलने वाले यह लोग भारतीय सेना और जनता से यही उम्मीद करते हैं कि हर थप्पड़ खाने के बाद हम दूसरा गाल आगे कर दें. शायद उनको स्मरण नहीं कि यह देश गाँधी का ही नहीं बल्कि वीर शिवाजी का भी है. इस ग्रुप के बारे में इनके विचार हैं कि यह लोगों की नौकरियां खा रहे हैं. ऐसे तो समाज में खुद ही लोग न्याय करने लगे तो कानून व्यवस्था ठप पड़ जाएगी. बीच में यह लोग ‘अधिकारों’ की भी बातें करते हैं.
इन्हीं सबके बीच ‘स्क्रॉल’ में एक आर्टिकल लिख दिया जिसमें यह बताया गया कि फेसबुक पर एक ऐसा ग्रुप बना है जो लोगों की रिपोर्टिंग कर उनके निजी जीवन को प्रभावित कर रहा है. इस पूरे लेख में यह दिखाने का प्रयास किया गया जैसे इस ग्रुप को बनाने वालों में कोई अपराध किया हो. वैसे तथाकथित ‘निष्पक्ष सेक्युलर पत्रकारिता’ की खासियत ही यही होती है कि उनकी नज़र में उनके हिसाब से न किया जाने वाला कार्य अपराध ही होता है. टीवी चैनलों पर तो पहले ही स्क्रीन्स काली की जा चुकी हैं. आज़ादी ब्रिगेड को ‘भविष्य का नेतृत्व’ घोषित कर देने वालों से और क्या उम्मीद लगाएं?
ख़बर है कि कुछ ही दिनों में इस ग्रुप ने 50 से अधिक लोगों की शिकायत कर उनको उनकी नौकरी और कॉलेज से निकलवा दिया है. यदि यह सत्य है, तो लोपक इस कार्य की भूरी-भूरी प्रशंसा करता है. जी नहीं! हम अराजकता के पक्ष में नहीं खड़े हैं, और न ही हमें किसी के निजी जीवन में घुसने का कोई शौख है. हम बस ऐसे लोगों को समर्थन देने वालों के खिलाफ हैं जो ‘लिबरलिस्म’ की दौड़ में अपनी जड़ों को काटते चले जा रहे हैं. अगर 50 से अधिक ऐसे लोगों की नौकरियां गयी हैं, जिन्होंने हमारे देश की सेना का अपमान किया है, तो यह गर्व की बात है. आखिर देश में कब तक सहिष्णुता वाली बांसुरी बजायी जाती रहेगी. कमाल की बात ये है कि ऐसी बातें वहीं करते हैं जिन्होंने कभी सीमा पर फैले तनाव को नहीं देखा है. इनका कहना है कि अगर इतनी ही राष्ट्रभक्ति है तो जा कर सेना में भर्ती क्यों नहीं हो जाते. इस कुतर्क का वैसे तो कोई जवाब नहीं है, फिर भी हमारा यही कहना है कि देश सेवा मात्र सेना में भर्ती हो कर ही नहीं की जा सकती है. निसंदेह सेना देश भक्ति दिखाने का सर्वोच्च मापदंड है, लेकिन देश की सीमा की सुरक्षा के साथ देश के समाज की सुरक्षा करना भी उतना ही आवश्यक हो जाता है.
नौकरियां गयी हैं तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि क्यों गयी हैं, अपितु सवाल यह होना चाहिए कि अब तक क्यों नहीं गयी थी? देश के संसाधनों का उपयोग कर रहे ऐसे लोग जो देश के जवानों के बलिदान का अपमान करते हैं, उनको समाज में रहने का कोई अधिकार नहीं है. बात रही उनके ‘मानवाधिकार’ की, तो इस देश में यह शब्द शायद अब हाईजैक कर लिया गया है. मानवाधिकार का मतलब यह नहीं होता कि देश को तोड़ने की विचारधारा वाले लोगों को सम्मान दिया जाए. सीमा पर खड़ा जवान अगर दुश्मन के मानवाधिकार की बातें करने लगेगा, फिर तो जीत चुके हम युद्ध. AC कमरों में बैठ काल्पनिक दुनिया की ज़मीन पर मानवाधिकार के बीज बो रहे ऐसे लोगों की आंखों की पट्टी जितनी जल्दी उतरे, उतना सही है. देश के अंदर बढ़ते हुए आक्रोश को जिस ‘हाइपर नेशनलिज़्म’ की संज्ञा इनके द्वारा दी जाती है, उसी को सीने में लिए हमारे देश का जवान फौलाद की तरह सीमा पर खड़ा रहता है. बात रही बच्चों के भविष्य की, तो जो छात्र वर्तमान को ही बिगाड़ने में लगे हुए हैं, उनसे स्वस्थ भविष्य की कामना करना मूर्खता से अधिक कुछ भी नहीं है.
निश्चित रूप से हम यह मानते हैं कि देशभक्ति दिखाने के अपने तरीके होते हैं. कोई इसको प्रत्यक्ष रूप से दिखाता है, तो कोई अप्रत्यक्ष रूप से, लेकिन देश के जवानों के सर्वोच्च बलिदान का मज़ाक उड़ाना निश्चित रूप से एक प्रत्यक्ष कार्यवाही का भोगी बनना चाहिए. महाभारत में भी श्री कृष्ण ने शिशुपाल के सौ पापों को क्षमा दान दिया था, लेकिन अंत में कृष्ण के सुदर्शन ने ही शिशुपाल का अंत भी किया था. पाकिस्तान के साथ अभी भी जो शांति चाहते हैं, उनसे अनुरोध है कि किसी दिन सीमा पर वही शांति संदेश वाले प्लेकार्ड ले कर जाएं और गोलियों की बौछार रोकें. या किसी फिदायीन आतंकवादी के समक्ष जा कर उस प्लेकार्ड को दिखाएं और कहें कि जिस जिहाद के भूत को ले कर वो चला है, उसे छोड़ दे. क्या वो ऐसा करेंगे? नहीं! उनको भी पता है कि उसके बाद उनका क्या अंजाम होगा. आंखों पर पट्टी बांध लेने से अंधेरा नहीं हो जाता है. शांति से अपने घर में बैठ लंबे लेख लिख ‘हाइपर नेशनलिज़्म’ की बातें करना आसान है, लेकिन उस जवान के दुख और त्याग को समझना बहुत ही मुश्किल है जो अपने परिवार को छोड़ सीमा पर खड़ा है. उसे पता है कि कभी भी कुछ भी हो सकता है, लेकिन उसके रक्त का उबाल इतना है कि बंदूक की नली से निकले पीतल को भी पिघला दे. कलेजे में इतनी जान है कि देश के दुश्मनों को सिर्फ अपनी दहाड़ से ही कोसो दूर फेंक दें. इसीलिए कायरों द्वारा हमेशा पीठ पर प्रहार किया जाता है. यही ख़ौफ़ दुश्मन के सीने में बरकरार रहना चाहिए. हमेशा!
बहरहाल, यह ग्रुप इस समय फेसबुक द्वारा हटा दिया गया है. ऐसा तब है जब इस ग्रुप के किसी भी मेंबर ने किसी भी तरह से तथाकथित ‘कम्युनिटी गाइडलाइन्स’ को नहीं तोड़ा है. इसको देख कर फेसबुक संस्थापक मार्क जुकरबर्ग की वो बात याद आ जाती है जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘सिलिकॉन वैली इज़ एक्सट्रीम-लेफ्ट लीनिंग’. अब उन्होंने जो कहा था, वही प्रत्यक्ष दिखाई भी दे रहा है. फिर भी हमारे लड़के लगे हुए हैं. जिस पावन कार्य को करने के लिए वो आगे आये हैं, उसके लिए तो सीना ठोक के ज़िम्मेदारी ली जानी चाहिए. बाकी अगर शांति के कबूतरों को उड़ाने से ही मसले सुलझते तो आज भी हम बंग्लादेश को ‘ईस्ट पाकिस्तान’ के रूप में जान रहे होते. शांति आवश्यक है, लेकिन सम्मान सर्वोच्च है.



5 Comments
I am with you all.I love our nation.I feel it is the duty of every citizen of India to fight against anti national people and anti army.Vande Matrum.I am very happy for you efforts.keep the good work going.
Very nice initiative. Boycott them socially and economically.
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