करीब 8 महीना पहले मैंने अपने फ्रीडम आफ एक्सप्रेशन का इस्तेमाल करते हुए अपने कुछ व्यूज रखे. मामला यह था कि एयरटेल में एक शिकायत के बाद मुस्लिम रिप्रेजेंटेटिव के बजाय मैने हिंदू रिप्रेजेंटेटिव की मांग कर दी. इस बात पर हंगामा मच गया.
लोगों ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर इसके पीछे कारण क्या है. कुछ पीछे जाएं तो आपको बताना चाहती हूं कि एक बार एक मुस्लिम इलेक्ट्रीशियन मेरे घर काम करने आया. काम के सिलसिले में ही उसने मेरा नंबर ले लिया और कुछ दिनों बाद उसी नंबर पर वह मुझे परेशान करने लगा. जब मैंने उसे डांटा तो उसने मेरा नंबर अपने अन्य मजहबी भाइयों को बांट दिया. अलग-अलग नंबरों से मुझे फोन कॉल और भद्दे मैसेज आने लगे. मुझे परेशान किया जाने लगा, टॉर्चर किया जाने लगा. मैं एक तरीके से मेंटल कोमा में चली गई जिसके कारण मुझे अपना मोबाइल नंबर तक बदलना पड़ा. इसके कुछ दिन बाद एयरटेल वाली घटना हुई जिस पर मैंने अपना व्यू रखा लेकिन उसे गलत समझा गया.
अभी कुछ दिन पहले जब वोडाफोन को मैंने ट्वीट किया और उनके नेटवर्क की कुछ समस्याएं बताई तो वहां से एक मुस्लिम रिप्रेजेंटेटिव ने नंबर मांगा मैंने पहले के अपने बुरे अनुभवों से सीख लेते हुए मुस्लिम रिप्रेजेंटेटिव को अपना नंबर ना शेयर करने की बात कही. यह मेरा पर्सनल एक्सपीरियंस और च्वाइस है कि मैं अपना नंबर कैसे और किससे शेयर करूँ और किससे शेयर ना करूँ.
यह मेरा फ्रीडम आफ एक्सप्रेशन भी है और मेरी आजादी का एक हिस्सा भी है. मेरे इस अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान ना करते हुए बहुत सारे बुद्धिजीवी, बॉलीवुड के लोग राजनीतिज्ञ, सेकुलर मुझ पर टूट पड़े कि मैंने हिंदू मुस्लिम की बात कर दी लेकिन वही लोग उस समय कहां थे जब 8 महीने तक मैं लगातार हत्या बलात्कार की धमकी झेल रही थी. एक खास मजहब के लोग मुझे सोशल प्लेटफॉर्म पर भद्दी भद्दी बातें लिख रहे थे और सीधी सीधी धमकियां दे रहे थे. जितने भी राजनीतिक लोग, बॉलीवुड के लोग, फेमिनिस्ट बुद्धिजीवी मेरे ऊपर अटैक कर रहे थे, क्या किसी ने एक बार भी यह सोचा कि एक लड़की एक महिला को इस तरह से बार-बार रेप की धमकी देना कहां तक उचित है और कहां तक सही है.
क्या महिला को ना कहने का अधिकार नहीं है? क्या उसके पास फ्रीडम आफ एक्सप्रेशन नहीं है? क्या वह केवल इस्तेमाल की वस्तु है कि कोई भी उसका नंबर लेकर उसके साथ किसी भी तरीके की बात कर सकता है?
भारत में एक फैशन है, अभिव्यक्ति की आजादी या बोलने की आजादी की बात कौन कर रहा है? फिर तय होता है कि उसे कैसा रंग देना है.
एक खास वर्ग अगर यह बात कहता है तो पूरे देश को खतरा महसूस कराया जाने लगता है. और अगर एक दूसरा तबका यही बात कहता है तो उसके कोई मायने नहीं होते. ऐसे लोगों के लिए, ऐसे बुद्धिजीवियों के लिए, फेमिनिज्म या फ्रीडम आफ एक्सप्रेशन या सेकुलरिज्म के मायने धर्म के हिसाब से अलग अलग होते हैं.
अगर आप हिंदू हैं, महिला हैं और एक विशेष आईडियोलॉजी से हैं तो यह फ्रीडम आफ एक्सप्रेशन व सेकुलरिज्म आपके लिए नहीं है. आपको रेप और हत्या की धमकियां देने वाला अगर एक विशेष अल्पसंख्यक समुदाय से आता है तो यकीन मानिए कि आपको कोई सुनने वाला नहीं है. आपको कोई सही ठहराने वाला नहीं है.
लेकिन मैं यहां साफ साफ कहना चाहती हूं कि – हां, मुझे भी आजादी पसंद है और मैं भी आजादी चाहती हूं. मैं अपनी आजादी के लिए किसी भी तरीके की – हाँ, किसी भी तरीके की स्वतंत्रता की हिमायत करती हूँ. फ्रीडम आफ एक्सप्रेशन का दम रखती हूं और सबसे बड़ी बात मैं किसी को भी ना कह सकती हूँ, किसी भी चीज के लिए ना कह सकती हूँ.
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लेखिका पूजा सिंह, सोशल मिडिया पे एक्टिव हैं, ये आर्टिकल उनके द्वारा सहन किये गए धमकियों व अपशब्दों को उल्लेख करता हैं, ये उनके निजी मत पर आधारित हैं!
