टेक्सटाइल मंत्री स्मृति ईरानी ने कुछ दिन पहले अपने संसदीय क्षेत्र में हाल ही में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘उरी- द सर्जिकल स्ट्राइक’ की स्पेशल स्क्रीनिंग रखवाई थी. पता चला कि अमेठी में कोई सिनेमा हॉल ही नहीं है.
सुनकर बहुत अजीब लगा कि आज़ादी के 70 वर्षों बाद विकास के बड़े दावों के बीच भी देश में ऐसा क्षेत्र है जिसने कभी सिनेमा हॉल का मुँह नहीं देखा. यह स्थिति तब है जब वहीं के एक पूर्व सांसद को भारत में कंप्यूटर लाने का श्रेय दिया जाता है.
एक आम नागरिक को यह सुनकर आश्चर्य होगा, लेकिन जो भारतीय राजनीति की समझ रखते हैं, उनको इसमें कोई आश्चर्य वाली बात नज़र नहीं आती है. वहाँ की कच्ची सड़कें, टूटे मकान, बदहाल जीवनशैली वहाँ के सांसद के कार्यों का बखान करते हैं. वहाँ के वर्तमान सांसद साहब आजकल प्रधानमंत्री की रेस में बताए जाते हैं. टीवी पर भी खूब दिखते हैं. क्रांतिकारी पत्रकारों की कलम ने उनकी खूब जय बोली है. परंतु यहां बात व्यक्ति विशेष की नहीं, सोच की है.
अमेठी ने राजनीति द्वारा सत्ता, बल, धन, जाति और भावनाओं के हरसंभव प्रयोग को अपनी भूमि पर होते हुए देखा है. विडंबना यह है कि दो प्रधानमंत्री भी अमेठी से ही निकले हैं. इसके बावजूद 2014 के चुनावों में गुजरात मॉडल के सामने खड़ा करने के लिए कोई अमेठी मॉडल नहीं था. इन 70 वर्षों में हरित क्रांति, श्वेत क्रांति इत्यादि के बीच ‘विकास क्रांति’ कभी अमेठी तक नहीं पहुंची. करीब साढ़े तीन सौ किलोमीटर की दूरी पर ही बसी सैफई इस मामले में इतरा सकती है. कम से कम वहाँ हर साल बॉलीवुडिया नाच गाना का कार्यक्रम तो रखवाया ही जाता था जब राज्य में समाजवादी रसूख था.
‘उरी’ फ़िल्म को देखने के बाद वहाँ के लोगों ने फ़िल्म की तारीफ की है. उनका कहना है कि क्षेत्र में बहुत से लोगों को पहली बार बड़े पर्दे पर फ़िल्म दिखाई गई है. वो खुश हैं. इस क्षणिक सुख के आभास के बीच पीढ़ियों की दुर्दशा को भुला बैठे हैं. उनको इसका गुस्सा नहीं था कि इतने सालों से उनके क्षेत्र में कोई सिनेमा हॉल क्यों नहीं है, बल्कि उनको इस बात की खुशी थी कि कम से कम फ़िल्म तो देख ली है. शायद इसीलिए भारत की जनता को भोली कहा जाता है.
किसी संसदीय क्षेत्र की ऐसी दुर्दशा तब होती है जब किसी करिश्माई नेतृत्व वाली छवि की चकाचौंध में उस क्षेत्र के असल मुद्दे छिप जाते हैं. जब यह मान लिया जाता है कि एक व्यक्ति उस क्षेत्र का विकास सिर्फ इसलिए कर सकता है क्योंकि वो फलाना का लड़का है. आज भी बरसात के दौरान सड़कों पर पड़े गड्ढों में वहाँ के सांसद महोदय को शर्म से डुबाने के लिए पर्याप्त पानी जमा हो जाता है. लेकिन कोई हिसाब नहीं मांगता है. उनको इसी बात से गर्व है कि उनके क्षेत्र से दो प्रधानमंत्री निकले हैं, और गठबंधन सही रहा तो तीसरा भी निकल आएगा.
गरीबी हटाओ के नारे का कोई असर कम से कम अमेठी पर तो नज़र नहीं आता. यदि होता तो ब्रिटिश प्रतिनिधि को टूटे छप्पर और बच्चों के अधनंगे शरीर दिखा कर यह नहीं बोला जाता कि ‘दिस इज़ रियल इंडिया’. वैसे 2019 चुनाव नज़दीक हैं. एक बार फिर अमेठी को अपना भाग्य बदलने या यथास्थिति को जारी रखने का फैसला करने का अवसर मिलने वाला है. देखें, इस बार उँट किस करवट बैठता है.

2 Comments
इस्लाम में फिल्म देखना गुनाह है
सही मे भारत के बहुत से क्षेत्र अभी भी विकास से अछुते है