अयोध्या का अर्थ है जिससे युद्ध जीता न जा सके। लेकिन अयोध्या के इस अर्थ पर प्रश्नचिन्ह लगाते तीन गुम्बद वहाँ खड़े थे जिन्हें आज से लगभग 25 वर्ष पूर्व 6 दिसम्बर, 1992 को ढ़हा दिया गया। अब अयोध्या पुनः अपने अर्थ को जीने लगी है। 500 वर्ष पूर्व बाबर के सेनापति मीर बांकी ने रामजन्मभूमि पर अवस्थित मन्दिर का विध्वंस कर इस मस्जिद का निर्माण करवाया था। मुसलमान इन तीन गुम्बदों को बाबरी मस्जिद बताते थे जबकि हिन्दू इस ढाँचे के नीचे अपने रामजन्मभूमि मन्दिर का अवशेष बताते थे। 1855 में जबकि वाजिद अली शाह की नवाबी अपने आखिरी दिनों में थी, अयोध्या में भीषण संघर्ष हुआ। 12 हजार हिंदुओं ने विवादित ढाँचे पर हमला किया और उसका एक हिस्सा तोड़ दिया। इस हमले में 100 के करीब मुसलमान मारे गए। 1934 में भी इस विवादित ढाँचे के गुम्बद ढाह दिए गए थे जिसे अंग्रेजी सरकार ने फिर से बनवा दिया था। इन घटनाओं से संघ अथवा विश्व हिन्दू परिषद का कोई सम्बन्ध न था। पिछले पाँच सौ वर्षों में बाबरी ढाँचे को मिटाने के लिए 76 युद्ध हुए। इन युद्धों में 3 लाख से अधिक हिंदुओं ने अपने प्राणों की आहुति दी। मन्दिर के लिए प्राण देने वालों में कृषक भी थे, सैनिक भी थे, नागा साधु भी थे और जमींदार और रियासतदार भी थे। हिन्दू समाज ने कभी भी इस विवादित ढाँचे को मस्जिद की मान्यता नही दी। यह हमेशा उनके हृदय में शूल की भाँति चुभता रहा।
अयोध्या में 6 दिसम्बर, 1992 को जो हुआ वह सनातन हिन्दू धर्मावलंबियों की प्रवृत्ति नही रही है। गत 1000 वर्षों में हमारे कितने ही मन्दिर तोड़े गए उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र प्राचीन मंदिरों से लगभग शून्य है। मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर भी मस्जिद है। काशी विश्वनाथ पर भी मस्जिद खड़ी है। किन्तु 6 दिसम्बर, 1992 को जो अयोध्या में घटित हुआ वह कहीं और नही हुआ। कारसेवकों का धैर्य क्यों चुक गया?
विश्व हिन्दू परिषद कई बातों से नाराज था। पी.वी.आर.के. प्रसाद नरसिंह के गृहराज्य से आते थे और बहुत भरोसेमंद अधिकारी थे। वे तिरुपति तिरुमाला ट्रस्ट के सचिव रहे थे इसलिए दक्षिण के सभी सन्तों को अच्छे से जानते थे। नरसिंह राव उनका उपयोग सन्त समाज की एकता को तोड़ने के लिए कर रहे थे। यद्यपी इसमें उन्हें कोई सफलता नही मिली। यहाँ तक काँची के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने भी महंत अवेद्यनाथ को अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया था। अशोक सिंघल तक ये खबरे पहुँचती रहती थी। इससे विहिप और केंद्र सरकार के बीच अविश्वास पैदा हो गया था। लेकिन यह बाबरी विध्वंस का कारण न था। हाँ, इसका परिणाम यह हुआ था कि सिंघल स्वयं नरसिंह राव से बात न करते थे। अब ये काम विनय कटियार कर रहे थे।
वास्तव में 6 दिसम्बर, 1992 को जो हुआ उसकी पटकथा दो वर्ष पहले ही जाने-अनजाने में मुलायम ने लिख दी थी। 30 अक्तूबर और 2 नवम्बर, 1990 को मुलायम सिंह सरकार द्वारा कारसेवकों की नृशंस हत्या जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। आखिर ऐसा क्या हुआ जो मुलायम सिंह यादव मौलाना मुलायम बनने को बेचैन हो गए? इसके लिए हमें 10 वर्ष पीछे यानी कि 1980-1982 के दौर में जाना पड़ेगा जब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह हुआ करते थे। उन दिनों मध्यप्रदेश से सटे यूपी के जिले डकैतियों से परेशान थे। वीपी सिंह ने शपथ ली कि या तो डाकुओं का सफाया कर देंगे या इस्तीफा दे देंगे। डाकुओं के धराधर एनकाउंटर होने लगे। अधिकतर डकैत पिछड़ी जातियों से सम्बद्ध थे। मुलायम ने इसे पिछड़ी जातियों का नरसंहार बताया। सरकार और विपक्ष में जंग छिड़ गई। मुलायम को अंदेशा हुआ कि बिहार के जगदेव प्रसाद की तरह पुलिस उनका भी एनकाउंटर कर सकती है। उनकी सुरक्षा को मजबूत करने के इरादे से चौधरी चरण सिंह ने उन्हें लोकदल का प्रदेश अध्यक्ष और नेता विपक्ष बनवा दिया। एनकाउंटर का विवाद बढ़ता गया। कुछ फेक एनकाउंटर के मामले बने और वीपी को इस्तीफा देना पड़ा। यहीं से मुलायम और वीपी के बीच अविश्वास का सम्बंध बना। 10 साल बाद नियति ने दोनों को एक नई पार्टी में साथ खड़ा कर दिया था। लेकिन पुरानी बातें दोनो को ही याद थीं। वीपी सिंह ने मुलायम को मुख्यमंत्री बनने से रोकने में पूरा जोर लगा दिया था। जबकि मुलायम के नए गुरु अब बलिया के ठाकुर चन्द्रशेखर थे।
लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से अयोध्या के रथयात्रा पर निकल चुके थे। 30 अक्तूबर, 1990 को कारसेवा होनी थी। वीपी की सरकार भाजपा के समर्थन पर टिकी थी। इसलिए वे अयोध्या विवाद का हल चाहते थे। 20 अक्तूबर को विवादित भूमि के अतिरिक्त आस-पास की भूमि का अधिग्रहण कर उन्होंने इसे रामजन्मभूमि न्यास को सौंपने का अध्यादेश जारी कर दिया। लेकिन मुलायम ने इस अध्यादेश को लागू करने से इनकार कर दिया। वीपी सिंह किसी भी हालत में मुलायम को सेकुलरिज्म का चैंपियन नही बनने देना चाहते थे। 22 अक्तूबर को उन्होंने अध्यादेश वापस ले लिया। दरअसल मुलायम ने बिहार और यूपी की सीमा पर आडवाणी को गिरफ्तार करने की पूरी तैयारी कर रखी थी। ऐसे में वीपी सिंह के संकेत पर 23 अक्तूबर की सुबह समस्तीपुर जिले में आडवाणी गिरफ्तार कर लिए गए और बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव मुसलमानों के मसीहा बन गये। मुलायम की तैयारियाँ धरी रह गईं।
आडवाणी गिरफ्तार हो गए थे लेकिन कारसेवा की तैयारियां जस की तस थी। उधर मुलायम सिंह ने अयोध्या में कर्फ्यू लगा दिया था। इधर विहिप ने भी हर कीमत पर कारसेवा करने का संकल्प कर लिया था। इस हद तक नाकेबंदी थी कि अयोध्या की तरफ जाने वाली सड़कें खोद दी गई थीं। पुलों पर दीवार खड़ी कर दी गई थी। राज्य की सीमा पर खाई खोद दी गई थी। अशोक सिंघल 5 लाख कारसेवकों के साथ आने की योजना बना चुके थे लेकिन वो तो अब होता न दिख रहा था दीपावली के मौसम में भाजपा कार्यकर्ता और समर्थक जेलों में ठूँस दिए गए थे। रज्जु भैया, विष्णु हरि डालमिया, महंत अवेद्यनाथ, अटल बिहारी वाजपेयी, स्वामी चिन्मयानंद, राजमाता विजयाराजे सिंधिया इत्यादि गिरफ्तार हो चुके थे। आडवाणी पहले ही बिहार में नजरबंद थे। लेकिन विनय कटियार, शिरिश्चंद्र दीक्षित और अशोक सिंघल अब भी पकड़ से बाहर थे। विशेषकर सिंघल के लिए लगातार छापामारी हो रही थी।
मुलायम ने अतिआत्मविश्वास में कह दिया कि ‘परिंदा भी पैर नही मार सकता’। लेकिन मुलायम सिंह को संघ के कार्य करने की विधि का कोई विशेष ज्ञान न था। अशोक सिंघल ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर के अयोध्या पहुँचने की घोषणा की। विनय कटियार और मोरोपन्त पिंगले भी अयोध्या पहुँच गए थे। तय समय पर अचानक ही मन्दिरों और घरों से कारसेवक निकलने लगे। अयोध्या में मिनटों में लाखों कारसेवक सड़कों पर थे। उनका नेतृत्व कर रहे अशोक सिंघल पुलिस के हमले से घायल हो गए। लेकिन 50 हजार के करीब स्वयंसेवक जन्मभूमि क्षेत्र में घुसने में सफल रहे। पहले से तैयार कार्यकर्ताओं ने विवादित ढाँचे के गुम्बद में छेद कर भगवा ध्वज लहरा दिया और झट से नीचे उतर आये। मस्जिद के एक दीवार में भी तोड़फोड़ हुई। पुलिस ने गोली चला दी और गुम्बद पर ध्वज ठीक करने दुबारा चढ़ रहे 2 कारसेवक मारे गए। अयोध्या नगरी में भी 2 कारसेवक मारे गए। लेकिन सरकार का दावा कि परिंदा भी पैर नही मार सकता, पूरी तरह फेल रहा। अयोध्या में मौजूद सभी पत्रकारों के कैमरे तोड़ दिए गए थे। मुलायम सिंह यादव ने कारसेवा हुई इसे झूठी अफवाह बता दी। सिंघल ने दुबारा कारसेवा करने का दम भरा। 2 नवम्बर का दिन तय हुआ। 30 अक्तूबर की कारसेवकों की सफलता से प्रशासन खीझ और हताशा में थी। अब उसके इरादे बेहद खतरनाक हो चुके थे।
2 नवम्बर, 1990 की सुबह सुबह कारसेवकों का जत्था जन्मभूमि परिसर की ओर चला। कारसेवक अभी जन्मभूमि परिसर से 2 किमी की दूरी पर थे कि पुलिस ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। बिना चेतावनी और आँसू गैस के गोले छोड़े अर्धसैनिक बलों ने फायरिंग की थी। अनगिनत कारसेवक और अयोध्या की परिक्रमा करने आये तीर्थयात्री मारे गए। दिगम्बर अखाड़े के पास एक घर मे रुके कोठारी बन्धुओं को बाहर खींच कर के सर में गोली मार दी गई। इन दो भाइयों ने गुम्बद ओर ध्वज लहराया था। प्रशासन इतनी बर्बरता से काम कर रहा था कि घायलों को मरने के लिए सड़क पर छोड़ दिया गया था। सीआरपीएफ के कमांडर उस्मान ने सभी हदें तोड़ दी थी। रामधुन गा रहे रामअचल गुप्ता को पीछे से गोली मारी गई। राजस्थान से आये एक कारसेवक ने मरने से पहले अपने ही खून से अयोध्या की सड़कों पर लिखा -सीताराम। कई सारे साधु-सन्यासी मारे गए। मठों की पवित्रता का ध्यान भी न रखा गया। उस रात अयोध्या और फैजाबाद में हिंदुओं के घर चूल्हा न जला। फैजाबाद के डीएम ये सब सहन न कर सके और उसी रात अवकाश लेकर फैजाबाद से दूर चले गए।
कोठारी बन्धुओं की शहादत ने पूरे हिन्दू समाज को झकझोर कर रख दिया। पूरी अयोध्या इनकी शहादत पर रोयी थी। 22 व 20 वर्ष के इन दो भाइयों की कहानी अब घर घर पहुँच गई थी। मुलायम के राजनीतिक गुरु लोहिया ने कभी कहा था कि भारत के सांस्कृतिक इतिहास में इस बात का कोई महत्व नही कि राम इतिहास पुरुष हैं भी या नही। लेकिन दक्षिण और उत्तर भारत को जोड़ने वाले देवपुरुष वही हैं। अपनी राजनीति में मुलायम अपने गुरु की बात भूल गए और हमेशा के लिए मौलाना मुलायम हो गए। 100 से भी अधिक सन्यासी व कारसेवक मारे गए थे। ये कारसेवक जिन नगरों और जिलों से आये थे वहाँ जबरदस्त गुस्सा था। बार-बार अयोध्या आने वाले कारसेवक अलग न थे। मुलायम का अन्याय उन्होंने अपने आँखों से देखा था। अब प्रतिकर का समय था।
6 दिसम्बर, 1992 को गीता जयंती थी। द्वापरयुग में इसी दिन कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। आज कुरुक्षेत्र अयोध्या में सजा था। अयोध्या एक और कारसेवा के लिये तैयार थी। कारसेवकों के खून का प्रतिकार उत्तरप्रदेश की जनता ने मुलायम की सत्ता को ढहा कर ले लिया था और अब शासन कल्याण सिंह के नेतृत्व में था। 3 लाख से अधिक कारसेवक न्यायालय की अनुमति से ‘प्रतीकात्मक’ कारसेवा के लिए अयोध्या में मौजूद थे।
दिन के 12 बजने को थे। अधिकतर विहिप नेताओं का भाषण हो चुका था। अब आडवाणी जी बोल रहे थे। ढाँचे की तरफ इशारा कर के उन्होंने उसे गुलामी का प्रतीक बताया। तभी अचानक पुलिस पर पथराव हुआ। कुछ अव्यवस्था का माहौल बना और पाँच सौ के करीब कारसेवक बैरिकेड तोड़कर रामजन्मभूमि परिसर में प्रवेश कर गए। बिना सोचने और समझने का मौका दिए कारसेवकों का रेला ढाँचे की तरफ टूट पड़ा। कुछ ही मिनटों में 500 के करीब लोग गुबंदों के ऊपर थे और लाख के करीब नीचे। आडवाणी लगातार कारसेवकों से लौट आने की अपील कर रहे थे। लेकिन अपने नेता को आज लोग अनसुना करने पर आमादा थे। परिसर में मौजूद सुरक्षा बलों के जवान सवा बारह बजे तक परिसर से बाहर हो गए। अब वहाँ कारसेवक थे और था ‘गुलामी का प्रतीक’। आडवाणी के अपील को बेअसर होता देख सिंघल ने माइक संभाला। वे कहते रहे कि विवादित ढाँचा मस्जिद नही, मन्दिर है। सिंघल और महंत नृत्यगोपाल दास जी मंच से उतर ढाँचे की तरफ गए। लेकिन सब बेअसर। फिर कहा गया कि ढाँचे पर जो चढ़े हैं वे दक्षिण भारतीय हैं। अब शेषाद्री जी ने तमिल, तेलुगु, मलयाली और कन्नड़ में यही अपील की। लेकिन यह भी बेअसर ही रहा।
घटना की खबर लखनऊ और दिल्ली पहुँच चुकी थी। कल्याण सिंह सरकार का निर्देश आया कि केंद्रीय बल का प्रयोग किया जा सकता है लेकिन गोली नही चलेगी। दरअसल कल्याण सिंह ने पहले ही लिखित आदेश जारी कर दिया था कि गोली नही चलेगी। राज्य पुलिस और केंद्रीय बल के कई अधिकारी जूते उतारकर हनुमान चालीसा पढ़ने लगे। अगले 5 घण्टे मे ढाँचा मिटा दिया गया था। कारसेवकों का बदला पूरा हुआ। ढाँचा गिराने के बाद मौके पर ही पाँच फीट की दीवार खड़ी की गई और जमीन से चबूतरे तक 18 सीढियाँ बनी। मूर्ति अयोध्या के राजा विमलेंद्र मोहन मिश्र के घर से आई। मस्जिद ढाहने के प्रयास में 4 कारसेवक मारे गए थे। मरने वालों में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव के पुत्र प्रभाकर का नौकर भी था।
6 दिसम्बर, 1992 के पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या यह पूर्वनियोजित था या स्वतःस्फूर्त घटना थी। इसका सीधा सीधा जवाब दे सकने वाले लोग अब इस धरा पर नही लेकिन कुछ दिलचस्प घटनाक्रम संकेत तो देते हैं।
1.रामजन्मभूमि आंदोलन में पहली बार संघ सामने से हिस्सा ले रहा था। संघ के तीन वरिष्ठ नेता- केसी सुदर्शन, एचवी शेषाद्री और मोरोपन्त पिंगले अयोध्या में मौजूद थे। इसमें सबसे कम जाना पहचाना नाम मोरोपंत जी थे। मोरोपन्त जी की ट्रेनिंग डॉ हेडगेवार के हाथों हुई थी। रामजन्मभूमि आंदोलन के मास्टरमाइंड वही थे। शिलापूजन, चरण पादुका, रामज्योति यात्राएं सब उनकी ही योजना थी। वे इसके पहले भी एकात्मता यात्रा आयोजित कर चुके थे। पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले आदमी थे, श्रेय और प्रसिध्द के मोह से बहुत दूर।
2. कारसेवकों ने सबसे पहले ढाँचे की हॉटलाइन काटी। अयोध्या नगरी की सभी टेलीफोन लाइनें काट दी गईं। संचार के सभी उपकरण खराब कर दिए गए। पत्रकारों के कैमरे नष्ट कर दिए गए। पूरी कोशिश थी कि ढाँचा गिरने की एक भी तस्वीर आखिरी ईंट गिरने से पहले अयोध्या के बाहर न जाये मानस भवन जहाँ से पुलिस पर गोली चलाई जा सकती थी, उसपर जिलाधिकारी तक को चढ़ने न दिया गया। वहाँ सुरक्षा बलों के जवानों के आने के सभी रास्ते बंद कर दिए गए।
3. गुम्बद पर पाँव टिकाना मुश्किल हो रहा था। 200 के ऊपर कारसेवक गुम्बद से गिरकर घायल हुए। विहिप ने स्वयंसेवकों की टीम के साथ स्ट्रेचर और एम्बुलेंस की व्यवस्था पहले से ही कर रखी थी।
4. राम कोठारी और शरद कोठारी के माता-पिता अपने अश्रुपूरित नेत्रों से बाबरी विध्वंस का दृश्य देखने को मौके पर मौजूद थे।
5. ढाँचे को ढाहने में पुराने मन्दिर के जितने भी अवशेष मिले, वे सभी राम कथा कुंज पर रखे गए। ये अवशेष अदालती कार्यवाही में काम आने थे। जबकि अनावश्यक अवशेष पीछे खाई को भर कर समतल करने के काम आया।
6. विवादित ढाँचा गिरने के 6 माह पहले उसके आसपास कई छोटे मन्दिर जो जीर्ण अवस्था में थे उनका अधिग्रहण विश्व हिन्दू परिषद ने किया था और उनको ध्वस्त करवा दिया था। इससे ढाँचे तक भारी भीड़ का पहुँचना आसान हुआ।
7. अस्थायी मन्दिर के निर्माण तक कल्याण सिंह ने लखनऊ में बड़े धैर्य से प्रतीक्षा की। यह सब सम्पन्न होने पर ही उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दिया।
8. 6 दिसम्बर को ही दिन में ढाई बजे के करीब भाजपा और विहिप के वरिष्ठ नेता बजरंग दल के अध्यक्ष विनय कटियार के साथ उनके आवास हिन्दू धाम पर बैठक कर रहे थे। इस समय मोरोपन्त पिंगले वहाँ मौजूद नही थे। वे कहाँ थे, यह कोई न जानता था।
9. करीब एक लाख कारसेवक 6 दिसम्बर की रात में भी अयोध्या में बने रहे। उन्हें डर था कि अस्थायी मन्दिर को हटाया जा सकता है। पुलिस ने सुबह का भोग नही लगने दिया। इससे सीआरपीएफ विद्रोह करने पर उतारू हो गई। सिपाही जूते उतारकर भजन करने लगे। लगा कि एक दूसरा ही बावेला शुरू हो जाएगा। लेकिन 12 बजे तक भोग लग गया जो अब तक निर्बाध जारी है।

80 Comments
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