पश्चिम बंगाल में सन 1951 में मुस्लिम जनसंख्या 20 प्रतिशत से कम थी, आज 27 प्रतिशत से अधिक है. 1951 में ही पूर्वी बंगाल या पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दू जनसंख्या 22 प्रतिशत थी, आज 8 प्रतिशत के करीब है.
मैं बार-बार इन आंकड़ों की भयावहता को देखता हूँ और हर बार डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को याद करता हूँ और मेरी श्रद्धा उनमें बढ़ती जाती है. वास्तव में डॉ मुखर्जी ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने मुस्लिम लीग के षड्यंत्र को समझा और पश्चिम बंगाल को पाकिस्तान का हिस्सा बनने से बचा लिया.
दरअसल, मुस्लिम लीग शुरू से ही यह मानती थी कि पूर्वी पाकिस्तान, कोलकाता (तब कलकत्ता) के बिना व्यवहारिक इकाई नही बन सकता था. लेकिन 1905 के बंग-भंग में भी कोलकाता पाश्चिम बंगाल का ही हिस्सा रहा था. कोलकाता का भौगोलिक जुड़ाव पश्चिम बंगाल से ही था. इसलिए उसे भारत के विभाजन की दशा में हिन्दू बहुल पश्चिम बंगाल का हिस्सा ही होना था.
ऐसे में मुस्लिम लीग ने पैंतरा बदला और एक नया पासा फेंका जिसमें कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता भी फंस गए थे. बंगाल के आखिरी प्रीमियर और मुस्लिम लीग के नेता सैयद सुहरावर्दी ने 1947 के शुरुआत में ही एकीकृत और स्वतंत्र बंगाल का पासा फेंका.
मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग ने भी इस प्रस्ताव पर औपचारिक सहमति दे दी. कांग्रेस की तरफ से इस प्रस्ताव को स्वीकृति देने वालों में सबसे बड़ा नाम शरतचन्द्र बोस का था. शरतचन्द्र बोस सिर्फ नेताजी सुभाषचंद्र बोस के बड़े भाई ही नही थे बल्कि वे स्वयं भी कांग्रेस के बड़े नेता थे और उस समय तो केंद्रीय सदन में कांग्रेस के नेता भी थे.
शरतचन्द्र बोस का मुस्लिम लीग के प्रस्ताव को समर्थन देना मुस्लिम लीग की बड़ी जीत थी. महात्मा गाँधी ने भी इस प्रस्ताव को सहमति दे दी थी.
कांग्रेस के एक धड़े और महात्मा गाँधी के यूनाइटेड बंगाल के प्रस्ताव को समर्थन देने के पीछे एक उद्देश्य यह भी था कि विभाजन की त्रासदी से करोड़ों लोगों को बचाया जा सके. इसमें कोई संदेह नही कि उनका उद्देश्य पवित्र था किंतु आश्चर्य होकर भी आश्चर्य नहीं होता कि जिस सुहरावर्दी के शासनकाल में मात्र 6 माह पूर्व, अगस्त 1946 में कोलकाता की सड़कों पर प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस मनाया गया था और सड़कें हिंदुओ के रक्त से लाल हो गई थी, उस सुहरावर्दी पर भरोसा करने को कांग्रेस कैसे तैयार हो गई थी. स्पष्ट है कि नोआखाली और कोलकाता के कत्लेआम से कोई सबक सीखने में कांग्रेस और गाँधी नाकाम रहे थे.
लेकिन कोई था जो इन षड्यंत्रों के पार सत्य को देख पाने में सक्षम था. हिन्दू महासभा के अध्यक्ष डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी सुहरावर्दी की मीठी बातों का मर्म जानते थे. वे न नोआखाली भूले थे और न ही कोलकाता की सड़कों पर मुस्लिम लीग के गुंडों का तांडव, जब हजारों की संख्या में निर्दोष हिन्दू कत्ल कर दिए गए थे.
डॉ मुखर्जी ने पूरी ताकत से यूनाइटेड बंगाल की योजना को नकार दिया. उन्होंने कहा कि यदि भारत का विभाजन धर्म के आधार पर होना ही है तो ठीक उसी आधार पर बंगाल का भी विभाजन होगा और हिन्दू बहुल पश्चिम बंगाल भारत का हिस्सा बनेगा.
हिन्दू महासभा तब भी कोई बड़ी राजनीतिक शक्ति नही थी लेकिन डॉ मुखर्जी बड़े नेता जरूर थे. मात्र 32 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर बने डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की देश के पढ़े लिखे लोगों, खास कर बंगाली भद्रलोक में बहुत प्रतिष्ठा थी. उनके पिता भी कलकत्ता यूनिवर्सिटी के वीसी रहे थे.
उच्च शिक्षा में पिता-पुत्र के योगदान को लोग आज भी याद करते हैं. डॉ मुखर्जी ने बंगाल में घूम घूमकर यूनाइटेड बंगाल के खिलाफ जनमत तैयार किया जिससे कांग्रेस अन्ततः दबाव में आई. कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जेबी कृपलानी ने यूनाइटेड बंगाल की योजना को खारिज कर दिया और इस तरह पश्चिम बंगाल बच गया.
आज जब हम देखते हैं कि हिन्दू 1947 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में 35 प्रतिशत थे, 1951 में 22 प्रतिशत थे और आज महज 8 प्रतिशत बचे हैं, तब यह सोच आती ही है कि यदि पश्चिम बंगाल भी बांग्लादेश का हिस्सा होता तो परिणाम कितने भयंकर होते. जिस तरह बांग्लादेश में हिंदुओं की जमीनें कब्जा की जा रही हैं, मन्दिरों को तोड़ा जा रहा है, नौकरियों से वंचित किया जा रहा है, क्या वही सब कोलकाता और दुर्गापुर में नहीं होता?
डॉ मुखर्जी ने अपने कर्तृत्व से उस समय तो बंगाल के हिंदुओं के लिए एक होमलैंड बचा लिया. लेकिन जिस तरह से पिछले 7 दशकों से पश्चिम बंगाल में अवैध घुसपैठ होता रहा है और सीमावर्ती जिलों में डेमोग्राफी बदली है, उससे यह होमलैंड फिर खतरे में पड़ गया है.
इस खतरे की तरफ आज भी पश्चिम बंगाल के अधिकतर नेताओं का वही रुख है जो 1947 में श्यामाप्रसाद मुखर्जी को छोड़कर सभी नेताओं का था. ऐसे में पश्चिम बंगाल की जनता को स्वयं ही अपना घर बचाने के लिए आगे आना होगा.
