नक्सली हत्याओं से क्या अवार्ड वापसी गैंग को डेमोक्रेसी पर ख़तरा नज़र नहीं आता ?

जम्मू कश्मीर में यदि एक भी पत्थरबाज मार गिराया जाता है या पत्थरबाजी के समय कोई घायल हो जाए तो लिबरल और अवार्ड वापसी सेना ऐसे आंसू बहाती है जैसे कि पत्थरबाज कोई गलत काम नहीं कर रहे . भले ही रोज़ सेना के जवान उनके हाथों मारे जाएं पर सांत्वना का एक शब्द उस गैंग के मुंह से नहीं निकलता.

कल नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के श्यामगिरी के पास कुआकुंडा में बारूदी सुरंग में विस्फोट कर हमले को अंजाम दिया. सूत्रों के मुताबिक काफिले में बुलेटप्रूफ गाड़ी के भी परखच्चे उड़ गए हैं. नक्सलियों ने बीजेपी के एक विधायक के काफिले पर हमला किया. इस हमले में बीजेपी के विधायक भीमा मंडावी, उनके वाहन चालक और तीन सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई है। दंतेवाड़ा में यह नक्सली हमला उस वक्त हुआ है, जबकि यहां पर 11 अप्रैल को लोकसभा चुनाव की वोटिंग कराई जानी है.

इसके अलावा कल ही जम्मू के किश्तवाड़ में मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक नेता और उनके अंगरक्षक की अस्पताल में गोली मारकर हत्या कर दी गई.जम्मू में बीजेपी के प्रवक्ता पारिमोक्ष सेठ ने कहा कि चंद्रकांत आरएसएस के वरिष्ठ नेता थे और पिछले 30 सालों से किश्तवाड़ में सक्रिय थे.

चंद्रकात पर पहले भी दो हमले हुए थे लेकिन इस बार क़रीब से गोली मारने के कारण वो गंभीर रूप से ज़ख्मी हो गए और उनकी मौत हो गई. पेलेट गन वाली फ़ोटो को फोटोशॉप कर देश और यूनाइटेड नेशन के सामने रोने वाले रोज़ हो रही इन मौतों पर आखिर क्यों चुप रहते हैं? क्या मजबूरी है ऐसी कि आपको आतंकवादियों का साथ देना पड़ा रहा है? इन सवालों का जवाब शायद कभी न मिले.

चाहे पाकिस्तान के आतंक की बात हो या देश में लेफ़्ट का आतंक, लिबरल गैंग कभी इनके ख़िलाफ़ मुँह नहीं खोलती, फिर आप किस मुँह से कहते हैं की देश ख़तरे में है. क्या केवल एक समुदाय या एजेंडे के तहत किसी की मृत्यू हो तभी आपको देश में ख़तरा नज़र आता है? अभिव्यक्ति की आज़ादी तो पूरी है पर आपकी वफ़ादारी आपको इजाज़त नहीं देती कि आप ऐसी हत्याओं की भर्त्सना करें ।

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