विकसित देशों को टक्कर देता भारत

विश्व में कई शक्तिशाली देश लगातार आगे बढ़ रहे हैं. प्रत्येक देश अन्य को पीछे छोड़ने की भरपूर कोशिश कर रहा है. भारत भी विकसित देशों की दौड़ में शामिल होने को आतुर है. देश की बढ़ती विकास दर व समृद्धि से विकसित देश भारत से दोस्ती करने की इच्छा जता रहे हैं.

लेकिन भारत की यही मज़बूती कई देशों को परेशान करने के लिए काफी है. देश में पिछली सरकारों द्वारा किए गए कार्यों की प्रशंसा तो हर कोई करता है, लेकिन वर्तमान सरकार द्वारा किए गए कार्य कहीं न कहीं देश के अन्य मुद्दों की वज़ह से छिपे रह जाते हैं जबकि पिछली सरकारों की अपेक्षा बहुत कम समय में केंद्र सरकार ने राष्ट्र के विकास के लिए अत्यधिक कार्य किए हैं.

हालिया उदाहरण है ऊर्जा का. एक ओर जब संपूर्ण विश्व पेट्रोलियम उत्पादों सहित ऊर्जा के अन्य उत्पादों की कमी के लिए चिंतित है, वहीं भारत ने ऊर्जा के असीमित स्रोतों की खोज में बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है. इस उपलब्धि का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत आज अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में विश्व में तीसरा स्थान प्राप्त कर चुका है.

साथ ही प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त होने वाली ऊर्जा से भारत को बड़ी मात्रा में विदेशी निवेश भी प्राप्त हो रहा है. इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन (IBEF) की एक रिपोर्ट के अनुसार अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में देश को अप्रैल 2000 से दिसंबर 2018 तक 7.48 बिलियन डॉलर का निवेश प्राप्त हुआ था.

कैलेंडर वर्ष 2018 के लिए स्वच्छ ऊर्जा में कुल निवेश 11.1 बिलियन डॉलर का अनुमान जताया गया है, अर्थात जो विदेशी निवेश दस वर्षों में प्राप्त नहीं हुआ, वह मात्र एक वर्ष में प्राप्त होगा. रिपोर्ट्स के अनुसार स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में 2017 में 28 सौदे हुए और विद्युत क्षेत्र में विलय एवं अधिग्रहण के 27 प्रतिशत सौदों का मूल्य 4.4 अरब डॉलर था.

गौरतलब है कि अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में कई विदेशी कंपनियों ने भारत में निवेश किया है. इनमें अमेरिका, जापान, नीदरलैंड सहित कई अन्य देशों की कंपनियां भी शामिल हैं.

सनद रहे, भारत सरकार द्वारा इलेक्ट्रिसिटी ऐक्ट 2003 के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए अक्षय ऊर्जा निर्माण और वितरण परियोजनाओं के लिए ऑटोमेटिक रूट के तहत 100 प्रतिशत विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी है.

गत वर्ष पीएम मोदी ने दावोस में कहा था कि पर्यावरण को बचाने और जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए, मेरी सरकार ने एक बड़े अभियान की योजना बनाई है. 2022 तक हम 175 Gw अक्षय ऊर्जा उत्पन्न करना चाहते हैं. प्रधानमंत्री ने यह भी कहा था कि पिछले तीन वर्षों में हमने 60 Gw के लक्ष्य को हासिल कर लिया है.

इस उपलब्धि की प्राप्ति के बाद सरकार द्वारा वर्ष 2022 तक सोलर इंस्टॉलेशन से 113.49 Gw और पवन ऊर्जा से 66.65 Gw के साथ कुल 227 Gw अक्षय ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है. ऊर्जा के प्राकृतिक स्रोतों के क्षेत्र में हुई प्रगति यूपीए सरकार के 10 साल में बहुत कम थी.

लेकिन मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद, इस सेक्टर में बड़े क़दम उठाए गए हैं.

पवन या सौर जैसी नवीकरणीय शक्ति वाले संयंत्रों से कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के प्रतिस्थापन से बिजली की लागत में कमी को देखते हुए 54,000 करोड़ रुपये सालाना की बचत होगी.

IBEF के आंकड़ों के अनुसार मोदी सरकार के पिछले पांच वर्षों में कुल स्थापित क्षमता में नई ऊर्जा का योगदान 8.2 तक प्रतिशत बढ़ा है.

मतलब साफ है कि वर्तमान सरकार ने ऊर्जा के परंपरागत स्रोतों से हटकर प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर ऊर्जा को बढ़ावा देने का प्रयास किया है. यह ऊर्जा अपेक्षाकृत बहुत सस्ती होती है. वर्तमान समय में जिस प्रकार पेट्रोलियम उत्पादों का दोहन किया जा रहा है, उससे निश्चित है कि आने वाले दशकों में इनके दाम आसामन छुएंगे.

साथ ही यह आने वाले समय में समाप्त भी हो सकते हैं. लेकिन अक्षय ऊर्जा के स्रोत समाप्त नहीं हो सकते हैं. मोदी सरकार द्वारा पवन ऊर्जा व सौर ऊर्जा के लिए किए गए प्रयासों द्वारा देश को हजारों करोड़ रुपयों का लाभ हो रहा है.

अक्षय ऊर्जा उत्पादन में भारत आज तीसरे नंबर पर है, लेकिन सरकार जिस तरह से इस पर कार्य कर रही है, वह दिन दूर नहीं जब भारत इस क्षेत्र में भी पहले स्थान पर होगा.