राजनैतिक बिरादरी में मर्यादाओं की सीमा न जाने कब से लांघी जाती रही है. हमारे देश ने अनवरत ऐसी घटनाओं को देखा है जिसने राजनीति के साथ इस देश को भी लज्जित किया है. आज की राजनीति में जहां देश के अधिकतर नेताओ ने एक दूसरे के बीच गाली देने की प्रतिस्पर्धा चलाई हुई है, इसमें कुछ ऐसे नेता भी हैं जो दो कदम आगे बढ़कर अब हज़ारों वर्षों पुराने एक धर्म को भी निशाने पर लेने लगे हैं.
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं, होते तो उसके लिए भी धरना दे ही दिया होता. यह देश ही नहीं बल्कि दुनिया के इकलौते ऐसे नेता हैं जिन पर पूरे ब्रम्हांड की ज़िम्मेदारी है. और वह वो ज़िम्मेदारी पूरी भी कर लेते, यदि मोदी जी उनको करने देते.
देवासुर संग्राम की भांति ऐसा लगता है जैसे केजरीवाल जी से ही सबका बैर है. वैसे आज कल महाशय जी संविधान बचाने की नेट प्रैक्टिस में लगे हुए हैं.
संविधान पर क्या खतरा है, ये वही जाने. एक आश्चर्य वाली बात तो यह भी है कि 1975 में संविधान पर ‘इमरजेंसी’ नामक कुठाराघात करने वालों से ही ‘हमको भी मिला लो जी’ का निवेदन कर वो कैसे संविधान बचाएंगे, यह शोध का विषय होगा.
जंतर मंतर के तिलिस्मी आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल भी 67 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली की गद्दी पर बैठ तो गए, लेकिन उनका कथन 3 साल में ही सत्य हो गया. याद कीजिये कि जंतर-मंतर के आंदोलन के समय उनके ही श्रीमुख से निकला था कि जो भी इस कुर्सी पर बैठता है, वही भ्रष्ट हो जाता है. वही खराब हो जाता है. उनके इस कथन के अनुसार तो केजरीवाल के ग्रह गोचर ठीक नहीं लग रहे हैं.
उनका एक ट्वीट देखा आज. वैसे वो आज कल मुख्यमंत्री दफ्तर से अधिक ट्विटर से ही सरकार चला रहे हैं. तकनीक और प्रौद्योगिक का बेहतर इस्तेमाल एक IIT वाला ही कर सकता है. लेकिन शब्दों के चयन और सांकेतिक संदेश देने मे आज भी साहित्य राजनीति से बहुत ऊपर आता है. साहित्य की क्लास में वो अभी बैक बेंचर हैं. उनका किया हुआ ताज़ा ट्वीट न सिर्फ एक धर्म पर राजनीति का अट्टहास है, अपितु एक चुने हुए मुख्यमंत्री का देश की बहुसंख्यक आबादी के विश्वास के साथ एक भद्दा मजाक है.
उन्होंने एक तस्वीर के साथ ट्वीट किया – ‘समवन सेंट दिस’. वैसे केजरीवाल जी इतने भोले हैं कि उनको कोई कुछ भी देता है तो मना नहीं कर पाते. लाली वाली प्यार की थपकी से लेकर हाल ही में मिर्च पाउडर की होली तक, जो आया केजरीवाल जी ने रख लिया. यह विवादास्पद तस्वीर भी उन्होंने रख ली. तस्वीर में दिखाई दे रहा है कि एक व्यक्ति हाथ में झाड़ू लिए ‘स्वास्तिक’ निशान को दौड़ा रहा है. अब स्वास्तिक का धार्मिक अर्थ क्या है, यह आपको समझाने की आवश्यकता नहीं है.
इस तस्वीर को देख कर क्रोध भी आया और तरस भी. क्रोध यह देख कर आया कि 67 सीटों का प्रचंड बहुमत लाया हुआ व्यक्ति देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ अपनी नकली प्रतिस्पर्धा में मर्यादाओं की सभी लक्ष्मण रेखाओ को पार करते हुए अब धार्मिक उन्माद फैलाने की स्थिति में आ गया है. तरस इसलिए आया क्योंकि लोकपाल के आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल को जिस उम्मीद के साथ दिल्ली की जनता ने मुख्यमंत्री आवास पर बैठाया था, उन उम्मीदों पर केजरीवाल खरा नहीं उतर पाए हैं.
इस देश की बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं पर कुठाराघात करके वो किस प्रकार की राजनीति करना चाहते हैं, यह तो वही जानें. परंतु राजनैतिक शुचिता बनाये रखने के लिए भाषा की मर्यादा रखना अत्यंत आवश्यक होता है.
सांकेतिक भाषा की भी उतनी ही महत्ता होती है. किसी व्यक्ति विशेष के लिए आपके मन में विचार कितने भी कटु क्यों न हो, लेकिन भाषा में उसे दर्शाने का एक तरीका होता है. हिंदी भाषा आज भी इतनी धनी है कि कम से कम राजनीतिक छींटाकशी के लिए भी उचित शब्दों को उपलब्ध करा सकती है. यदि कोई इस पर ध्यान देगा तो ‘मनोरोगी’; ‘डरपोक’; ‘बाप की दिल्ली’ जैसे सड़क छाप शब्दों का प्रयोग नहीं करना पड़ेगा.
अरविंद केजरीवाल की राजनीति वैसे तो दिल्ली तक ही सीमित है लेकिन उनकी महत्वकांक्षाएं अमेरिकी राष्ट्रपति की कुर्सी तक जाती है. प्रधानमंत्री के ऊपर अपशब्दों का पहला प्रहार उनके ही द्वारा हुआ था जब उन्होंने देश के प्रधानमंत्री को मनोरोगी कह दिया था. उन्होंने आज तक उसकी माफी नहीं मांगी है. आप राजनीतिक रूप से किसी के कितने भी बड़े शत्रु हो लेकिन संवैधानिक पदों की गरिमा का ध्यान रखना भी आपका कर्तव्य है. यह कर्तव्य और बढ़ जाता है जब आप एक राज्य के मुख्यमंत्री हो.
अरविंद केजरीवाल को हमारी ओर से शुभकामनाएं हैं. वह जिस स्तर की राजनीति कर रहे हैं, वैसी राजनीति तक पहुंचते हुए कांग्रेस को 70 साल लग गए. जिस गति से अरविंद केजरीवाल दौड़ रहे हैं, उन्हें राजनीती का उसेन बोल्ट कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. दिक्कत बस इतनी है कि वो दौड़े ही जा रहे हैं, रुक नहीं रहे. राजनीति में स्थिरता भी एक महत्वपूर्ण भाग है.
जो सनातनी उनकी इस हरकत से क्रोधित हैं, वे शांत हो जाये. आपको जवाब देने का मौका मई में मिलने वाला है. उंगली की कसरत कर लीजिये. आपकी एक कसरत अगले 5 वर्षों तक ऐसे नेताओं को नचा सकती है. अगली बार जो गिफ्ट केजरीवाल जी को मिले तो उन्हें पता हो कि यह भारतीय जनता ने भेजा है.
